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बुंदेली दीवाली:ब्रज में दिखी बुंदेली दीवाली की झलक, बुन्देलखण्ड के 51 जिलों से ब्रज पहुँचे श्रद्धालुओं ने की भगवान की नाच गा कर आराधना

मथुराएक महीने पहले
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ढोलक की थाप पर नाच गा कर भगवान की आराधना करते बुंदेलखंड से आये श्रद्धालु - Dainik Bhaskar
ढोलक की थाप पर नाच गा कर भगवान की आराधना करते बुंदेलखंड से आये श्रद्धालु

भाई दौज पर ब्रज में बुंदेली दीवाली की झलक देखने को मिली। बुंदेलखंड की 51 जिलों से आये श्रद्धालुओं ने पहले यमुना स्नान किया फिर मंदिरों के दर्शन किये और उसके बाद नाच गा की भगवान की आरधना। अलग अलग टोलियों में आये श्रद्धालु मस्ती में सराबोर नजर आए। ढोलक की थाप और लटठ की धमक के साथ अनोखा नृत्य समा बांध रहा था। यमुना स्नान के बाद जल ग्रहण कर रहे श्रद्धालु दीवाली के अवसर पर 12 वर्ष मौन व्रत धारण करते हैं।

दीवाली नृत्य कर की ब्रज यात्रा पूरी

बुंदेलखंड के अलग अलग जिलों से आये श्रद्धालुओं के गुट ढोलक की थाप पर दीवाली नृत्य करते हुए नजर आए। रंग-बिरंगी पहनावा के साथ अनोखी साज-सज्जा लिए छोटी-छोटी टोलियां बनाकर श्रद्धालु भगवान श्री कृष्ण की विशेष उपासना कर रहे थे।

12 वर्ष दीवाली पर रखते हैं मौन वृत

बुंदेलखंड के हमीर पुर जिले से आये पंडित श्याम सुंदर त्रिपाठी ने बताया कि बुंदेलखंड में बहुत लोग दीवाली के अवसर पर मौन वृत रखकर भगवान कृष्ण की आरधना करते हैं। यह वृत 12 वर्ष तक रखा जाता है। पहले 12 साल तक दीवाली , गोवर्धन पूजा और भाई दौज पर 7 गांव की परिक्रमा की जाती है और फिर 13 वीं साल इस वृत को पूरा करने के लिए मथुरा वृंदावन आते हैं।

यमुना में करते हैं मोर पंख का विसर्जन

बुंदेली दीवाली की खास बात है मोर पंख। 12 साल तक मौन वृत रखने वाले व्यक्ति को पहली साल पूर्व में वृत रखकर अपना संकल्प पूरा कर चुका व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार मोर पंख देता है। इसके बाद हर साल मौन व्रत रखने वाले व्यक्ति को 11, 21, 31 मोर पंख बढ़ाने होते हैं। खास यह है कि मोर पंख खरीदकर नहीं बल्कि जंगल मे ढूंढकर लाने होते हैं। इस तरह 12 साल में मोर पंखों की एक व्यक्ति पर संख्या 250 से 300 तक पहुंच जाती हैं। जिनको 13 वीं साल मथुरा वृंदावन में आ कर यमुना में विसर्जन किया जाता है।

नृत्य के साथ गाते हैं भगवान के भजन

इस दौरान गोपियों के तर्ज पर ही श्रद्धालु मोर पंख लिए ढोलक की थाप पर रंग बिरंगी पोशाकों के साथ नृत्य करते हैं । लट्ठ की धमक से दिवारी खेलते हैं । इस दौरान वह भगवान कृष्ण को रिझाने के लिए स्वरचित लोक गीतों का भी गायन करते रहते हैं। जिससे माहौल भक्तिमय हो जाता है।

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