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बीमारी से निधन:राम जन्मभूमि विवाद पर फैसला सुनाने वाली इलाहाबाद हाईकोर्ट पीठ में शामिल जस्टिस डीवी शर्मा का निधन

प्रयागराज2 महीने पहले
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जस्टिस डीवी शर्मा ने रामजन्मभूमि मंदिर फैसले में अपनी अलग राय देते हुए कहा था कि विवादित परिसर भगवान राम की जन्म स्थली है - Dainik Bhaskar
जस्टिस डीवी शर्मा ने रामजन्मभूमि मंदिर फैसले में अपनी अलग राय देते हुए कहा था कि विवादित परिसर भगवान राम की जन्म स्थली है
  • राम मंदिर जन्मभूमि विवाद में जस्टिस वर्मा के अलावा जस्टिस एसयू खान और जस्टिस सुधीर अग्रवाल शामिल थे।

अयोध्या के राम जन्मभूमि विवाद पर 30 सितंबर 2010 को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ की ओर से सुनाए गए ऐतिहासिक फैसले में शामिल जस्टिस धर्मवीर शर्मा का 7 मई 2021 को निधन हो गया। वह 73 साल के थे। सेवानिवृत्त होने के बाद वह परिवार के साथ लखनऊ में रह रहे थे। पिछले कुछ दिनों से बीमार थे। राम मंदिर जन्मभूमि विवाद में जस्टिस वर्मा के अलावा जस्टिस एसयू खान और जस्टिस सुधीर अग्रवाल शामिल थे।

रिटायरमेंट के बाद लखनऊ में हो गए थे शिफ्ट

जस्टिस धर्मवीर शर्मा का जन्म 02 अक्टूबर 1948 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के एक किसान परिवार में हुआ था। 1970 में वकालत की डिग्री हासिल करने के बाद जस्टिस शर्मा ने उत्तर प्रदेश में मुख्य कानून अधिकारी और सहायक न्यायिक सचिव जैसे पदों पर काम किया। वर्ष 2002 में उनकी नियुक्ति ज़िला और सत्र न्यायाधीश के रुप में हुई। अगस्त, 2003 से अगस्त, 2004 के बीच वो उत्तर प्रदेश सरकार में प्रधान न्यायिक सचिव रहे। वर्ष 2005 में अतिरिक्त जज के रुप में उनकी पदोन्नति हुई और सितंबर, 2007 में उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट के स्थाई जज के रुप में शपथ ली थी। जस्टिस शर्मा 01 अक्टूबर, 2010 को अपने पद से सेवानिवृत्त हो गए थे।

राम जन्म भूमि विवाद में पीठ के दो जजों से अलग थी जस्टिस शर्मा की राय

अयोध्या के राम जन्मभूमि विवाद पर 30 सितंबर 2010 को फैसला सुनाने वाली इलाहाबाद हाई कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ में शामिल जस्टिस डीवी शर्मा की राय बाकी दो न्यायाधीशों जस्टिस एसयू खान और सुधीर अग्रवाल से अलग थी। जस्टिस एस यू खान और सुधीर अग्रवाल का कहना था कि विवादित परिसर की 2.7 एकड़ जमीन को तीन हिस्सों में बांटा जाएगा और इसे सुन्नी वक्फ बोर्ड निर्मोही अखाड़ा एवं रामलला पर दावा जताने वाले हिंदू समुदाय को दिया जाएगा जहां अस्थाई तौर पर रामलला विराजमान है।

उस जगह को हिंदुओं को दिया गया था जिसमें जस्टिस डीवी शर्मा ने अपनी अलग राय देते हुए कहा था कि विवादित परिसर भगवान राम की जन्म स्थली है इस स्थल पर मुगल शासक बाबर ने मंदिर को तोड़कर मस्जिद का निर्माण कराया था। परिसर में स्थित मस्जिद के परीक्षा के बाद यह बात साफ हो जाती है इसलिए पूरा विवादित परिसर हिंदुओं को दिया जाए।

अपने फैसले में जस्टिस धर्मवीर शर्मा ने कही थी ये बातें

विवादित स्‍थल भगवान राम का जन्‍मस्‍थान है। जन्‍मस्‍थान एक विधिक व्‍यक्ति होता है। यह स्‍थान भगवान राम के बाल रूप की दैवीय भावना को प्रदर्शित करता है। हर व्‍यक्ति को किसी भी रूप में उनका ध्‍यान करने का अधिकार है। विवादित भवन का निर्माण बाबर ने करवाया था। इसके निर्माण के वर्ष के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता है, लेकिन इसे इस्‍लाम के सिद्धांतों के खिलाफ बनवाया गया था। इसलिए इसको मस्जिद नहीं कहा जा सकता है। विवादित ढांचे को उसी जगह ये पुरानी संरचना को गिराकर बनवाया गया था।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा उपलब्‍ध कराए गए साक्ष्‍यों से यह साबित हुआ है कि वह संरचना हिंदुओं का एक विशाल धार्मिक स्‍थान था। विवादित ढांचे के मध्‍य गुंबद में 1949 के 22-23 दिसंबर की रात को मूर्तियां रखी गई थीं। विवाद के दो पक्षकारों सुन्‍नी सेंट्रल वक्‍फ बोर्ड और निर्मोही अखाड़ा के दावे समयबाधित नहीं हैं। यह स्‍थापित हुआ है कि वाद में शामिल की गई संपत्ति रामचंद्र की जन्‍मभूमि है और हिंदुओं को उनकी पूजा करने का अधिकार है।

यह स्‍थान उनके लिए दैवीय है और ये अनंतकाल से इसकी तीर्थयात्रा कर रहे हैं। यह साबित हो चुका है कि विवादित स्‍थल का बाहरी परिसर भी हिंदुओं के कब्‍जे में था। अंदर के परिसर में भी वे पूजा करते रहे हैं। यह भी स्‍थापित हो चुका है कि विवादित ढांचे को मस्जिद नहीं माना जा सकता है क्‍योंकि उसे इस्‍लाम के सिद्धांतों के खिलाफ बनाया गया था।

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