"घोड़ा निकल रहा शाहे मशराकेन का":मुजफ्फरनगर में 8 मोहर्रम के जुलूस में रोए सोगवार, कुर्बानियों का किया जिक्र

मुजफ्फरनगर4 महीने पहले
मोहर्रम की 8 तारीख के जुलूस में जुलजुना (घोड़ा इमाम) की जियारत करते सोगवार।

घोड़ा निकल रहा है शाहे मशराकेन का, मकतल में भी साथ न छोड़ा हुसैन का। इन सदाओं के साथ मुजफ्फरनगर में 8 मोहर्रम के जुलूस में रविवार को शिया सोगवारों ने इमाम हुसैन की याद में मातम किया।

सीनाजनी करते हुए सोगवार आगे बढ़े और नोहाख्वानी कर आंसु बहाए। मजलिस के बाद जुलूस निकला। पुराने रास्तों से होता हुआ जुलूस आगे बढ़ा। सोज-सलाम और अलम के साथ जुलूस की अगुवाई अंजुमन खादिम ए हुसैन सुन्नी ने की।

शहर की गलियों से निकलता हुआ मोहर्रम का जुलूस।
शहर की गलियों से निकलता हुआ मोहर्रम का जुलूस।

हक के लिए हुसैन ने पेश की थी कुर्बानी: मौलाना इरम काजमी

रविवार को इमामबारगाह अबुपुरा में 8 मोहर्रम की मजलिस करीब 3 बजे शुरू हुई। मजलिस को संबोधित करते हुए मौलाना इरम काजमी ने फरमाया कि इमाम हुसैन ने हक और सच्चाई के लिए मैदान ए करबला में अपनी और अपने जांनिसारों की बेशुमार कुरबानियां पेश की।

उन्होंने फरमाया कि जुल्म सहकर भी इमाम हुसैन ने यजीद की नाजायज बात नहीं मानी। उन्होंने कहा कि हुसैन की इन कुर्बानियों तथा करबला के मैदान में दी गई शहादत की याद में ही कौम आंसु बहाती है।

जुलूस के दौरान शिया सोगवार।
जुलूस के दौरान शिया सोगवार।

मौलाना इरम काजमी ने कहा कि इमाम हुसैन ने शहादत पेश कर अपने नाना के दीन को बचा लिया। मौलाना ने कहा कि यही वजह है कि आज यजीद का नाम लेने वाला कोई नहीं और हुसैन की याद में लोग आंसु बहाते हैं।

उन्होंने लोगों से कहा कि आप भी इमाम हुसैन के जीवन को अपने आचरण में उतारे। बच्चों को ऐसी शिक्षा दें जो सच्चाई के रास्ते पर चलें और हमेशा सच्चाई का साथ दें। कहा कि बच्चों को अच्छाई और बुराई के बीच भेद करना सिखाएं।

ताकि वे जान सकें कि इमाम हुसैन का दिखाया रास्ता जिंदगी और आखिरत की कामयाबी की मंजिल की और ले जाता है। मजलिस से पहले सोजख्वानी और मर्सियाख्वानी एड. जैगम जैदी और मशहदी रजा जैदी ने की।

मजलिस के बाद जुलूस निकला। जुलूस कस्साबान, लोहिया बाजार, मोती महल होता हुआ नावल्टी चाैक से शिव चौक पहुंचा। यहां से जुलूस भगत सिंह रोड होता हुआ पारस नाथ घास मंडी पहुंचा। इस दौरान जुलजुना के सामने आरशद अली, अली मियां तथा मुन्ना आदि ने सवारी पढ़ी। नोहाख्वानी साहेबे आलाम, असकरी और शबी हैदर तथा लारेब व सोनु आदि ने की।

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