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यूपी में सियासत की कांवड़ यात्रा:वेस्ट यूपी में किसान आंदोलन को कमजोर करने के लिए है कांवड़ यात्रा की हठ, यहां शिविरों में तैयार होता है बूथों का एजेंडा

मेरठ11 दिन पहले

यूपी में 2022 के विधानसभा चुनाव से ठीक छह महीने पहले निकलने वाली कांवड़ यात्रा के बड़े सियासी मायने हैं। कोरोना संक्रमण के खतरे और सुप्रीम कोर्ट व केंद्र सरकार की झिझक के बावजूद प्रदेश की योगी सरकार कांवड़ यात्रा के लिए पूरी तरह तैयार है। राजनीतिक जानकारों की मानें तो वेस्ट यूपी से गुजरने वाली कांवड़ यात्रा न सिर्फ किसान आंदोलन की धार कुंद करेगी, बल्कि पूरे सूबे में नया राजनीतिक माहौल भी बनाएगी। 2022 के चुनाव में भाजपा को सीधा लाभ मिल सकता है।

कुंभ, राममंदिर और कांवड़ यात्रा यूपी में भाजपा के चुनावी तरकश के तीन धार्मिक तीर हैं। राममंदिर का मुद्दा मतदाताओं के लिए अब नया नहीं है। कुंभ बीत चुका है। अब कांवड़ यात्रा वो अंतिम मौका है, जिसके जरिए भाजपा अपने हार्ड कोर वोट बैंक को और मजबूत कर सकती है। प्रदेश सरकार कांवड़ यात्रा के लिए तैयार है, वहीं विरोधी दल कोरोना संक्रमण के बहाने इस यात्रा को रोकने में जुट गए हैं।

वेस्ट यूपी में भाजपा के लिए कवच है कांवड़ यात्रा
कांवड़ यात्रा बड़ा धार्मिक अनुष्ठान है। जो उत्तराखंड से दिल्ली के बीच दर्जनों जिलों में असर रखता है। प्रयागराज के दिव्यकुंभ के बाद कांवड़ यात्रा पर योगी सरकार का फोकस बढ़ गया है। जहां दिव्यकुंभ में स्नान करने पहुंचे भक्तों पर हेलीकॉप्टर से फूलों की बरसात हुई थी। ऐसा ही माहौल पश्चिमी यूपी में 2019 में देखने मिला था। जब पहली बार किसी सीएम ने कांवड़ियों पर हेलीकाप्टर से फूल बरसाए। कांवड़ियों के लिए सेवा शिविर बढ़े। मंदिरों, मार्गों की सजावट का बजट बढ़ा। गांव की गलियों से होकर हाइवे तक पहुंचने वाले कांवड़िए अपने साथ बड़ा राजनीतिक संदेश लेकर चलते हैं।

राजनीति के पावर हाउस वेस्ट यूपी में भाजपा पश्चिम क्षेत्र में 14 लोकसभा और 71 विधानसभा सीटों पर हिंदू, मुस्लिम फैक्टर का गहरा प्रभाव होता है। ऐसे में कांवड़ यात्रा से निकलने वाला राजनीतिक संदेश अहम होता है। भारतीय किसान यूनियन और रालोद इस क्षेत्र में किसान आंदोलन को धार दे रहे हैं। वहीं, सत्तासीन भाजपा सरकार कांवड़ यात्रा के सैलाब में मुद्दों को बहाना चाहती है।

सरकार इसी नजरिए से कांवड़ यात्रा को देख रही है। यह यात्रा जहां से गुजरती है वहां का राजनीतिक भूगोल बदलते चलती है। कांवड़ यात्रा भाजपा के लिए कवच का काम करती है। मुस्लिमों को साधने में सपा, रालोद कोई मौका नहीं चूकती। तो भाजपा कांवड़ यात्रा की धार्मिक डोर से सियासत को बांधती है, जो दलितों, पिछड़ों व अन्य जातियों को जोड़ने का काम करती है।

मंत्री- सांसद भी पहुंचते हैं तैयार हुआ एजेंडा

कांवड़ियों के सेवा में लगे शिविर भाजपा, संघ की राजनीति का केंद्र होते हैं। मंत्री, सांसद, विधायक से लेकर जिला, महानगर और बूथ कार्यकर्ता भोलों के छालों पर मरहम लगाते, सेवा करते दिखते हैं। कांवड़ियों के घावों पर लगा भावनाओं का मरहम बूथ पर नया चुनावी माहौल तैयार करता है। प्रसाद के बहाने शिविरों में बूथों को मजबूत करने का एजेंडा तैयार होता है। क्षेत्रीय जनता पूरे सात दिन शिविरों में प्रसाद लेती है। सदस्यता अभियान से लेकर चुनावी चर्चाएं, टिकटों के बंटवारे फाइनल होते हैं। ये शिविर अंदरखाने जनता को नेता से जोड़ने, ब्रांडिंग का काम करते हैं। भाजपा की राजनीति का आधार बूथ की मजबूती है, बूथों को धार इन्हीं शिविरों से मिलती है।

कांवडि़यों के साथ सेवा शिविरों का रेला

हरिद्वार से दिल्ली तक 10 हजार से ज्यादा शिविर लगते हैं। यूपी में योगी सरकार आने के बाद शिविरो की संख्या बढ़ाकर दोगुनी हो गई। प्रशासन नए शिविरों को अनुमति से इंकार करे, मगर धरातल पर सैकड़ों शिविर संचालित होते हैं। जिन्हें रोका भी नहीं जाता न कभी जांच होती। 2019 में हर शिवमंदिर, गलियों, कालोनियों में स्थानीय कांवड़ियों के लिए शिविर लगाए गए। प्रशासन के अनुसार 100 से 150 शिविर कागजों पर हैं, धरातल पर संख्या 8 गुना होती है।

संगमनगरी, वाराणसी में भी तैयारी

कांवड़ यात्रा को प्रदेश सरकार हरी झंडी दे चुकी है। ऐसे में वाराणसी और संगमनगरी भी कांवड़ियों के स्वागत की तैयारी में जुट गई है। वाराणसी में 50 से 70 हजार कांवड़िया हर रोज बाबा विश्वनाथ के दर्शन को आते हैं, सावन सोमवार में यह सैलाब बढ़कर सवा लाख से ऊपर हो जाता है।

दशाश्वमेध घाट पर स्नान कर गंगाजल लेकर शिवभक्त बाबा पर चढ़ाते हैं। मुस्लिम धर्मावलंबी भी शिविर लगाते हैं। अस्सी, भदैनी, शीतला घाट व अन्य गंगाघाटों पर भी रेला रहता है। पुलिस चौबीस घंटे पेट्रोलिंग करती है। प्रयागराज में जिला प्रशासन ने तैयारी शुरू कर दी है। यहां लोग काशी विश्वनाथ में जल चढाते है। घाटों की सफाई शुरू हो गई है। बिहार के लाखों कांवड़िया सुल्तानगंज व देवघर जल चढ़ाने आते हैं।

25 जुलाई से 22 अगस्त तक कांवड़ यात्रा

  • 2019 में 4 करोड़ कांवड़िए गुजरे थे। 2020 में यात्रा कोरोना के कारण नहीं हुई।
  • 25 जुलाई से सावन शुरू हो रहा है जो 22 अगस्त तक रहेगा।
  • 6 अगस्त को शिवरात्रि है, इसके तीन सप्ताह पहले कांवड़ यात्रा प्रारंभ होती है।
  • दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, पंजाब, उत्तर प्रदेश में यात्रा होती है। यूपी के 30 जिलों से यात्रा गुजरती है।
  • दिल्ली, हरियाणा ,राजस्थान, पंजाब, पूर्वी और पश्चिमी यूपी के कांवड़िए हरिद्वार या अयोध्या जाने के लिए यूपी के 30 जिलों से गुज़रते हैं।
  • मुजफ्फरनगर, बागपत, मेरठ, गाजियाबाद, बुलंदशहर, मुरादाबाद, रुड़की, हापुड़, अमरोहा, शामली, सहारनपुर, आगरा, नोएडा, अलीगढ़, बरेली, खीरी, बाराबंकी, अयोध्या, वाराणसी, बस्ती, संतकबीरनगर, गोरखपुर, झांसी, भदोही, मऊ, सीतापुर, मिर्जापुर, लखनऊ प्रमुख है।
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