राधा-रानी बनी राजा, कान्हा बने कोतवाल:वृंदावन में भगवान के अद्भुत दर्शन कर रहे भक्त; 500 साल पुराना है इतिहास

मथुरा2 महीने पहले
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राजा के रूप में राधा रानी और कोतवाल के रूप में भगवान श्री कृष्ण के दर्शन - Dainik Bhaskar
राजा के रूप में राधा रानी और कोतवाल के रूप में भगवान श्री कृष्ण के दर्शन

राधा-कृष्ण की भूमि है श्री धाम वृंदावन। यहां भगवान के कई मंदिर हैं। मगर, इस नगरी की असली पहचान यहां के सप्त देवालय हैं। इनमें भगवान के स्वरूप के अद्भुत दर्शन देखने को मिले। यहां के प्राचीनतम गोकुलानंद मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण का कोतवाल के स्वरूप में श्रृंगार किया, तो राधा-रानी राजा के रूप में भक्तों को दर्शन दे रही थीं।

स्वयं प्रकट हैं भगवान गोकुलानंद
चैतन्य महाप्रभु ने 500 साल पहले अपने 6 शिष्यों को ब्रज भेजा। इन शिष्यों ने वृंदावन को फिर से स्थापित किया। साथ ही यहां 7 देवताओं की प्रतिमा जमीन से प्रकट की। इन्हीं में से एक हैं भगवान गोकुलानंद। भगवान गोकुलानंद को जमीन से अपनी भक्ति साधना के जरिए प्रकट किया था। गोकुलानंद यानी गोकुल के नंद। यहां भगवान कृष्ण राधा-रानी के साथ विराजमान हैं। यहां भगवान राधा-कृष्ण का स्वरूप प्रेमावतार रूप में है।

भगवान गोकुलानंद को जमीन से अपनी भक्ति साधना के जरिए प्रकट किया था।
भगवान गोकुलानंद को जमीन से अपनी भक्ति साधना के जरिए प्रकट किया था।

छठ गोस्वामियों द्वारा सेवित हैं भगवान गोकुलानंद

छठ गोस्वामी द्वारा सेवित श्री गोकुलानंद जी का इतिहास करीब 400 से 500 साल पुराना बताया जाता है। यह स्थान गौडीय संप्रदाय के लिए प्रमुख स्थानों में से एक है। इस स्थान पर ब्रज के मुख्य आचार्यों की भी समाधी बनी हुई है। जिसमें विशेषकर श्री लोकनाथ गोस्वामी जी महाराज, श्री नवरत्न दास गोस्वामी जी महाराज, व विश्वनाथ चक्रवर्ती जी के साथ अन्य समाधिया भी है।श्री गोकुला नंद जी में एक विशेष प्रेमावतार रूप में विराजमान गिर्राज शीला भी है। जिसका दर्शन करके भक्त आनंद से परिपूर्ण होते हैं।

यह गोकुलानंद मंदिर है, जो करीब 400 साल पुराना है।
यह गोकुलानंद मंदिर है, जो करीब 400 साल पुराना है।

राधा-रानी के राजा और भगवान कृष्ण के कोतवाल बनने के पीछे यह है मान्यता
भगवान कृष्ण के कोतवाल और राधा-रानी के पीछे मान्यता है कि द्वापर में वृषभानु जी राजा थे। रक्षाबंधन के अगले दिन राधा-रानी की इच्छा स्वयं के राजा बनने और भगवान कृष्ण को सेनापति बनाने की हुई। इस पर भगवान कृष्ण ने राधा-रानी की इच्छा को पूरा करते हुए उनका राजा के रूप में श्रृंगार किया। और खुद बने कोतवाल। यह ब्रज की लीला थी, इसीलिए आज भी वृंदावन के सप्त देवालय में रक्षाबंधन के अगले दिन भगवान के इसी स्वरूप में दर्शन होते हैं।

भगवान गोकुलानंद के दर्शनों को श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा।
भगवान गोकुलानंद के दर्शनों को श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा।

शिला पर है चैतन्य महाप्रभु के अंगूठे का निशान

मंदिर में शिला भी विराजमान हैं। मंदिर दर्शन करने आये भक्त बताया कि यह दर्शन विशेष दर्शन हैं। श्री चैतन्य महाप्रभु जी राधा कृष्ण के मिलित प्रेमा अवतार है। श्री महाप्रभुजी जब शिला को स्पर्श कर रहे थे तो उनके अंगूठे का निशान शिला पर अवतरित हो गया । यह शिला आज की मंदिर परिषद में विराजमान हैं। आज भी यह शिला का दर्शन करके भक्त अपने आप को धन्य समझते हैं।

मंदिर में मौजूद शिला पर चैतन्य महाप्रभु के अंगूठे का निशान आज भी मौजूद है।
मंदिर में मौजूद शिला पर चैतन्य महाप्रभु के अंगूठे का निशान आज भी मौजूद है।

वृंदावन में यह हैं सप्त देवालय
वृंदावन को सप्त देवालय की भूमि कहा जाता है। यहां के सप्त देवालय गोविंद देव,गोपीनाथ, राधा रमण,राधा दामोदर, राधा श्याम सुंदर , मदन मोहन और गोकुलानंद हैं। गोकुलानंद केशीघाट से राधारमण मंदिर जाने वाले मार्ग पर स्थित है। इस मंदिर का मुख्य द्वार बहुत छोटा है, लेकिन गर्भ ग्रह के बाहर बना आंगन बड़ा है। यहां हरियाली बनाए रखने के लिए जाली का प्रयोग किया गया है। इससे बंदर पेड़-पौधों को नुकसान न पहुंचा सकें।

राधा-रानी के राजा और भगवान कृष्ण के कोतवाल बनने पर भक्तों ने भगवान को भजन गा कर रिझाया।
राधा-रानी के राजा और भगवान कृष्ण के कोतवाल बनने पर भक्तों ने भगवान को भजन गा कर रिझाया।

भगवान के दर्शनों को उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब
राधा-रानी के राजा और भगवान कृष्ण के कोतवाल बनने के स्वरूप के दर्शन करने के लिए श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। खासकर गौडिया संप्रदाय के अनुयाई भगवान गोकुलानंद के दर्शनों के लिए पहुंचे। भगवान के इस अद्भुत दर्शन के समय श्रद्धालुओं द्वारा भगवान को भजन सुनाए जा रहे थे। भक्त भगवान के दर्शन कर उनकी आराधना के लिए भजन गा रहे थे।