दल-बदलुओ से डरी भाजपा ने बदली अपनी रणनीति:बाहरियों से ज्यादा अपने कार्यकर्ताओं पर भरोसा, टिकट में भी मिल रही प्राथमिकता, काशी क्षेत्र में दावेदारों की पड़ताल...

लखनऊ7 महीने पहले
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साल 2017 में बड़ी संख्या में दूसरे दलों के नेता भाजपा में शामिल हुए। पार्टी ने उन्हें टिकट भी दिया और मंत्रालय में जगह भी, लेकिन 2022 में चुनाव से पहले तीन मंत्री और दर्जनों विधायक ने पार्टी छोड़ दी। ठीक चुनाव से पहले बड़ी संख्या में नेताओं के पार्टी छोड़ने को भगदड़ नाम दिया गया। भाजपा भी इस भगदड़ से परेशान हो गई।इसीलिए अब पार्टी ने अपनी रणनीति में बदलाव किया है।

अब पार्टी बाहरी उम्मीदवारों से ज्यादा अपने कार्यकर्ताओं पर दांव लगाने की रणनीति बनाई है। कहा जा रहा है कि पार्टी ने फैसला किया है कि जिन सीटों पर पार्टी के कोई भी कार्यकर्ता अच्छी फाइट में है, पार्टी उसे ही उम्मीदवार बना कर चुनाव मैदान में उतार रही है। पहले फेज के जारी 172 सीटों में एमए कुछ कार्यकर्ताओं को पर पार्टी ने भरोसा जताते हुए चुनावी मैदान में उतारा है। पार्टी की इस फैसले के बाद कार्यकर्ताओं में भी जोश बढ़ गया है।

काशी क्षेत्र में भाजपा के दावेदार

काशी क्षेत्र में अधिकतर सीटों पर संगठन के पदाधिकारी और कार्यकर्ता दावेदारी कर रहे है। उन्हें भरोसा है कि बार पार्टी उन्हें मौका दे सकती है। काशी क्षेत्र की 5 सीटों पर ऐसे ही दावेदारों की पड़ताल।

काशी क्षेत्र में भाजपा से टिकट दावेदारों में पार्टी और संगठन के पदाधिकारी भी शामिल
काशी क्षेत्र में भाजपा से टिकट दावेदारों में पार्टी और संगठन के पदाधिकारी भी शामिल

1. जौनपुर का बदलापुर विधानसभा
जौनपुर जिले की बदलापुर विधानसभा को काफी अहम माना जाता है। पिछले विधानसभा चुनाव में यह सीट बीजेपी की झोली में आई थी। भारतीय जनता पार्टी के रमेश चंद्र मिश्रा इस सीट पर विजयी हुए थे। एक बार फिर इस सीट पर कांटे का मुकाबला है।

हालांकि इस बार यहां भाजपा के विधायक को पार्टी के एक पदाधिकारी चुनौती दे रहे है। साल 2007 में भाजपा के टिकट पर बदलापुर विधानसभा से किस्मत आजमा चुके भाजपा प्रदेश प्रवक्ता मनीष शुक्ला एक बार फिर दावेदारों में सबसे उपर है। ब्राह्मण समीकरण वाले इस सीट पर मनीष शुक्ला का दवा इसलिए भी मजबूत है, क्योंकि वो 2012 से लगातार अपने क्षेत्र में सक्रिय है। मौजूदा विधायक रमेश मिश्रा बसपा से आये है लिहाजा भाजपा के मूल वर्कर्स से सामंजस्य नही बिठा पाए है। दूसरे दलों से आये पार्टी के दूसरे दल के नेताओं के जाने से पार्टी के कार्यकर्ता भी दुखी है। कहा जा रहा है कि पार्टी जिस तरीके से अपनी रणनीति बदली है, मनीष शुक्ला की किस्मत फिर खुल सकती है।

2. वाराणसी का कैंट विधानसभा
वाराणसी के कैंट विधानसभा पर एक ही परिवार का कब्जा रहा है। 1991 से लेकर भाजपा के एक ही परिवार या यूं कहे पहले मां, फिर पिता, फिर मां और अब बेटे का कब्जा है। कैंट विधानसभा पर पिछले 7 चुनावों से भाजपा के श्रीवास्तव परिवार का कब्जा कायम है। हालांकी इस बार मौजूदा भाजपा विधायक सौरभ श्रीवास्त के साथ ही इस सीट की दावेदारी काशी के क्षेत्रीय अध्यक्ष महेश श्रीवास्तव भी कर रहें है।

3. सुल्तानपुर का लम्भुआ विधानसभा
यह सुल्तानपुर की सबसे बड़ी आबादी वाली विधानसभा है। लम्भुआ विधानसभा सीट पर सबसे ज्यादा भाजपा का तीन बार कब्ज़ा रहा है। इस सीट पर जनसंघ, भाजपा , सपा , बसपा,कांग्रेस, जनता दल और जनता पार्टी अपना परचम लहरा चुकी है। फिलहाल यह सीट भाजपा के खाते में है। मौजूदा भाजपा विधायक देवमणि अकसर अपने बयानों की वजह से चर्चा में रहते है।इस सीट पर भी मौजूदा भाजपा विधायक देवमणि द्विवेदी के साथ काशी क्षेत्र के महामंत्री सुशील त्रिपाठी भी दावेदारों में शामिल है।

4. प्रयागराज का उत्तरी विधानसभा
इलाहाबाद उत्तरी विधानसभा सीट प्रयागराज की वह सीट है जहां पर लोगों ने बाहुबल और आपराधिक छविवालों को वरीयता नहीं दी। 2017 से यहां पर बीजेपी का कब्जा है. हर्ष वर्धन वाजपेयी यहां के विधायक हैं. इस सीट पर कभी धर्म और जाति के आधार पर मतदान नहीं हुआ। यहां से युवा विधायक हर्षवर्धन बाजपेयी है, इसी सीट पर भी पार्टी और संघठन के बड़े दावेदार है जिसमें नीलम करवरिया के साथ ही कद्दावर नेता और पूर्व मंत्री नरेंद्र सिंह है।

5.सुल्तानपुर शहर विधानसभा

कहा जा रहा है कि इस सीट पर हाल में ही ED से वीआरएस लेकर पूर्व नौकरशाह राजेश्वर सिंह दावेदारी कर रहें है। राजेश्वर सिंह को गाजियाबाद से उम्मीदवार बनाने की चर्चा थी, लेकिन वहां से टिकट नही मिला

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