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UP में चुनाव की वजह से बदला फैसला:मोदी ने एक महीने में यूपी के 5 दौरे किए, फिर भांपा मिजाज; यहां 210 सीटों पर किसान हैं निर्णायक

लखनऊ6 महीने पहले

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यूपी चुनाव से महज तीन महीने पहले बड़ा दांव खेला है। उन्होंने यह निर्णय लेने से पहले एक महीने में यूपी के 5 दौरे किए। इसके जरिए यूपी की जनता का मिजाज पढ़ा। फिर जिन तीन नए कृषि कानूनों को लेकर 12 महीने से किसान पूरे देश में आंदोलित थे, उन्हें वापस ले लिया।

यूपी की 403 विधानसभा सीटों में से करीब 210 सीटों पर किसान ही जीत-हार का फैसला करते हैं। इसलिए भाजपा चुनावों तक किसानों को नाराज नहीं करना चाहती थी।

आंदोलन का सबसे बड़ा केंद्र गाजीपुर बॉर्डर रहा, जहां मुजफ्फरनगर के किसान नेता राकेश टिकैत अपना टेंट लगाकर बैठे थे। आंदोलन का असर पश्चिमी यूपी से निकलकर सेंट्रल यूपी तक पहुंच रहा था। विपक्ष भी सरकार को घेर रहा था। जहां-जहां किसान महापंचायत कर रहे थे, नेता भी पहुंच रहे थे।

भाजपा के खिलाफ गुस्सा इस कदर बढ़ रहा था कि नेताओं को गांवों में घुसने तक नहीं दिया जा रहा था।

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4 पॉइंट में समझिए मोदी की राजनीति-

1. विपक्ष के आगे झुके

किसान आंदोलन को लेकर यूपी में भाजपा सरकार पर सबसे अधिक हमलावर कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी रहीं। प्रियंका के अलावा सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव, आप पार्टी सांसद संजय सिंह ने लखीमपुर हिंसा में मृतक किसानों के परिजनों से मुलाकात भी की थी। हिंसा के आरोपी आशीष की गिरफ्तारी और मंत्री अजय मिश्रा टेनी की बर्खास्तगी का मुद्दा छेड़ दिया था। इससे सरकार चौतरफा घिर गई थी।

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2. नए गठबंधन पर दिखेगा असर
पश्चिमी यूपी में राष्ट्रीय लोकदल के जयंत चौधरी का कद किसान आंदोलनों के चलते बढ़ रहा था। यूपी विधानसभा चुनाव में जयंत चौधरी का सपा से गठबंधन होना है। बात बन गई है, लेकिन अभी इसका ऐलान नहीं हुआ है। यदि किसान आंदोलन ऐसे ही चलता रहता तो चुनाव में सीधा लाभ सपा-रालोद को मिलता। अब मोदी सरकार के रुख के बाद क्या असर दिखेगा, यह समय बताएगा।

3. जाटलैंड को साधने की कोशिश
यूपी और केंद्र में भाजपा को सत्ता दिलाने में जाट समुदाय का बड़ा हाथ था। पहले 2014 लोकसभा, फिर 2017 विधानसभा और 2019 लोकसभा चुनाव में भाजपा को पश्चिमी यूपी के जाट समुदाय का खुलकर समर्थन मिला। यहां 12% जाट, 32% मुस्लिम, 18% दलित, अन्य ओबीसी 30% हैं। किसान आंदोलनों के कारण इस बार भाजपा के लिए राह आसान नहीं थी। बागपत और मुजफ्फरनगर जाटों का गढ़ है। मुजफ्फरनगर की सिसौली, एक तरह से भारतीय किसान यूनियन की राजधानी है और बागपत का छपरौली रालोद का गढ़ है।

किसान 2022 के चुनाव में भाजपा को सबक सिखाने के लिए तैयार बैठा था। अब कृषि कानूनों की वापसी से भाजपा डैमेज कंट्रोल में कामयाब हो सकती है।

4. ध्रुवीकरण करने की रणनीति
2013 में मुजफ्फरनगर के कवाल कांड के बाद मुजफ्फरनगर दंगा हुआ तो देशभर में इसका असर दिखा था। इसके बाद हुए ध्रुवीकरण का असर 2014 के लोकसभा चुनाव में दिखा था, लेकिन मुजफ्फरनगर के जीआईसी मैदान में 5 सितंबर 2021 को हुई किसान संयुक्त मोर्चा की महापंचायत में हर-हर महादेव और अल्लाह हू अकबर की गूंज एक ही मंच से दोबारा सुनाई दी।

दावा किया गया कि जाट-मुस्लिम एक बार फिर एक साथ आए हैं। इसके बाद से ही सरकार बैकफुट पर आने लगी थी, लेकिन मोदी के नए दांव से भाजपा वेस्ट यूपी में फिर ध्रुवीकरण की कोशिश कर सकती हैं।

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21 अक्टूबर: कुशीनगर 25 अक्टूबर: सिद्धार्थनगर 25 अक्टूबर: वाराणसी 15 नवंबर: सुल्तानपुर 19 नवंबर: महोबा, झांसी, लखनऊ

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