आपके आसपास है गौरेया तो भेजें लोकेशन:मेरठ में वन विभाग जीपीएस लोकेशन से करेगा गौरेया, घौंसले का संरक्षण

मेरठ8 महीने पहले
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गौरेया संरक्षण के लिए उत्तर प्रदेश के मेरठ में वन विभाग ने अनूठी पहल की है। वन विभाग ने शहरवासियों से अपील की है कि उनके आसपास जहां भी गौरेया दिखती हो वहां की लोकेशन और फोटो भेजें। विभाग उस स्थान को संरक्षित कर वहां गौरेया संरक्षण के उपाय करेगा।

1 से 7 अक्तूबर के बीच चलने वाले वाइल्ड लाइफ वीक में ये विशेष अभियान चलाया जाएगा। जिला वन अधिकारी राजेश कुमार कहते हैं कि हर साल गौरेया दिवस तो मनाया जाता है मगर इस दिन को मनाकर भुला दिया जाता है।

आपको इस तरह भेजनी है गौरेया की फोटो, लोकेशन

गौरेया संरक्षण की बात खत्म हो जाती है। ये मुहिम चलती रहे इसलिए यह अभियान शुरू किया है। लोगों को जोड़ते हुए यह अभियान चला रहे हैं। लोगों को जिले में जहां भी गौरेया या उसका घौंसला नजर आए तो वो उसकी जीपीएस लोकेशन वन विभाग को भेजें। कहीं भी गौरैया का घोंसला मिले तो फोटो क्लिक करें और उसे forestmeerut@gmail.com पर भेज दें। इसके बाद वन विभाग अपने स्तर पर वहां पहुंचेगा और मिशन गौरेया में जुट जाएगा।

मेरठ में यहां है गौरेया का प्रमुख ठिकाना

मेरठ में एनएएस पीजी कॉलेज शिवाजी रोड, रेलवे रोड, रामताल वाटिका, कंपनी बाग कैंट, पाइन पार्क मेरठ कैंट, सूरजकुंड पार्क और मेरठ कॉलेज एवं कमिश्नरी पार्क में गौरेया काफी पाई जाती है।

मेरठ में मिले हैं 23 सारस
उत्तर प्रदेश के राज्यपक्षी सारस की गणना के लिए वन विभाग ने मुहिम शुरू की है। अब तक विभाग ने मेरठ में 23 सारस खोजे हैं। वन विभाग के अधिकारी का कहना है कि सारस को संरक्षित करने की पहल की जा रही है. क्योंकि सारस पक्षी भी अब बहुत कम संख्या में नज़र आते हैं. इनकी संख्या बढ़े इसे लेकर भी स्ट्रैटजी बनाई जा रही है. राजेश कुमार बताते हैं कि दो हज़ार चौदह में सारस रो राज्यपक्षी का दर्ज़ा मिला लेकिन अभी इस ख़ूबसूरत पक्षी को संरक्षित करने के लिए बड़े प्रयास होने चाहिए। सारस को संरक्षित करने के लिए यह पहल अपनाई गई है।

छोटी सी चिड़िया है गौरेया
गौरैया सर्दी के मौसम में अक्सर खेतों, पेड़ों पर फुदकती दिखती है। गौरेया 14 से 16 से.मी. लंबी, पंख का फैलाव 19-25 से.मी., वजन 26 से 32 ग्राम होता है। गौरेया की सामान्य पहचान उस छोटी सी चंचल प्रकृति की चिड़िया से है जो हल्के धातु रंग की होती है तथा चीं चीं करती हुई यहां से वहां फुदकती रहती है। गौरेया को पहली बार 1851 में अमेरिका के ब्रुकलिन इंस्टीट्यूट ने इंट्रड्यूस किया था। गौरेया पूरे विश्व में तेजी से दुर्लभ एवं रहस्यमय तरीके से गायब होती जा रही है। लेकिन अब तो रहस्यमय पक्षी बन गई है। अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग नामों से इसे जाना जाता है। गुजरात में चकली, मराठी में चिमनी, पंजाब में चिड़ी, जम्मू तथा कश्मीर में चेर, तमिलनाडु तथा केरल में कूरूवी, पश्चिम बंगाल में चराई पाखी, तथा सिंधी भाषा में झिरकी कहा जाता है।

लगातार कम हो रही गौरेया की संख्या
बीएनएचएस सर्वेक्षण जांच के आधार पर गौरेया की संख्या 2005 तक 97 प्रतिशत तक घट चुकी है। बढ़ता शहरीकरण, खेतों में कीटनाशकों का अंधाधुंध प्रयोग, बढ़ता प्रदूषण, आधुनिक युग में पक्के मकान, लुप्त होते बाग-बगीचे, भोज्य-पदार्थ स्रोतों की उपलब्धता में कमी और बड़े स्तर पर गौरेया को मारना कई कारण है जो गौरेया को पर्यावरण से छीन रहे हैं।

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