मुजफ्फरनगर में किसान महापंचायत के सियासी मायने:जाटलैंड किसानों का गढ़ है, सबसे ज्यादा खाप पंचायतें यहीं, छह माह बाद यूपी और उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव

मुजफ्फरनगर5 महीने पहले

केंद्र सरकार के तीन कृषि कानूनों के खिलाफ उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में 5 सितंबर यानी कल किसान महापंचायत है। इसमें संयुक्त किसान मोर्चा के 40 घटक संगठन शामिल होंगे। दावा है कि यह अब तक का सबसे बड़ा किसान जमावड़ा होगा। यहीं से मिशन यूपी की शुरुआत होगी।

मुजफ्फरनगर में इस महापंचायत के आयोजन के कई सियासी मायने हैं। पहला पश्चिमी यूपी का यह जनपद जाटलैंड होने के साथ किसानों का सबसे बड़ा सेंटर है। बालियान और देशखाप जैसी तमाम खाप पंचायतें हैं, जिनकी समाज में गहरी पैठ है। छह महीने बाद यूपी-उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव भी होने वाले हैं। इसका असर दोनों राज्यों पर पड़ेगा।

किसान इस महापंचायत के जरिए दो टूक कहना चाहते हैं कि दिल्ली की सत्ता का रास्ता यूपी से होकर गुजरता है। यदि उनकी बात नहीं मानी जाएगी तो इस राह में वे मुश्किलें खड़ी कर देंगे।

4 पॉइंट में समझिए, क्यों मुजफ्फरनगर में महापंचायत

  • 25 किमी दूर उत्तराखंड, यहां भी अगले साल चुनाव।
  • मेरठ, सहारनपुर, अलीगढ़, आगरा, मुरादाबाद, बरेली मंडल होंगे प्रभावित।
  • यूपी में BJP के खिलाफ माहौल बनने से केंद्र पर दबाव बनेगा।
  • पंचायत चुनाव में पश्चिमी यूपी में भाजपा का गणित बिगड़ गया था। अब विधानसभा में भी कुछ ऐसा ही करने की मंशा है।
मुजफ्फरनगर में जीआईसी ग्राउंड में हरा और सफेद रंग का पंडाल लगाया गया है।
मुजफ्फरनगर में जीआईसी ग्राउंड में हरा और सफेद रंग का पंडाल लगाया गया है।

इसलिए भी महत्वपूर्ण मुजफ्फरनगर

  • मुजफ्फरनगर से सटे सहारनपुर जिले को गेटवे ऑफ यूपी भी कहा जाता है। मुजफ्फरनगर का विधानसभा क्षेत्र नंबर-एक भी सहारनपुर जिले में है। भाजपा सरकार यूपी में अपने ज्यादातर चुनावी अभियानों की शुरुआत सहारनपुर जिले से करती है। मुजफ्फरनगर के पड़ोस में मेरठ है, जिसे वेस्ट यूपी का केंद्र माना जाता है।
  • मुजफ्फरनगर से 25 किलोमीटर आगे चलते ही उत्तराखंड शुरू हो जाता है। उत्तराखंड में भी छह माह बाद विधानसभा चुनाव हैं। इसके अलावा मुजफ्फरनगर भारतीय किसान यूनियन के संस्थापक रहे बाबा महेंद्र सिंह टिकैत का गृह जनपद भी है। उनकी विरासत को अब बेटे नरेश टिकैत और राकेश टिकैत संभाले हुए हैं।
  • किसान आंदोलन में राकेश टिकैत देशभर में एक बड़ा चेहरा बन चुके हैं। इन सब वजहों से इस महापंचायत के लिए मुजफ्फरनगर को चुना गया है। मुजफ्फरनगर महापंचायत का प्रभाव उत्तराखंड समेत पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ, सहारनपुर, अलीगढ़, आगरा, मुरादाबाद, बरेली मंडल पर खासतौर से जाएगा।
जिला फर्रुखाबाद के किसान रात में ही बस से मुजफ्फरनगर को चल दिए थे।
जिला फर्रुखाबाद के किसान रात में ही बस से मुजफ्फरनगर को चल दिए थे।

पंजाब-हरियाणा के किसानों को महापंचायत से बड़ी आस
पंजाब और हरियाणा के किसान अच्छे ढंग से जानते हैं कि केंद्र तक पहुंचने में यूपी का रोल बेहद अहम होता है। इसलिए उन्हें इस महापंचायत से बेहद उम्मीदें हैं। वह चाहते हैं कि महापंचायत सफल हो, ताकि सरकारों पर दबाव बने और तीनों कृषि कानून रद्द हों। कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन को जन्म देने वाला भी पंजाब राज्य था। संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) में ज्यादातर घटक पंजाब-हरियाणा के हैं। एसकेएम दोनों राज्यों में लगातार बैठकें कर रहा है, ताकि बड़ी संख्या में किसान मुजफ्फरनगर पहुंचें। एसकेएम को यह बात अच्छे ढंग से पता है कि सरकार पर दबाव यूपी चुनाव से ही डाला जा सकता है, क्योंकि यूपी के बिना केंद्र की सत्ता हासिल करना आसान नहीं है।

दावा है कि मुख्य मंच पर संयुक्त किसान मोर्चा के घटक संगठनों के नेता ही बैठेंगे।
दावा है कि मुख्य मंच पर संयुक्त किसान मोर्चा के घटक संगठनों के नेता ही बैठेंगे।

किसान आंदोलन इफेक्ट...445 में से महज 99 सीटों पर जीती थी भाजपा
भाजपा पश्चिम क्षेत्र में 14 जिला पंचायत अध्यक्ष सीटें हैं। इनमें 445 पंचायत सदस्य हैं। 445 में से कुल 99 सदस्य भाजपा के बन पाए। भाजपा की इस करारी हार के पीछे मुख्य वजह किसान आंदोलन सामने आया। गांव-गांव पार्टी प्रत्याशियों का विरोध हुआ। कई जगह तो उन्हें बैरंग लौटना पड़ा था। हालांकि कम सदस्य होने के बावजूद जोड़तोड़, बाहुबल से 14 में से 13 जिला पंचायत अध्यक्ष भाजपा के बन गए। एक सीट रालोद के खाते में गई।

14 सीटों में से 7 सीटें मेरठ, बुलन्दशहर, गाजियाबाद, गौतमबुद्धनगर, मुरादाबाद, अमरोहा, सहारनपुर में निर्विरोध जीत हुई। शेष 7 में से 6 सीटों पर भाजपा ने चुनाव जीतकर कुर्सी हासिल की थी। पंचायत चुनाव के इन्हीं नतीजों को ध्यान में रखते हुए किसान संगठन "मिशन यूपी' लांच करने जा रहे हैं।

मुजफ्फरनगर किसान महापंचायत को लेकर हरियाणा में युद्धस्तर पर बैठकें हुईं।
मुजफ्फरनगर किसान महापंचायत को लेकर हरियाणा में युद्धस्तर पर बैठकें हुईं।

महापंचायत के बाद मंडल स्तर पर 18 बैठकें
भाकियू के वरिष्ठ नेता युद्धवीर सिंह बताते हैं, हम महापंचायत तक ही सीमित नहीं रहेंगे। पांच सितंबर की महापंचायत के बाद मंडल स्तरों पर 18 बड़ी बैठकें होंगी। इसके बाद जिला और फिर तहसील स्तरों पर बैठकों का आयोजन होगा। युद्धवीर सिंह ने कहा कि उप्र में चुनाव आने तक हम इसी तरह बैठकों का आयोजन करेंगे और केंद्र-प्रदेश सरकार की खराब नीतियों को बताएंगे। कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों को एकजुट करेंगे।
सरकार-किसानों के बीच 14 स्तर की वार्ता विफल
तीन कृषि कानूनों के खिलाफ देश की राजधानी दिल्ली के बॉर्डरों पर चल रहे धरने का आज 263वां दिन है। सरकार और किसानों के बीच 14 स्तर की वार्ता हो चुकी है, जो हर बार विफल रही। 26 जनवरी को दिल्ली में ट्रैक्टर परेड के दौरान हिंसा के बाद से केंद्र सरकार ने किसानों से कोई बातचीत नहीं की है। भाकियू प्रवक्ता राकेश टिकैत बार-बार दोहरा रहे हैं कि ये मोदी सरकार है और इस सरकार को कंपनियां चलाती हैं। अगर यह सरकार किसी पार्टी की होती तो शायद हमारी समस्याओं का कुछ हल निकल पाता।

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