मजदूर से एंटरप्रेन्योर बनी महिलाओ की कहानी:मेरठ में 20 सालों से दूसरों के लिए फुटबॉल सिलती थीं, अब बाजार में ब्रांड लांच करने की तैयारी

मेरठ7 महीने पहलेलेखक: शालू अग्रवाल

स्पोर्ट्स के सामानों के लिए मेरठ दुनिया में मशहूर है। यहां की कंपनियां लोगों से दिन के मेहनताने पर खेल किट्स बनवाती हैं। सिसौला गांव की 30 महिलाएं भी 20 साल से इस कारोबार से जुड़ी हैं, लेकिन अब उन्होंने खुद को बतौर इंटरप्रेन्योर स्थापित कर लिया है। महिलाओं का कहना है कि दूसरे के लिए मेहनत करने के बदले दिन 180 रुपए मिलते थे। इससे बाहर निकलने के लिए महिलाओं का ग्रुप बनाया। अब खुद के लिए काम कर रहे हैं। सिर्फ 18 रुपए एक फुटबॉल पर मेहनताना पाने वाली ये महिलाएं अब हर महीने 1 लाख रुपए कमा रही हैं। जल्द ही खुद अपना प्रोडक्ट ब्रांड लांच करने वाली हैं।

फुटबॉल की सिलाई करने वाली इन महिलाओं को सीडीओ शशांक चौधरी ने तकनीकी प्रशिक्षण दिलाकर मार्केटिंग, उत्पाद की ब्रांडिंग और क्वालिटी वर्क की जानकारी दिलाई है।
फुटबॉल की सिलाई करने वाली इन महिलाओं को सीडीओ शशांक चौधरी ने तकनीकी प्रशिक्षण दिलाकर मार्केटिंग, उत्पाद की ब्रांडिंग और क्वालिटी वर्क की जानकारी दिलाई है।

पहले 2 स्वयं सहायता समूह बनाए, फिर खुद आर्डर लेने लगीं
ब्लॉक जानी के सिसौला गांव में फुटबॉल सिलने वाली महिलाओं ने खुद को दिहाड़ी मजदूरी की कैद से आजाद किया। दूसरी कंपनियों के आर्डर पर फुटबॉल सिलने वाली इन महिलाओं ने 2 स्वयं सहायता समूह बना लिया। फिर खुद के आर्डर लेकर आपूर्ति देने लगी। कुछ महीनों में ही व्यवसाय बढ़ा। तो जैम पोर्टल से उन्हें आर्डर मिलने लगे हैं। लंबे समय बिचौलियों के जाल में फंसे रहने के बाद अब महिलाएं सीधे आर्डर डील कर रही हैं।

महिलाएं घर से या स्कूल में खाली स्थान पर एकत्र होकर फुटबॉल सिलती हैं।
महिलाएं घर से या स्कूल में खाली स्थान पर एकत्र होकर फुटबॉल सिलती हैं।

नहीं जानते थे किस कंपनी के लिए काम कर रहे
सिसौला की शाइस्ता कहती हैं, यहां घर-घर फुटबॉल सिलने का काम पीढ़ियों से होता आया है। निर्माता कंपनियां बिचौलियों के जरिए फुटबॉल सिलाने का काम कराती आई हैं। हम व्यवसाय से जुड़े हैं, लेकिन सिर्फ बिचौलियों के संपर्क में ही रहते हैं। 40 साल की परवीना कहती हैं कि ठेकेदार तैयार फुटबॉल कहां लेकर जाता है। किंन्हें बेचता है। हमारी मेहनत के मुताबिक हमें कितना कम भुगतान होता है। ये सब हमें नहीं पता था।

जन्नत और दर्पण दो समूह बनाकर काम कर रही महिलाएं कहती हैं काम तो हम पहले भी यही करते थे, लेकिन अब मुनाफा बढ़ा है, खुद पर भरोसा होने लगा है।
जन्नत और दर्पण दो समूह बनाकर काम कर रही महिलाएं कहती हैं काम तो हम पहले भी यही करते थे, लेकिन अब मुनाफा बढ़ा है, खुद पर भरोसा होने लगा है।

दर्पण और जन्नत समूह ने आसान कर दी राह
हमने ग्रामीण राष्ट्रीय आजीविका मिशन के तहत दर्पण और जन्नत दो समूह तैयार किए। इनमें 30 महिलाएं जुड़ी हुई हैं। पहले ठेकेदार हमें रबड़, केमिकल, धागा समेत सामग्री देता था। जब गेंद सिलकर तैयार हो जाती थीं। तब लेकर जाता था। एक फुटबॉल को सिलने की मजदूरी 18 रुपए तय थी। एक महिला दिन में 8 से 10 फुटबॉल ही सिल पाती थी। इस तरह उसको 150 से 180 रुपए ही मिल पाते थे। फुटबॉल सिलने में किसी प्रकार की कमी रहने पर हर्जाना भी भरना पड़ता था।

18 रुपए एक फुटबॉल पर मेहनताना पाने वाली ये महिलाएं अब हर महीने 1 लाख रुपए कमा रही हैं।
18 रुपए एक फुटबॉल पर मेहनताना पाने वाली ये महिलाएं अब हर महीने 1 लाख रुपए कमा रही हैं।

कंपनी और स्पोर्ट्स थोक बाजार से सीधे संपर्क
अब कच्चा माल बाजार से खुद लाते हैं। रबड़ काटते हैं। फिर सिलते हैं। कंपनी और स्पोर्ट्स के थोक बाजार से हम सीधे संपर्क करते हैं। एक सामान्य फुटबॉल बाजार में 350 रुपए की बिकती है। थोक बाजार को हम 300 रुपए में उपलब्ध कराते हैं। लागत घटाकर बाकी मुनाफा हमारा होता है।

पेमेंट सीधे समूहों के बैंक खातों में
जिला मिशन प्रबंधक योगेश मोघा के मुताबिक अब कंपनी सीधे इन महिलाओं से फुटबॉल मंगवाती हैं। इसका पेमेंट सीधे समूह के बैंक खातों में जाता है। महिलाओं की 3-3 दिन पर बैठक होती है। पूरे खाते तैयार होते हैं। काम अभी भी घर से ही महिलाएं करती हैं। सिर्फ इनका काम एक इंटरप्रेन्योर की तरह हो गया है। सेल्फ ट्रेडिंग से महिलाओं की इनकम बढ़ी है। महीने पर 5000 रुपए कमाने वाली महिलाएं अब 15 हजार रुपए कमा लेती हैं।