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मथुरा में साँझी उत्सव शुरू:विदेशी भक्तों ने पहुंचकर जाना ब्रज की संस्कृति को, भगवान कृष्ण को प्रसन्न करने के लिए राधा जी बनाती थीं साँझी

मथुरा2 महीने पहले
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वृन्दावन शोध संसथान में चल रहे सांझी महोत्सव में सांझी कला को देखते हुए विदेशी भक्त - Dainik Bhaskar
वृन्दावन शोध संसथान में चल रहे सांझी महोत्सव में सांझी कला को देखते हुए विदेशी भक्त

वृन्दावन के देवालयों में साँझी उत्सव प्रारम्भ हो गया है। साँझी के दर्शन करने के लिए श्रद्धालु मन्दिरों में उमड़ने लगे हैं। कंवारी कन्याएं सुंदर पति पाने की चाह में इस उत्सव को मनाती हैं, जबकि मन्दिरों में ठाकुर जी को सुख प्रदान करने के भाव से साँझी का निर्माण किया जाता है।

वृन्दावन शोध संस्थान में मनाया सांझी महोत्सव

वृन्दावन शोध संस्थान में आयोजित सांझी महोत्सव के अंतर्गत स्थानीय प्रशिक्षणार्थियों सहित विदेशी संस्कृति प्रेमियों ने भी सहभागिता की। इस अवसर पर विदेशी भक्तों ने सांझी कला के प्रति अपना प्रेम दिखाते हुए इसे ब्रज संस्कृति का प्रतीक बताया। शास्त्र सेवा प्रकल्प द्वारा प्रस्तुत नाम संकीर्तन ध्वनि तथा सांझी कला महत्व को समझ संस्कृति प्रेमी विदेशी अभिभूत हो उठे।

विदेशियों को दिया सांझी कला बनाने का प्रशिक्षण

सांझी कला महोत्सव देखने पहुंचे विदेशी भक्तों को रघुनाथ भट्ट गोस्वामी पीठ भट्ट जी की हवेली के आचार्य शैलेंद्र कृष्ण भट्ट, विभु कृष्ण भट्ट, मालव गोस्वामी तथा राधारमण मंदिर से वैष्णवाचार्य सुमित गोस्वामी द्वारा प्रतिभागियों को प्रशिक्षण दिया गया। इस अवसर पर आचार्य शैलेंद्र कृष्ण भट्ट ने कहा सांझी ब्रज की महत्वपूर्ण कला है।

श्रीकृष्ण संस्कृति में रची-पगी इस परंपरा को आज अंतर्राष्ट्रीय पटल पर साझा करने की जरूरत है। आचार्य सुमित गोस्वामी ने बताया सांझी कला देवालयी परंपरा में उपासना का अंग है। आचार्य विभुकृष्ण भट्ट ने कहा ज्यामितीय कला तथा अलंकारिक बेल-बूटों के संयोजन से सांझी का कला पक्ष उत्तरोत्तर समृद्ध हुआ है। इन्द्रद्युम्न स्वामी जी ने कहा वर्तमान में श्रीकृष्ण भक्ति से जुड़ी इस कला के अंतर्राष्ट्रीय प्रचार-प्रसार की आवश्यकता है।

इन देशों के प्रतिनिधियों ने की सहभागिता

महोत्सव में यूक्रेन, उजबेकिस्तान, रशिया, कजाकिस्तान, जर्मनी, बेलारूस, फ्रांस, इंग्लैंड, न्यूजीलैंड, अमेरिका, मालदीव एवं दक्षिण अफ्रीका आदि के प्रतिभागी उपस्थित रहे। कार्यक्रम के अंतर्गत मंजरी दासी, नरोत्तमदास, पद्यावलीदासी, मंजुला दासी, चंचल अक्षी, वृंदावन सुंदरी, ब्रज चंद्रिका, वृंदा रानी, ऋषिकेश गंगा, विष्णु तत्वदास, कर्तामसी, धनिष्ठा, मनीकुंतला, ब्रज सुंदरी, श्यामा प्रेमी इन सबके अलावा हनुमान प्रसाद धानुका विद्यालय से पधारीं शिक्षिकायें एवं छात्र-छात्राएं अंजलि गुप्ता, शिल्पी रानी, प्रीति सिकरवार, राधिका, रेखा, वर्तिका, नवनीत शर्मा, यशवंत, प्रज्ञा शर्मा ने प्रतिभागिता कीं। कार्यक्रम के दौरान ममता कुमारी, प्रगति शर्मा, उमाशंकर पुरोहित, रजत शुक्ला, करूणेश उपाध्याय, कृष्ण कुमार मिश्रा, ब्रजेश कुमार, शिवम शुक्ला, अशोक दीक्षित एवं करवेन्द्र सिंह आदि संस्थान कर्मी उपस्थित रहे।

मंदिरों में भी बनाई सांझी

पितृ पक्ष में वृन्दावन के प्रमुख मंदिरों में साँझी का निर्माण किया गया।राधावल्लभ मन्दिर में नित्य पुष्पों से साँझी बनाई गयी। एकादशी से अठखम्बा स्थित भट्ट जी मन्दिर में साँझी का निर्माण प्रारम्भ हुआ। भट्ट जी की हवेली में बनने वाली साँझी की परंपरा काफी प्राचीन है। इसके साथ साथ राधारमण मन्दिर, शाहजहां पुर वाले मन्दिर, प्रिया वल्लभ कुंज, यशोदानंदन,हिताश्रम आदि मन्दिरों में भी साँझी का निर्माण किया जाता है। साँझी एक आनुष्ठानिक पर्व है।साँझी को देव मान कर आराधना की जाती है।

मन बांच्छित फल पाइये जो कीजे इन्हें सेव । सुनो कुंवरि वृषभानु की यह साँझी साचौं देव ।।

भट्टजी के मंदिर में बनने वाली साँझी ब्रज के प्राचीनतम घरानों में से एक है। साँझी निर्माण की प्रक्रिया काफी श्रमसाध्य है।प्रातःकाल से ही यह प्रकिया प्रारम्भ होती है।

क्या है सांझी

सांझी कला ब्रज संस्कृति की प्राचीन लोक परम्परा से जुड़ी वो विरासत है जिसे कृष्णकालीन माना गया है। श्राद्धपक्ष में एकादशी से पितृ अमावस्या तक धार्मिक नगरी के प्रमुख मंदिरों में मनाये जाने वाला यह उत्सव अब अपनी नई सांस्कृतिक पहचान बना रहा है। सांझी यानि साज श्रंगार एक ऐसी लोक कला है जिसका उदभव कृष्णकालीन बताया जाता है। धार्मिक ग्रन्थो में मान्यता है कि श्री कृष्ण को प्रसन्न करने के लिये स्वयं राधारानी वन में फूल चुनकर झांकिया बनाती थी। इसी से जुड़ा एक पद प्रचलित है।

मनवांछित फल पावे जो कीजे इन्हें सेव। सुनो कुँवरि वृषभानु की यह सांझी साँचो देव।

यह भी माना जाता है कि अच्छा वर पाने के लिये कुँवारी लडकिया वन देवता को प्रसन्न करने के लिए रंगों, गाय के गोबर, मिट्टी आदि से यह झांकियां बनाती है। वहीं मन्दिरों में ठाकुर जी को सुख प्रदान करने के भाव से साँझी का निर्माण किया जाता है।