मेरठ में पैर की हड्डी से बनाया जबड़ा:15 घंटे की मेजर सर्जरी में ओटी में ही हड्‌डी से जबड़ा बनाकर किया ट्रांसप्लांट

मेरठएक महीने पहले
डॉ. उमंग मित्तल, डॉ. भानु प्रताप, डॉ नलिनी मित्तल, डॉ अवनीश,डॉ अश्विनी कोटपाल

मेरठ में डॉक्टरों ने कैंसर मरीज के मुंह में पैर की हड्‌डी से बना जबड़ा फिक्स किया है। चिकित्सकों ने ऑपरेशन थिएटर में मरीज के पैर की हड्‌डी निकालकर उसी समय उसे जबड़े का आकार दिया और मरीज के मुंह में ट्रांसप्लांट कर दिया। 15 घंटे चली मेजर सर्जरी में मरीज को 3 बार एनस्थीसिया दिया गया। मेरठ में 5 चिकित्सकों की टीम ने इस जटिल सर्जरी को सफलता से पूरा किया है। सर्जरी करने वाले चिकित्सकों की टीम के मुख्य चिकित्सक डॉ. उमंग मित्तल ने पूरी सर्जरी को लीड किया। डॉ. मित्तल ने दैनिक भास्कर से क्रिटिकल सर्जरी के 15 घंटों का एक्सपीरियंस शेयर किया

जिंदगी-मौत का सवाल थे वो 15 घंटे

मरीज रामजीत साथ ही पैर की हड्‌डी फिबुला से तैयार किया गया जबड़ा
मरीज रामजीत साथ ही पैर की हड्‌डी फिबुला से तैयार किया गया जबड़ा

डॉ. मित्तल बताते हैं वो 15 घंटे उस मरीज के साथ पूरी टीम के लिए जिंदगी-मौत का सवाल थे। क्योंकि हम अपने मरीज को हर हालत में बचाना चाहते थे। हम जानते थे ये बहुत क्रिटिकल सर्जरी है फिर भी हमने चैलेंज लिया। तीन फेज में इस सर्जरी को कंप्लीट किया। पहले मरीज को एनस्थीसिया देकर उसके मुंह की स्ट्रेचिंग की। पैर की सपोर्टिंग बोन फिबुला को काटकर हमें जबड़ा बनाना था। आर्गेन ट्रांसप्लांट की तरह फिबुला भी आम वातावरण में मर जाती है। इसलिए उसे जल्दी हमें जबड़ा बनाकर फिट करना था। फिबुला को इस तरह निकाला कि उसकी खून की नसें न कटें इसमें काफी समय लगा। फिर मरीज के मुंह में खाल के अलावा कुछ भी नहीं बचा था एक खाली डिब्बे में हमें डिजाइन करना था। पेंशेंट के मुंह का साइज लेकर फिबुला को मोड़ते हुए वहीं ओटी में जबड़ा डिजायन किया। फिर जबड़े को मरीज के मुंह में सेट करके उसे खून की नसों से जोड़ा। पूरा प्रोसेस काफी जटिल था।

20 दिन तक ट्यूब फीडिंग, ऑक्सीजन से सांस
मरीज को नया जबड़ा लगना मतलब नया जीवन है। मरीज 10 दिन वेंटीलेटर पर ही रहेगा। इस दौरान केवल ग्लूकोज दिया जाएगा। बाद में 10 दिन और केवल ट्यूब फीडिंग होगी। जब मरीज का मुंह खुलने, बंद होने लगेगा तब उसे बाहर से पानी पिलाया जा सकता है। मुंह न सूखे इसका ध्यान रखना होगा, साथ ही सांस भी मास्क से दी जाएगी।

13 साल से कैंसर से लड़ रहा मरीज
मेरठ के रहने वाले 63 वर्षीय रामजीत पिछले 13 साल से मुंह के कैंसर का मरीज है। मरीज का इलाज कर रहे डॉ. उमंग मित्तल ने बताया कि 13 साल पहले रामजीत को मुंह का कैंसर डिटेक्ट हुआ था। कैंसर सेल्स बहुत ज्यादा बढ़ने से उस वक्त मरीज का ऑपरेशन किया था जिसमें उसका एक तरफ का जबड़ा हमें रिमूव करना पड़ा। ऑपरेशन के बाद मरीज ठीक था। लगभग 3 साल पहले दोबारा रामजीत को कैंसर रीग्रो होने लगा। जिसके कारण मुंह का लेफ्ट साइड भी खराब होने लगा। अभी तक हम दवाओं से कैंसर सेल्स को कंट्रोल कर रहे थे। लेकिन हालात ज्यादा खराब होने के कारण उसका पूरा जबड़ा निकालना मजबूरी हो गई।

जबड़ा न होने से निष्क्रिय हो जाता है मुंह
डॉ. मित्तल कहते हैं इंसान के मुंह में दांत और जबड़ा दो चीजें होती हैं। अगर दांत नहीं हैं लेकिन जबड़ा है तो उस जबड़े में डेंचर (नकली दांत) लग सकता है। इससे इंसान खा सकता है, मुंह बंद हो जाता है, बोल भी सकता है। लेकिन जब मुंह से जबड़ा ही निकल जाए तो मुंह-जीभ का सपोर्ट खत्म हो जाता है। हर समय जीभ बाहर लटकती रहती है। मुंह खुला रहता है। मुंह खुला रहने के कारण मुंह तेजी से सूखता है, मरीज बोल नहीं सकता। मुंह से लगातार सलाइवा सीक्रेशन होता है। मरीज न खा सकता है, न कुछ पी सकता है। मरीज एक तरह से जिंदा लाश हो जाता है।