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यूपी की राजनीति:मायावती के पास राजनीतिक ताकत बढ़ाने के लिए सिर्फ भाजपा के साथ जाने का बचा विकल्प? 27 साल में कर चुकी हैं 5 बार गठबंधन

लखनऊ3 महीने पहलेलेखक: रवि श्रीवास्तव
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यह फोटो लोकसभा चुनाव के दौरान मैनपुरी की है। बसपा प्रमुख मायावती, सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव,  पूर्व सीएम मुलायम सिंह एक साथ मंच पर नजर आए थे। चुनाव में सपा, बसपा और रालोद ने गठबंधन किया था। मायावती ने मुलायम सिंह के लिए वोट मांगे थे। - Dainik Bhaskar
यह फोटो लोकसभा चुनाव के दौरान मैनपुरी की है। बसपा प्रमुख मायावती, सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव, पूर्व सीएम मुलायम सिंह एक साथ मंच पर नजर आए थे। चुनाव में सपा, बसपा और रालोद ने गठबंधन किया था। मायावती ने मुलायम सिंह के लिए वोट मांगे थे।
  • 2007 में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने के बाद लगातार लोकप्रियता का गिरता गया ग्राफ
  • 2012 में 80 सीटों पर तो 2017 के विधानसभा चुनावों में 18 सीटों पर सिमट कर रह गई बसपा

साल 2019 में लोकसभा चुनाव से पहले बसपा अध्यक्ष मायावती ने समाजवादी पार्टी के साथ 'गठबंधन धर्म' को निभाते हुए 26 साल पहले 2 जून 1995 को हुए गेस्ट हाउस कांड में केस वापस ले लिया था। वह तारीख 26 फरवरी 2019 थी। सुप्रीम कोर्ट में क्रिमिनल नंबर 126/2009 भी खारिज कर दिया था। लेकिन, यह गठबंधन चुनाव का रिजल्ट आते ही खत्म हो गया। अब 20 महीने बाद मायावती को केस वापस लेने पर पछतावा है। कहती हैं कि केस वापस लेकर उनसे बड़ी गलती हुई है।

अक्सर कांग्रेस पर हमलावर रहने वाली मायावती ने ऐलान कर दिया है कि वे एमएलसी चुनाव में भाजपा का समर्थन करेंगी। यूं तो मायावती यूपी में पिछले 27 सालों में 5 बार गठबंधन कर चुकी हैं। लेकिन, मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में अगर बसपा को देखें तो जानकारों का मानना है कि मायावती को आने वाले समय में अपनी राजनीतिक ताकत को बढ़ाना है तो उनके पास भाजपा के साथ ही जाने का विकल्प बचता है। हालांकि, यह कितना फायदेमंद होगा यह समय बताएगा?

क्यों कमजोर हुई है बसपा?

2007 में सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूला अपनाते हुए दलित और सवर्णों के वोटों से जीतकर सत्ता में पहुंची मायावती जब 2012 विधानसभा चुनाव में उतरीं तो महज 80 सीटों पर सिमट कर रह गयी। इसके बाद 2014 में लोकसभा चुनाव हुए जिसमें बसपा को एक भी सीट नहीं मिली। इसके बाद 2017 में विधानसभा चुनाव हुए तो जो बसपा 2012 में 80 सीटों पर काबिज थी, वह 18 सीट पर आ गयी। बसपा के रसातल में जाने का सिलसिला यहीं नहीं रुका।

लोकसभा चुनाव से पहले 12 जनवरी 2019 को बसपा ने पुराने गिले शिकवे भुलाकर सपा के साथ गठबंधन किया। दोनों पार्टियां गेस्ट हाउस कांड के 26 साल बाद साथ आई थीं। लेकिन, रिजल्ट अच्छे नहीं रहे। गठबंधन की बदौलत मायावती को सिर्फ 10 सीट ही मिल पाई। हालांकि, 2014 में शून्य पर सिमटी बसपा के लिए यह संजीवनी की तरह ही रहा। बहरहाल, इन सबके के बावजूद अभी भी प्रदेश में बसपा की राजनैतिक स्थिति बहुत बेहतर नहीं है। उसी का नतीजा है कि राज्यसभा चुनावों के दौरान उनके 7 विधायक सपा के पाले में चले गए।

भाजपा के साथ जाने का अंतिम विकल्प क्यों?

मायावती का बेस वोट बैंक दलित रहे हैं। इन दलितों के साथ जब जब कोई अन्य वोट बैंक जुड़ा मायावती ने तब तब करिश्मा किया। 2007 का विधानसभा चुनाव इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। 2007 में दलित के साथ सवर्ण आए तो मायावती बहुमत के साथ सत्ता में आई। यही नहीं 1992 में बाबरी विध्वंस के बाद 1993 में जब चुनाव हुए तो बसपा ने सपा से गठबंधन किया था, नतीजा यूपी में गठबंधन की सरकार बनी। हालांकि, यह गठबंधन बहुत दिनों चल नहीं पाया और उसके रिजल्ट में गेस्ट हाउस कांड सामने आया।

मायावती अगर भाजपा से जुड़ती हैं तो उन्हें दलित के साथ भाजपा का कैडर वोट मिलेगा। जिससे वह यूपी में अपनी राजनैतिक हैसियत में इजाफा कर सकती हैं। सीनियर जर्नलिस्ट बृजेश शुक्ला कहते हैं कि अभी गठबंधन बहुत दूर की बात है। फिर भी चाहे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से यह गठबंधन होता है तो बहुत मारक गठबंधन होगा। यह विपक्ष को यूपी से खत्म कर सकता है। उन्होंने बताया कि सपा और बसपा का गठबंधन बेमेल था। उनके कैडर वोट बैंक की आपस मे नहीं बनती है, जबकि भाजपा के साथ बसपा को यह समस्या नहीं उठानी पड़ेगी।

मुस्लिम वोटबैंक भी मायावती से छिटक रहा है?

मायावती के पास शुरू से ही दलित और मुस्लिम वोटबैंक का गठजोड़ रहा है। लेकिन अब मुस्लिम वोट बैंक उनसे छिटक रहा है। इसका उदाहरण कल देखने को मिला जब 7 बागी विधायकों में से 3 मुस्लिम विधायक थे। उनका साफ कहना था कि मायावती भाजपा के सपोर्ट से अपना कैंडिडेट राज्यसभा भेज रही है और हम भाजपा को सपोर्ट नहीं कर सकते। इसलिए बगावत की। बहरहाल, मायावती के पास इसलिए अब नया समीकरण बनाने का ही विकल्प बचता है।

सीनियर जर्नलिस्ट रतनमणि लाल कहते हैं कि मुस्लिम हमेशा से कांग्रेस के साथ ही जाना चाहता है। लेकिन, यूपी में कांग्रेस की स्थिति वैसे भी बुरी है। इसलिए उसे सपा और बसपा का विकल्प चुनना पड़ता है। बसपा के मुकाबले सपा का विकल्प मुस्लिम ज्यादा चुनता है। मायावती भी इस बात को बेहतर समझती है कि दलित और मुस्लिम गठजोड़ के भरोसे वह बहुत आगे नहीं जा सकती है।

भाजपा के साथ गई तो दलितों को कैसे समझाएंगी?

मायावती 2019 लोकसभा चुनावों के बाद से कई मुद्दों पर भाजपा को सपोर्ट किया है। वह जानती हैं कि उनके इस निर्णय के बाद उन पर सवाल खड़े होंगे। लेकिन, मायावती का बेस वोट बैंक जो है, उसे समझाना उनके लिए बहुत कठिन नहीं होगा। सीनियर जर्नलिस्ट रतनमणि लाल कहते हैं कि मायावती को दलित मुद्दों पर मुखर रहना होगा। भाजपा के साथ रहकर भी दलित मुद्दों पर अपना विरोध दर्ज कराना होगा। इससे वह मैसेज दे सकती है कि हम दलितों के फायदे के लिए भाजपा से जुड़े हैं।

भाजपा से नही जुड़ी तो क्या है नुकसान?

यूपी में राज्यसभा की खाली हुई दस सीटों पर भाजपा ने जब सिर्फ अपने 8 कैंडिडेट उतारे और बसपा ने भी अपना कैंडिडेट उतारा तो साफ हो गया कि बसपा भाजपा के समर्थन से अपना कैंडिडेट राज्यसभा में भेजना चाहती है। एक्शन का रिएक्शन हुआ। विरोध में बसपा के 7 विधायक बागी हो गए। साथ ही यह मैसेज भी लोगों के बीच चल गया कि बसपा और भाजपा एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं। अब मायावती ने एमएलसी चुनावों में भी भाजपा को सपोर्ट करने का एलान भी कर दिया है।

सीनियर जर्नलिस्ट बृजेश शुक्ला कहते कि 2022 विधानसभा चुनाव में बसपा अगर अकेले चुनाव लड़ती है तो उसे बहुत नुकसान होगा। मुस्लिम वर्ग का जो थोड़ा बहुत हिस्सा वित्त का मिलता था, वह भी खिसक जाएगा। साथ ही इस दौरान उनका खुद का वोट बैंक का कुछ हिस्सा खिसक सकता है। हालांकि यह बहुत बाद की बात है।

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