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किसान आंदोलन को नई धार देगी मुजफ्फरनगर महापंचायत:5 सितंबर की किसान महापंचायत बदल सकती है यूपी की सियासत के समीकरण, एक मंच पर दिखेंगे हिन्दू-मुस्लिम

मेरठ5 महीने पहलेलेखक: मनु चौधरी
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मुफ्फरनगर में 5 सितंबर को होने वाली किसान महापंचायत के लिए तैयार किया जा रहा मैदान। - Dainik Bhaskar
मुफ्फरनगर में 5 सितंबर को होने वाली किसान महापंचायत के लिए तैयार किया जा रहा मैदान।

5 सितंबर को मुजफ्फरनगर में होने जा रही किसान महापंचायत यूपी में 2022 के सियासी समीकरण बदल सकती है। इस दिन मंच पर हिन्दू और मुस्लिम किसान एक साथ नजर आ सकते हैं। इसका फायदा विपक्ष को मिल सकता है।

इससे पहले 7 सितंबर 2013 को जिले के नंगला मंदौड़ गांव में हुई ऐसी ही एक महापंचायत के बाद हुए दंगों ने सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की ऐसी हवा बहाई थी जिसने भाजपा के लिए सत्ता की राह आसान कर दी थी। दंगों की इसी हवा को भांपते हुए तब भाजपा के PM कैंडिडेट नरेन्द्र मोदी ने अपने चुनाव अभियान के आगाज के लिए वेस्ट यूपी को चुना था।

मोदी ने 2 फरवरी 2014 को मेरठ में विजय शंखनाद रैली में पूरे वेस्ट यूपी से भीड़ जुटाई। उस वक्त मोदी के भाषण के केंद्र में सबसे बड़ा मुददा मुजफ्फरनगर दंगा ही था।

8 साल बाद वही सितंबर का महीना

2013 में कवाल में सचिन और गौरव की हत्या के बाद शाहनवाज की हत्या हुई थी। हत्या से उपजे गुस्से की आग में वेस्ट यूपी सुलग उठा था। 8 साल बाद यह वही सितंबर का महीना है। धरती भी मुजफ्फरनगर की है। इस बार महापंचायत की तारीख 7 नहीं बल्कि 5 सितम्बर है।

7 सितंबर 2013 को महापंचायत के बाद भड़का था दंगा

अब करीब 9 महीने से दिल्ली के बॉर्डरों पर चले रहे आंदोलन में 100 से ज्यादा किसानों की मौत से उपजा गुस्सा किसानों के सीने में धधक रहा है। आठ साल पहले जाटों और मुसलमानों के बीच संघर्ष चरम पर थी। अब फिजाओं में किसान एकता के नारे की गूंज है। तब ध्रुवीकरण को भुनाने के लिए भाजपा फ्रंट फुट पर थी अब किसानों के गुस्से की हवा में बीजेपी को सत्ता से बेदखल करने का ख्वाब लिए विपक्षी दल एकजुट हैं।

7 सितंबर 2013 की इसी महापंचायत के बाद दंगा भड़का
7 सितंबर 2013 की इसी महापंचायत के बाद दंगा भड़का

जनआक्रोश को नहीं भांप सकी थी अखिलेश सरकार

दंगे के वक्त तत्कालीन सपा सरकार जनआक्रोश को भांप नहीं सकी थी तो अबकी बार दिल्ली और यूपी की भाजपा सरकारों किसान आंदोलन को समझने में चूक करती दिखाई दे रही हैं। 9 महीने लंबे ऐतिहासिक किसान आंदोलन ने किसानों को जाति एवं धर्म के आगे जाकर एकजुट होने का रास्ता दिखाया है। दंगे के वक्त चौधरी अजित सिंह पर चुप रहने के आरोप लगे तो उन्होंने वर्ष 2019 में मुजफ्फरनगर से ही लोकसभा चुनाव लड़कर प्रायश्चित किया। चौधरी अजित सिंह पूरे चुनाव बार-बार कहते रहे कि वह यहां चुनाव लड़ने नहीं आपसी भाईचारा कायम कर भाजपा को उखाड़ने आए हैं।

चौधरी अजित चुनाव तो नहीं जीत पाए

चौधरी अजित चुनाव तो नहीं जीत पाए पर यहां किसानों के बीच सदभाव बनाने में उन्होंने जरूर बड़ी भूमिका निभाई। आपसी सद़भाव की इसी जमीन पर किसान आंदोलन की फसल को ताकत मिली है। पंजाब की तरह अब वेस्ट यूपी में भी भाजपा के विधायकों को किसानों के विरोध का सामना करना पड़ रहा है। दंगे के पहले नंगला मंदौड़ की पंचायत में भी भीड़ किसानों की थी पर मंच भाजपा नेताओं के कब्जे में था। अबकी बार किसान महापंचायत का मंच संयुक्त किसान मोर्चा की 40 जत्थेबंदियों और खाप चौधरियों के हाथ में होगा।

2014 की तरह भाजपा मेरठ से ही करेगी चुनावी आगाज या बदलेगी रणनीति

2014 में जब लोकसभा चुनाव का बिगुल बजा तो भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी थे। नरेंद्र मोदी ने विजय शंखनाद रैली की शुरूआत भी वेस्ट यूपी के मेरठ से की। 2 फरवरी 2014 को नरेंद्र मोदी ने कहा की इस धरती को मैं नमन करता हूं, यह चौधरी चरण सिंह की धरती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीअपने भाषण में नरेंद्र मोदी बहन बेटियों की सुरक्षा, गोकशी के मुददे और किसानों को लेकर लगातार बोलते आ रहे हैं। अब सवाल यह है कि ऐसे वक्त में जब भाजपा के विधायक वेस्ट यूपी में किसानों की नाराजगी झेल रहे है।

तब 5 सितंबर की महापंचायत के बाद भी पार्टी अपने चुनाव अभियान का आगाज वेस्ट यूपी से ही करने की स्थिति में होगी। या फिर रणनीति बदल जाएगी और चुनाव अभियान का आगाज अयोध्या या काशी से होगा। 2022 में वेस्ट यूपी में पहले चरण में चुनाव होगा या फिर अंतिम चरण में,यह संकेत भी पांच सितंबर की किसानों की महापंचायत में जुटी भीड़ से मिल ही जाएगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

देशभर में जाएगा महापंचायत का संदेश

मुजफ्फरनगर की महापंचायत में यूपी, उत्तराखंड, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, तेलंगाना और दूसरे राज्यों के किसान भी शामिल होंगे। बालियान, गठवाला खाप एक साथ आ गई हैं। संयुक्त किसान मोर्चा, भारतीय किसान यूनियन ने पूरी ताकत लगा दी है। वेस्ट यूपी में मुस्लिमों व जाटों और किसानों की आबादी वेस्ट यूपी की मेरठ, सहारनपुर, मुरादाबाद, बरेली, आगरा और अलीगढ़ मंडल के 26 जिलों की 114 सीटों पर प्रभाव रखती है। जब जब वेस्ट यूपी में हिंदू व मुस्लिमों का गठजोड़ रहा है, तब तब भाजपा की राह आसान नहीं रही।

2022 में इसलिए अहम है यह किसान महापंचायत

किसानों में लगातार केंद्र सरकार के खिलाफ आक्रोश पनप रहा है। हरियाणा में इसी सप्ताह किसानों पर हुए बर्बरतापूर्ण लाठीचार्ज के बाद मुजफ्फरनगर की किसान महापंचायत को धार मिलनी शुरू हो गई है। 2022 में यूपी में होने वाले विधानसभा चुनाव में अब लंबा समय नहीं है। यूपी के बाद उत्तराखंड, पंजाब और हरियाणा में में भी चुनाव होंगे। ऐसे में किसानो की इस महापंचायत में जुटने वाली भीड़ और यहां से निकले संदेश यूपी की सियासत का रुख तय करेंगे।

बालियान खाप की भूमिका अहम

2019 के लोकसभा चुनाव में पूर्व केंद्रीय मंत्री और किसान नेता अजित सिंह ने मुजफ्फरनगर से चुनाव लड़ा। यहां अजित सिंह के सामने भाजपा के मौजूदा सांसद संजीव बालियान थे। अजित सिंह ने कहा की मैं भाजपा को दफन करने आया हूं, मेरी आत्मा किसानों में बसती है। लेकिन बालियान खाफ ने अपना रुख अजित सिंह की तरफ न करके संजीव बालियान की तरफ किया। जिसका नतीजा यह हुआ की अजित सिंह हार गए। अब रालोद की कमान जयंत चौधरी पर हैं। जयंत चौधरी किसान महापंचायत को समर्थन दे चुके हैं। भाकियू के नेता राकेश टिकैत व नरेश टिकैत भी बालियान खाप से ही हैं, ऐसे में बालियान खाप भाजपा से किनारा कर टिकैत परिवार के साथ खड़ी हो गई है।

डीआईजी सहारनपुर ने लिया पंचायत स्थल का जायजा

मुजफ्फरनगर में जीआईसी मैदान में 5 सितंबर को होने वाली किसान महापंचायत को लेकर पुलिस प्रशासन एक्टिव मोड में है। लगातार सुरक्षा व्यवस्था की मानिटरिंग कर रही है। आज डीआईजी सहारनपुर डॉ. प्रितिनेन्द्र सिंह, भारी पुलिस फोर्स के साथ जीआईसी मैदान पहुंचे।

भारतीय किसान यूनियन के पदाधिकारियों से सुरक्षा व्यवस्थाओं को लेकर बातचीत की। साथ ही दिशा निर्देश भी दिए। डीआईजी के साथ एसएसपी अभिषेक यादव, एडीएम प्रसासन अमित कुमार, सीओ सिटी कुलदीप कुमार सिंह सहित भारी पुलिस फोर्स मौजूद रहा।

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