37 साल बाद विधानसभा उपाध्यक्ष चुनाव के राजनीतिक मायने:2% वैश्य वोटर्स को साधने के लिए BJP ने सपा के बागी विधायक नितिन पर खेला दांव

लखनऊ2 महीने पहलेलेखक: आदित्य तिवारी
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जीत पर सीएम योगी आदित्नाथ का आभार प्रकट करते हुए नितिन अग्रवाल - Dainik Bhaskar
जीत पर सीएम योगी आदित्नाथ का आभार प्रकट करते हुए नितिन अग्रवाल

उत्तर प्रदेश की विधानसभा में उपाध्यक्ष पद के लिए इससे पहले 1984 में हुकुम सिंह और रियासत हुसैन के बीच चुनाव हुआ था। सोमवार शाम को समाजवादी पार्टी के बागी विधायक नितिन अग्रवाल भाजपा के समर्थन से विधानसभा के उपाध्यक्ष चुन लिए गए हैं। प्रदेश में करीब 2% वैश्य (बनिया) आबादी है।

नरेंद्र सिंह वर्मा
नरेंद्र सिंह वर्मा

मौके का फायदा उठाना, उपाध्यक्ष चुनाव कराने की जरूरत
वरिष्ठ पत्रकार पीएन द्विवेदी के मुताबिक पूर्व राज्यसभा सांसद नरेश अग्रवाल के भाजपा में शामिल हुए करीब दो साल हो गए हैं। उनके बेटे नितिन अग्रवाल सपा से विधायक हैं। उनको सरकार में कोई पद नहीं दिया जा सकता था। इसके अलावा नरेश अग्रवाल को अभी तक कोई पद नहीं दिया गया। तो लंबे समय से खाली चल रहे उपाध्यक्ष के पद के साथ पिता-पुत्र और वैश्य समाज को साधने के लिए भाजपा ने यह चुनाव कराया है।

विधानसभा उपाध्यक्ष की कुर्सी पर बैठ कर कार्य भार संभालते नितिन अग्रवाल
विधानसभा उपाध्यक्ष की कुर्सी पर बैठ कर कार्य भार संभालते नितिन अग्रवाल

वैश्य वोट बैंक को सपा-बसपा से तोड़ना और भरोसा जताना
भाजपा को नितिन अग्रवाल की उम्मीदवार बनाए जाने के सवाल पर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार प्रभा शंकर बताते हैं कि, उत्तर प्रदेश के चुनाव में 2017 और 2019 के चुनाव में देखने को मिला कि जो छोटी-छोटी जातियां हैं वो भले ही एक प्रतिशत या दो प्रतिशत हों, बीजेपी एक अम्ब्रेला (छतरी) बना रही है।

विधानसभा अध्यक्ष हृदय नारायण दीक्षित जीतने पर नितिन अग्रवाल को लड्‌डू खिलाते हुए
विधानसभा अध्यक्ष हृदय नारायण दीक्षित जीतने पर नितिन अग्रवाल को लड्‌डू खिलाते हुए

इस छतरी के नीचे एंटी सपा और एंटी बसपा वोट एक साथ आ जाएं। यादव-मुस्लिम, कुछ ओबीसी और कुछ अगड़े अगर सपा की ओर गए तो उसके लिए विनिंग कॉम्बिनेशन बन सकता है। प्रदेश में करीब 2% वैश्य (बनिया) आबादी है।

बीजेपी की क्या रणनीति है?
नितिन अग्रवाल को उपाध्यक्ष बनाने के पीछे बीजेपी की क्या रणनीति है? इस सवाल पर वरिष्ठ पत्रकार दिनेश त्रिपाठी कहते हैं, चुनाव के पहले वैश्य वोटों को साधने के लिए एक संदेश देना है। नितिन अग्रवाल के जरिए एक जातिगत समीकरण को साधने की कवायद है। BJP की रणनीति है कि भले ही उस जाति का 10 से 20 सीटों पर ही असर हो लेकिन, उन्हें जोड़ना चाहते हैं।

बहुत से लोग चुनाव को मैक्रो लेवल पर मैनेज करते हैं, ये बीजेपी की माइक्रो लेवल चुनावी स्ट्रैटजी है। इसलिए सपा के बागी नितिन अग्रवाल को उम्मीदवार बनाकर वैश्य समाज के सपा बसपा के वोट की ओर सेंध लगाते हुए उच्च पद पर बैठाया जाना है, भरोसा देते हुए हैं विश्वास कायम काम करना है। यहीं नहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी यह चुनाव प्रभावित करेगा, क्योंकि इसके दो साल बाद आम चुनाव होंगे।

समाजवादी पार्टी के बागी विधायक नितिन अग्रवाल भाजपा के समर्थन से विधानसभा उपाध्यक्ष चुने गए।
समाजवादी पार्टी के बागी विधायक नितिन अग्रवाल भाजपा के समर्थन से विधानसभा उपाध्यक्ष चुने गए।

सपा के कुर्मी ओबीसी उम्मीदवार, 12 जिलों में पड़ेगा इसका असर
सपा ने उम्मीदवार उतारकर गैर यादव ओबीसी वोट के खिलाफ होने का प्रचार किया है। इस सवाल पर जबाव देते हुए वरिष्ठ पत्रकार पीएन द्विवेदी का कहना, सबको मालूम है विपक्ष का पद होता है। ऐसे में यादव वोट बैंक के ठप्पे को हटाते हुए नरेन्द्र वर्मा को उम्मीदवार उतारना जातिगत आधार पर देखिए। यूपी के 16 जिलों में कुर्मी और पटेल वोट बैंक छह से 12 फीसदी तक है।

इनमें मिर्जापुर, सोनभद्र, बरेली, उन्नाव, जालौन, फतेहपुर, प्रतापगढ़, कौशांबी, प्रयागराज, सीतापुर, बहराइच, श्रावस्ती, बलरामपुर, सिद्धार्थनगर, बस्ती और संत कबीर नगर जिले प्रमुख हैं। बेनी प्रसाद वर्मा के रहते सपा के पास कुर्मी वोटरों में असर रखने वाला बड़ा चेहरा था, लेकिन 2014 के बाद से गैर यादव ओबीसी वोटर्स में बीजेपी ने सेंध लगाई। इस वजह से कुर्मी वोटर काफी हद तक बीजेपी की तरफ मुड़े हैं।

सीएम योगी के साथ नितिन अग्रवाल
सीएम योगी के साथ नितिन अग्रवाल

1984 के बाद विधानसभा उपाध्यक्ष का चुनाव हुआ
उत्तर प्रदेश में 37 साल बाद उपाध्यक्ष का चुनाव हो रहा है। 1980 में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सत्ता पर फिर काबिज हुई और विश्वनाथ प्रताप सिंह को सीएम बनाया गया। इसके बाद कांग्रेस ने दो साल के दौरान दो सीएम बदले। 1984 में नारायण दत्त तिवारी यूपी के सीएम बने। इसके बाद कांग्रेस ने परंपरा को तोड़ते हुए उपाध्यक्ष का पद मुख्य विपक्षी पार्टी को नहीं देने का दांव खेला।

कांग्रेस से हुकुम सिंह उतरे, वहीं विपक्ष ने मुरादाबाद के एमएलए रियासत हुसैन का नामांकन भरवाया। चुनाव का नतीजा सबको पता था। संख्याबल में कांग्रेस के आस-पास भी विपक्ष नहीं था। ऐसे में कांग्रेस के कैंडिडेट हुकुम सिंह विधानसभा उपाध्यक्ष बनने में कामयाब रहे।

राम गोविंद चौधरी ने इसे अलोकतांत्रिक तरीका बताया
निर्विरोध चुने जाने और चुनावी प्रक्रिया कराए जाने को लेकर समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने नरेंद्र सिंह वर्मा को उम्मीदवार बना दिया। अखिलेश ने सपा के बागी वैश्य नेता नितिन अग्रवाल के खिलाफ कुर्मी उम्मीदवार उतारकर भाजपा को पिछड़ा वर्ग विरोधी बताने की कोशिश की है। भाजपा ने नितिन अग्रवाल को आम चुनाव से चार महीने पहले उतारकर 2% वैश्य वोट पर पकड़ मजबूत करने की रणनीति बनाई हैं।

हालांकि सपा के नेता प्रतिपक्ष राम गोविंद चौधरी ने इसे अलोकतांत्रिक तरीका बताया है। तो वहीं विधानसभा उपाध्यक्ष चुनाव पर संसदीय कार्य मंत्री सुरेश खन्ना ने कहा कि हम लोगों ने कोई परंपरा नहीं तोड़ी। साढ़े 4.8 साल तक सपा ने प्रत्याशी नहीं दिया। सपा ने आपसी गुटबाजी से प्रत्याशी नहीं भेजा। हम अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह कर रहे हैं।

कांग्रेस एमएलसी ने कहा- उप सभापति का चुनाव भी कराया जाए
विधान परिषद में कांग्रेस पार्टी के नेता दीपक सिंह ने विधानसभा के उपाध्यक्ष और विधान परिषद के उप सभापति का चयन एक साथ कराए जाने की मांग की है। इस संबंध में उन्होंने प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल को पत्र भी लिखा है। राज्यपाल को भेजे गए पत्र में उन्होंने लिखा है कि बरसों बाद विधानसभा उपाध्यक्ष पद का चुनाव तो कराया जा रहा है, मगर विधान परिषद के उपसभापति के चुनाव को अनदेखा किया जा रहा है।

दीपक सिंह ने नियमों और परंपराओं का हवाला देते हुए कहा कि दोनों सदनों में उपाध्यक्ष और उपसभापति विपक्ष का होता है। उन्होंने मांग की कि दोनों पदों के चुनाव एक साथ कराए जाएं।

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