24 दिन का धरना, जिससे टिकैत देश में छाए:किसानों के नेता महेंद्र टिकैत की पुण्यतिथि पर जानिए दिलचस्प किस्से, CM वीर बहादुर को पिलाया था मटके से पानी

मेरठ4 महीने पहले
  • कॉपी लिंक

लंबी चौड़ी कद काठी, सिर पर टोपी और कंधे पर एक चादर लिए जब कभी महेंद्र सिंह टिकैत धरने की शुरुआत करते, तो वह धरना आंदोलन बन जाता। टिकैत खूब अच्छी तरह से जानते थे कि SSP और DM जिले के सबसे बड़े अधिकारी हैं, लेकिन आंदोलन के समय किसानों के बीच हमेशा ही SSP को कहते कि दीवान जी आए हैं, इनकी भी सुन लो। DM को कहते हैं कि यह बड़े अधिकारी हैं, लेकिन किसानों के लिए तो लेखपाल ही बहुत बड़ा है।

भारतीय किसान यूनियन के संस्थापक महेंद्र सिंह टिकैत की आज 11वीं पुण्यतिथि है। यूपी के मुजफ्फरनगर जिले के सिसौली गांव में आज किसान नेता उन्हें नमन करने पहुंचे। सुबह के समय हवन किया गया। पुण्यतिथि पर राष्ट्रीय लोकदल के मुखिया जयंत चौधरी, दिल्ली के डिप्टी सीएम मनीष सिसौदिया और हरियाणा के कई नेताओं का सिसौली में पहुंचने का कार्यक्रम है। महेंद्र सिंह टिकैत का जन्म 6 अक्टूबर 1935 को सिसौली गांव में हुआ। 15 मई 2011 को बीमारी के चलते उनका निधन हुआ।

बिजली घर से शुरू हुआ भाकियू का पहला धरना
मुजफ्फरनगर की धरती पर 35 साल पहले एक बिजली घर पर किसानों का धरना शुरू हुआ। यहीं से भारतीय किसान यूनियन का गठन हुआ। तब किसी ने सोचा भी नहीं था कि यही भाकियू एक दिन देशभर के किसानों को एक साथ खड़ा कर देगी।

मेरठ में IG रहे गुरुदर्शन सिंह चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत का हाथ जोड़कर अभिवादन करते हुए। (फाइल फोटो)
मेरठ में IG रहे गुरुदर्शन सिंह चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत का हाथ जोड़कर अभिवादन करते हुए। (फाइल फोटो)

1 मार्च 1987 को महेंद्र सिंह टिकैत ने किसानों के मुददे को लेकर भाकियू का गठन किया। इसी दिन करमूखेड़ी बिजलीघर पर पहला धरना शुरू किया। इस धरने में हिंसा हुई, तो आंदोलन उग्र हो गया और पीएसी के सिपाही और एक किसान की गोली लगने से मौत हो गई। पुलिस के वाहन फूंक दिए गए। बाद में बिना हल के धरना समाप्त करना पड़ा। 17 मार्च 1987 को भाकियू की पहली बैठक हुई, जिसमें निर्णय लिया कि भाकियू किसानों की लड़ाई लड़ेगी और हमेशा गैर-राजनीतिक रहेगी।

1987 में CM वीर बहादुर को करवे से पिलाया पानी
सिसौली गांव के रहने वाले 70 साल के ब्रजवीर सिंह बताते हैं कि सिसौली की पूरे देशभर में पहचान बनी। किसानों के लिए जब भी हक की लड़ाई की बात आई, तो चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत सबसे आगे खड़े रहे। ब्रजवीर सिंह बताते हैं कि 1987 में करमूखेड़ी बिजलीघर पर बिजली कम आना, बढ़े हुए दाम को लेकर धरना शुरू कर दिया। भारतीय किसान यूनियन से उस समय किसानों को जोड़ा जा रहा था। धरना आंदोलन में बदल गया। यूपी के CM वीर बहादुर सिंह थे। उन्होंने कहा कि मैं सिसौली में आना चाहता हूं, लेकिन टिकैत साहब ने शर्त रख दी कि गांव में कांग्रेस या किसी भी दल के नेता और झंडे से परहेज है।

11 अगस्त 1987 को यूपी के मुख्यमंत्री वीर बहादुर हेलिकॉप्टर से गांव में आए। गांव के बाहर से मंच तक CM को पैदल चलना पड़ा। बाद में मंच पर मुख्यमंत्री ने पानी की तरफ इशारा किया, तो महेंद्र सिंह टिकैत ने कहा की गांव है, गर्मी भी है। करवा (पानी का मटका) का पानी पिला पिला दें। पानी के लिए गिलास भी नहीं था, सीएम को दोनों हाथ से ही पानी पीना पड़ा। इसके बाद CM नाराज हुए।

सिसौली में महेंद्र सिंह टिकैत की पुण्यतिथि पर हवन में शामिल किसान। इस दौरान महेंद्र सिंह टिकैत के बेटे राकेश टिकैत और नरेश टिकैत भी शामिल रहें।
सिसौली में महेंद्र सिंह टिकैत की पुण्यतिथि पर हवन में शामिल किसान। इस दौरान महेंद्र सिंह टिकैत के बेटे राकेश टिकैत और नरेश टिकैत भी शामिल रहें।

1988 में पांच लाख से अधिक किसान दिल्ली में जुटे
रालोद के वरिष्ठ नेता डॉ. राजकुमार सांगवान कहते हैं कि 1988 में महेंद्र सिंह टिकैत ने किसानों की आवाज उठाते हुए दिल्ली में आंदोलन का ऐलान कर दिया। 25 अक्टूबर 1988 को दिल्ली में महापंचायत हुई। इसमें अलग-अलग राज्यों के पांच लाख से अधिक किसान जुटे। विजय चौक से लेकर इंडिया गेट तक देश की राजधानी में किसानों का कब्जा रहा। एक सप्ताह तक यह आंदोलन चला और प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने पहल करते हुए किसानों की मांग पूरी करने का वादा करते हुए धरना खत्म कराया। उस समय महेंद्र सिंह टिकैत राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना चुके थे।

मेरठ कमिश्नरी का 24 दिन का ऐतिहासिक धरना
27 जनवरी 1988 को मेरठ में कमिश्नरी के बाहर चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत ने धरना शुरू कर दिया। किसानों की अलग-अलग मांग थी। सरकार को लगा था कि धरना एक या दो दिन में खत्म हो जाएगा। मगर, वेस्ट यूपी के किसानों ने यहां डेरा डाल लिया और धरना 24 दिन तक चला। इसके बाद आंदोलन की आंच मुरादाबाद तक पहुंची और रेलवे स्टेशन को आग के हवाले कर दिया गया। धरना ऐसा कि मेरठ में कैंट इलाके से लेकर कमिश्नरी, कचहरी, चारों तरफ सड़क पर किसानों का ही कब्जा रहा।

खबरें और भी हैं...