राजनीति के किरदार और किस्से-9:रेप की कोशिश पर दलित महिला ने ठाकुर को घायल कर दिया था, थाने में बोली- मायावती सीएम हैं बचा लेंगी

13 दिन पहलेलेखक: राजेश साहू

मायावती पर दलित वर्ग का भरोसा कम हो रहा है। यूपी चुनाव 2022 के नतीजे इसकी पुष्टि करते हैं, लेकिन 2007 से पहले ऐसा नहीं था। जनता मायावती को देवी मानती थी। जब भी लगता था कि लोकप्रियता कम हो रही, मायावती रैलियों में बोल देती, दलित की बेटी होने के कारण ही मुख्यमंत्री बनी और हेलिकॉप्टर से आपके पास आई हूं। इतना सुनने के बाद सामने बैठी जनता का सीना गर्व से फूल जाता और वह 'जब तक सूरज चांद रहेगा मायावती का नाम रहेगा' नारा लगाने लगते। आज राजनीति के किरदार और किस्से सीरीज की कहानी में मायावती के दलित प्रेम की बात करेंगे।

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कहानी की शुरुआत में हम बात जौनपुर की एक घटना की करेंगे जो यह साबित करती है कि मायावती सत्ता में होती हैं तो दलितों को उन पर कितना भरोसा होता है...

ठाकुर ने लोन दिलवाने के लिए दलित महिला से 10 हजार लिया
8 सितंबर 2007 को तहलका पत्रिका ने जौनपुर की एक घटना छापी। इस खबर के मुताबिक 2005 में 45 साल की एक दलित विधवा महिला फूलपत्ती देवी से गांव के ही देवेंद्र सिंह ने 10 हजार रुपए ठग लिए। महिला को अपनी बेटी की शादी के लिए 60 हजार रुपए का लोन चाहिए था। देवेंद्र ने कहा, 10 हजार दे दीजिए हम दिलवा देंगे। फूलपत्ती देवी ने किसी तरह से इंतजाम करके 10 हजार रुपए देवेंद्र को दे दिया।

एक साल बीत गए लेकिन लोन का पैसा नहीं मिला। फूलपत्ती पूछती तो देवेंद्र कहता, "बैंक तुम्हारी अर्जी पर अभी गौर नहीं कर पाई है।" इस दौरान देवेंद्र बैंक बुलाने के बहाने फूलपत्ती से दो बार छेड़खानी कर चुका था। फूलपत्ती दोनों ही बार बच गई। अब उसे देवेंद्र पर भरोसा नहीं रहा इसलिए उसने अपने 10 हजार रुपए वापस मांगने शुरू किए।

मायावती रैलियों में जाती तो 5-6 हजार लोग सिर्फ उनका हेलिकॉप्टर देखते रहते थे।
मायावती रैलियों में जाती तो 5-6 हजार लोग सिर्फ उनका हेलिकॉप्टर देखते रहते थे।

देवेंद्र ने रेप की कोशिश की तो फूलपत्ती ने करारा जवाब दिया
मई 2007 में एकदिन देवेंद्र रात 8 बजे फूलपत्ती के घर पहुंचा और कहा, "मैं तुम्हारे पैसे दो दिन में वापस कर दूंगा।" फूलपत्ती बोली, "यह बात तुम कल सुबह भी बता सकते थे।" देवेंद्र बोला, "मैं इधर से ही निकल रहा था तो सोचा तुम्हें बताता जाऊं। अच्छा तुम मुझे चलो उस नीम के पेड़ तक छोड़ दो।" नीम का पेड़ घर से 200 मीटर की दूरी पर था। फूलपत्ती ने हामी भर दी।

फूलपत्ती के साथ जबरदस्ती की गई तो उसने चाकू निकाला और देवेंद्र पर हमला कर दिया। यह सांकेतिक तस्वीर है।
फूलपत्ती के साथ जबरदस्ती की गई तो उसने चाकू निकाला और देवेंद्र पर हमला कर दिया। यह सांकेतिक तस्वीर है।

नीम के पेड़ के पास पहुंचे तो देवेंद्र ने छेड़खानी शुरू कर दी। फूलपत्ती ने इस बार बिना कुछ बोले ऐसा दिखाया, जैसे सहमति दे दी हो। देवेंद्र ने कपड़े उतार दिए। फूलपत्ती ने अपनी कमर में बंधी चाकू को निकाला और एक जोर के प्रहार से देवेंद्र का गुप्तांग काट दिया। शोर मचा तो गांव वालों ने देवेंद्र को अस्पताल पहुंचाया। अगले दिन फूलपत्ती चाकू और कटा लिंग लेकर थाने पहुंच गई।

हिम्मत कहां से आई पूछा तो जवाब दिया, मायावती हैं न
पुलिस ने फूलपत्ती को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया। जौनपुर सेंट्रल जेल में तहलका के रिपोर्टर ने पूछा, "ऐसा करने की हिम्मत कहां से आई?" फूलपत्ती ने जवाब दिया, मैने सोचा, "अब सत्ता मायावती के हाथ में है, वे मुझे बचा लेंगी।" यह वह जवाब था जिससे पता चलता है कि मायावती अपनी बिरादरी वालों के लिए कितना मायने रखती थीं।

2007 में सीएम बनने के बाद मायावती नए रूप में नजर आई
मायावती 13 मई 2007 को चौथी बार मुख्यमंत्री बनी। इसके बाद उन्होंने अगले तीन महीने के अंदर कई बार प्रेस कॉन्फ्रेंस की, लेकिन एक बार भी किसी पर मनुवादी होने का आरोप नहीं लगाया। 2005 तक वह 'बहुजन समाज' की बात करती थी लेकिन जैसे ही सीएम बनी बहुजन समाज शब्द 'सर्वजन समाज' में बदल गया।

मायावती 2007 में जब सीएम बनी तो वह बहुजन हिताय के बजाय सर्वजन हिताय की बात करने लगी थीं।
मायावती 2007 में जब सीएम बनी तो वह बहुजन हिताय के बजाय सर्वजन हिताय की बात करने लगी थीं।

सीएम बनने के बाद मायावती आर्थिक पैकेज की मांग को लेकर उस वक्त के पीएम मनमोहन सिंह से मिलने पहुंची। उन्होंने पीएम के सामने ऊंची जाति के गरीब लोगों के लिए आर्थिक आरक्षण का प्रस्ताव रखा। वापस लौटी तो मीडिया ने पूछा, "दलित समुदाय के लिए क्या मांगा?" मायावती ने भौहें चढ़ाईं और गरज कर कहा था, "हम जाति और धर्म की भाषा में नहीं सोचते।"

दलितों का मायावती प्रेम कैसे बढ़ता चला गया इसके लिए हमें दलितों की लड़ाई लड़ने वाले दलित पैंथर के बारे में थोड़ा सा जानना पड़ेगा

दलितों के खिलाफ अपराध रोकने के लिए बना संगठन
1972 के आसपास महाराष्ट्र सहित देश में दलितों के खिलाफ अपराध बढ़ा तो दलित पैंथर नाम से संगठन बन गया। संस्थापक सदस्यों में रामदास आठवले, प्रोफेसर अरुण कांबले, एसएम प्रधान थे। स्थापना के वक्त एक घोषणा पत्र जारी हुआ। कहा गया, "हमें ब्राह्मण क्षेत्र में जगह की जरूरत नहीं है, हम पूरे भारत में शक्ति चाहते हैं। उत्पीड़कों के दिल बदलने से हमारे खिलाफ अत्याचार नहीं रुकेगा। हमें उनके खिलाफ उठना होगा।" यह आंदोलन हिंसक हुआ तो रामदास आठवले समेत कई बड़े चेहरे इससे अलग हो गए।

महाराष्ट्र में दलितों पर हो रहे अत्याचार से हिंसक तरीके से निपटने के लिए दलित पैंथर संगठन बना। कुछ दिन बाद ही इसके संस्थापक सदस्य अलग हो गए।
महाराष्ट्र में दलितों पर हो रहे अत्याचार से हिंसक तरीके से निपटने के लिए दलित पैंथर संगठन बना। कुछ दिन बाद ही इसके संस्थापक सदस्य अलग हो गए।

मायावती हक की बात तो करती थी, लेकिन हिंसा की नहीं
मायावती अपनी आत्मकथा "मेरे संघर्षमय जीवन का सफरनामा" में हिंसा को गलत बताती हैं। वह दलित पैंथर के हिंसक तरीके से सत्ता हासिल करने के प्रयास के खिलाफ तर्क देती रही हैं। वह लिखती हैं, "अपने लोगों की मुक्ति के लिए गोली के प्रयोग के बारे में कोई विचारधारात्मक बाधा नहीं है, लेकिन यह चुनाव गलत होगा।" मायावती के इसी भरोसे के कारण दलित जनता उनसे जुड़ती चली गई। 2007 में पूर्ण बहुमत से हासिल सत्ता इसकी पुष्टि करता है।

फ्रांसीसी विद्वान निकोलस जाओल कहते हैं, मायावती के व्यावहारिक कौशल के साथ ऐसे अम्बेडकरवादी आंदोलन का मेल जो उनकी लोकतांत्रिक और समानतावादी आकांक्षाओं को ज्यादा गहरे और गैर-समझौतावादी ढंग से लेकर चलता है ज्यादा सुरक्षित समझा जाता है। बनिस्बत इसके कि दलित वोटों को बांटकर बसपा के सत्ता में आने की संभावना को नुकसान पहुंचाया जाए।

दलितों के ओर से बोलने को लेकर मायावती पर लगातार सवाल खड़े हुए हैं। यहां दो लोगों की समीक्षा की बात करते हैं।

1: मानव विकास अर्थशास्त्री संतोष मेहरोत्रा ने 2008 में कहा था, "यूपी में बसपा के बढ़े राजनैतिक प्रभुत्व के बावजूद पिछले डेढ़ दशक के दौरान राज्य के उन सबसे गरीब दलित लोगों की सामाजिक-आर्थिक अवस्था में कोई आनुपातिक बढ़त नहीं हुई है।"

2: उग्रवादी दलित बुद्धिजीवी आनंद तेलतुम्बे ने इकॉनामिक एंड पोलिटिकल वीकली में कहा था, "मायावती ने अपनी दमित बिरादरी के लिए जो अल्पकालिक फायदे हासिल किए हैं। उनके बदले वह कहीं अपने फायदे के लिए ऊंची जातियों की व्यवस्था से दीर्घकालीन समझौते न कर लें। अगर चुनाव एक खेल है तो इसमें संदेह नहीं कि इस खेल में मायावती ने सभी मंजे हुए खिलाड़ियों को धूल चटा दी है।"

मायावती का वर्तमान रूप पहले से एकदम अलग
मायावती की सक्रियता में कमी आ गई है। 2022 के चुनाव में उन्होंने पहले चरण की वोटिंग से ठीक 9 दिन पहले प्रचार शुरू किया था। हाथ में धनुष उठाया। दलित-ब्राह्मण गठजोड़ के लिए सभाएं की। राम मंदिर के निर्माण में तेजी लाने का दावा किया। नतीजे आए तो भरोसा करना मुश्किल हो गया। दलित वोटर छिटक कर दूसरे दल में चला गया।

चुनाव से तीन महीने पहले मायावती ने ब्राह्मण-दलित सम्मेलन किया। इस दौरान वह हाथ में त्रिशूल लिए नजर आईं थीं।
चुनाव से तीन महीने पहले मायावती ने ब्राह्मण-दलित सम्मेलन किया। इस दौरान वह हाथ में त्रिशूल लिए नजर आईं थीं।
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