मुजफ्फरनगर में रालोद को झटका, ‘आसपा’ ने संभाला:मदन भैया के लिए आसान नहीं रहेगा बहारी की छवि से पार पाना

मुजफ्फरनगर2 महीने पहले
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लखनऊ में प्रदेश अध्यक्ष भूपेन्द्र चौधरी के समक्ष भाजपा की सदस्यता ग्रहण करते अभिषेक चौधरी। - Dainik Bhaskar
लखनऊ में प्रदेश अध्यक्ष भूपेन्द्र चौधरी के समक्ष भाजपा की सदस्यता ग्रहण करते अभिषेक चौधरी।

मुजफ्फरनगर में चुनावी बयार बहते ही रालोद को झटका लगा है। पार्टी के मजबूत स्तंभ अभिषेक चौधरी ने मदन भैया को बहारी बताते हुए रालोद छोड़ भाजपा का दामन थाम लिया। हांलाकि आजाद समाज पार्टी अध्यक्ष चन्द्रशेखर ने खतौली में रालोद के समर्थन में उतरने की घोषणा कर हालात को संतुलित करने का प्रयास किया।

बावजूद रालोद प्रत्याशी मदन भैया के लिए बहारी की छवि से बाहर आना इतना आसान नहीं रहेगा। उधर पार्टी छोड़ते अभिषेक चौधरी को मनाने का प्रयास न करना रालोद के लिए सियासी तौर से भले ही अधिक नुकसानदेय साबित न हो, लेकिन चौ. चरण सिंह की नीतियों पर चलने का दम भरने वाले इस दल के लिए यह घोर अनैतिक जरूर रहेगा।

आजाद समाज पार्टी अध्यक्ष चन्द्रशेखर ने खतौली में रालोद प्रत्याशी को समर्थन देने की घोषणा की।
आजाद समाज पार्टी अध्यक्ष चन्द्रशेखर ने खतौली में रालोद प्रत्याशी को समर्थन देने की घोषणा की।

बहारी चाटते रहे मलाई, स्थानीय बिछाते रह गए दरी

मौजूदा सियासत अपना मयार खोती जा रही है। कई बार ऐसे मौके आए जब स्थानीय पार्टी कार्यकर्ता नेताओं के लिए दरी ही बिछाते रह गए और चुनाव आते ही टिकट बहारी लोग झटक ले गए। हांलाकि जिले की सियासी सरजमी ऐसे बहारी नेताओं के लिए हमेशा मुफीद रही। चाहे मुजफ्फरनगर से लोकसभा चुनाव जीत देश के गृहमंत्री बने जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद रहे हों या फिर हरियाणा की अनुराधा चौधरी। या फिर भड़ाना बंधु।

इन सब का उन नेताओं में शुमार है, जो हेलीकाप्टर रातोंरात से जिले की राजनीति में उतरे और अपनी जीत की इबारत लिखकर वर्षो तक छाए रहे। लेकिन इस क्रिया में स्थानीय नेताओं के लिए दरी बिछाते रहे जमीनी कार्यकर्ताओं के हाथ सिर्फ निराशा ही लगी। बहारी को टिकट दिये जाने से उनका कोटा ही कटा।

अब अभिषेक गुर्जर हुए आयातित नेता का शिकार

बसपा से सियासी सफर शुरू करने वाले अभिषेक चौधरी गुर्जर पिछले कुछ वर्ष से रालोद में सक्रिय थे। पहले बसपा के लिए दिन रात एक कर अपना वजूद कायम किया। लेकिन टिकट के नाम पर उन्हें वहां से निराशा हाथ लगी। जिस पर उन्होंने रालोद का रुख तय किया। लगातार कार्यक्रम और जनसंपर्क से वह रालोद मुखिया स्व. चौ. अजित सिंह और फिर जयंत चौधरी के काफी करीब आए।

लेकिन चुनाव दर चुनाव अभिषेक को सिर्फ आश्वासन ही हाथ लगे। कोर्ट से 2 साल की सजा होने पर खतौली से भाजपा विधायक विक्रम सैनी की सदस्यता समाप्त होने पर फिर से चुनाव घोषित हुए तो इस बार अभिषेक को उम्मीद की किरण नजर आई। उप चुनाव में पार्टी की और से इशारा पाकर अभिषेक ने खतौली क्षेत्र में जयंत चौधरी की जनसभा कराई।

लेकिन उसके कुछ घंटे बाद ही रालोद की और से खतौली सीट पर खेकड़ा के चार बार के पूर्व विधायक गाजियाबाद निवासी मदन भैया को पार्टी प्रत्याशी घोषित कर दिया गया। जिससे आहत अभिषेक चौधरी ने रालोद छोड़ने की घोषणा कर प्रदेश अध्यक्ष भूपेन्द्र चौधरी के सामने लखनऊ में भाजपा का दामन थाम लिया। तर्क दिया कि बहारी प्रत्याशी के समर्थन में वह पार्टी में कार्य नहीं करेंगे।

जिले की सियासत के शांत पानी में धीरे से फेंका कंकड़

अभिषेक जैसे निष्ठावान कार्यकर्ता का पार्टी छोड़कर दूसरे दल में चले जाना रालोद के लिए झटका है। निश्चित तौर से जिस मुद्दे पर अभिषेक ने रालोद छोड़ने की घोषणा की वह पार्टी को नैतिक तौर से कटघड़े में खड़ा करता है।

संभव है अभिषेक की अनुपस्थिति रालोद के लिए वोट की बड़ी चुनाैती खड़ी न कर पाए लेकिन इसने निष्ठावान कार्यकर्ताओं की आंखे जरूर खोल दी होगी। अभिषेक के जाने से रालोद वोट का गणित गड़बड़ाने की बात भले ही न स्वीकारे, लेकिन उन्हें रोकने का प्रयास न करना इस दल काे अनैतिक की श्रेणी में जरूर ला खड़ा करता है।

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