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मेरठ..यहां मुस्लिम परिवार बनाता है रावण के पुतले:60 सालों से घंटाघर के युनूस, सोहेल का खांदानी काम है दशहरे पर पुतले बनाना, बोले इन्हीं पुतलों से गुजारा होता है

मेरठ2 महीने पहले
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मेरठ में 60 सालों से सोहेले का परिवार हर साल रावण का पुतला तैयार करता है, इसी से परिवार का गुजारा होता है - Dainik Bhaskar
मेरठ में 60 सालों से सोहेले का परिवार हर साल रावण का पुतला तैयार करता है, इसी से परिवार का गुजारा होता है

यूपी के मेरठ में कई मुस्लिम परिवारों का गुजारा दशहरे पर रावण का पुतला बनाकर होता है। पीढ़ियों से मुस्लिमों के ये परिवार रावण, मेघनाद और कुंभकरण के पुतले बनाने का काम करते हैं। पुतले गढ़ने की कला एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को सौंपती जाती है। उसी से घर का गुजारा होता है।

मेरठ के रामलीला मैदान में रावण के पुतले तैयार करते हैं मुस्लिम कारीगर युनूस
मेरठ के रामलीला मैदान में रावण के पुतले तैयार करते हैं मुस्लिम कारीगर युनूस

1987 के दंगों के लिए दुनिया में चर्चित मेरठ में सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल देती कई कहानियां हैं। इन्हीं में पुतलाकार युनूस और सोहेल की कहानी भी शामिल हैं। जिनके बनाए पुतले हर साल शहर की रामलीलाओं में दशहरे पर जलाए जाते हैं।

दादा के जमाने से कर रहे काम
युनूस कहते हैं 60 सालों से ज्यादा हो गया हमारे घर में यही काम होता है। दशहरे पर पुतले बनाते हैं। हमने तो अपने पड़दादा को ये रावण का पुतला बनाते देखा। देखते, देखते हम भी सीख गए। बचपन में दादा के साथ पुतले पर कागज, पतंगी चिपकाने का जिम्मा मिलता था। बड़े हुए तो पुतला बांधना, चेहरा बनाने लगे। दादा के बाद अब्बू के साथ यही काम किया। अब अपने बच्चों को ये काम सिखा रहे हैं। पुतले बनाने की तकनीक में कोई बदलाव नहीं हुआ है।

दशहरे पर ही निकलता काम
घंटाघर पर आतिशबाजी की दुकान करने वाले सोहेल दशहरे से 1 महीना पहले रावण, मेघनाद, कुंभकरण के पुतले बनाने में जुट जाते हैं। सोहेल कहते हैं केवल दशहरा पर काम निकलता है। सालभर फ्री। होली पर होलिका बनाने का काम आ जाता है। इसी में जो कमाई हो जाए उसी से गुजारा चलाते हैं। बाकी दिनों में आतिशबाजी का काम कर लेते हैं। पुतला बनाने मे ंदिनरात लगता है। बरसात और टूटने से पुतले को बचाना पड़ता है, जो बहुत मुश्किल है। पुतले में खराबी नहीं होना चाहिए। दहन के समय पुतला जल जाए ये सब ख्याल रखना पड़ता है।

लंबाई के अनुसार पुतले की कीमत
कलाकार कहते हैं पुतलों की लंबाई के अनुसार उनकी बनावट जाती है। जितना लंबा पुतला उतनी कीमत। 20 फुट का पुतला 80 हजार से अधिक में बनता है। क्योंकि पुतले में कागज, लकड़ी, सुतली, सजावट, लोहा, बांस सब लगता है। आतिशबाजी का चार्ज अलग से रहता है। आजकल तो बिजली, रिमोट का सिस्टम भी पुतले में रखने लगे हैं उसकी कॉस्ट ज्यादा पड़ती है। कलाकारों के पास केवल दशहरे का वक्त कमाई का होता है, इसलिए वो बिना समझौते के पैसे मांगता है, ताकि सालभर के गुजारे को पैसा जमा हो जाए।

ये तो रोजी है, मजहबी पाबंदी से क्या मतलब
पीढ़ियों से पुतला बना रहे युनूस, सोहेल कहते हैं दशहरा सत्य और सकारात्मकता की जीत का पर्व है। हमारे बनाए पुतले रामलीलाओं में जलकर समाज को सच की सीख देते हैं। इसमें मजहबी पाबंदियों का कोई मसला नहीं है। हम काम करते हैं उसके पैसे मिलते हैं। ऐसे तो पंचर वाला हिंदू की साइकिल का पंचर न बनाए, उसके घर पर काम न करे। रोजगार में कोई मजहबी भेदभाव नहीं होता। हम हर धर्म की शादी में आतिशबाजी बजाते हैं, बैंड बजाते हैं, घोड़ी पर दूल्हों को ले जाते हैं।