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सुल्तानपुर में आए एक प्रवासी बुजुर्ग की कहानी:14 दिन क्वारैंटाइन में रहने के बाद वृद्धाश्रम में भेजा गया; न जुबान समझ आ रही न लिखावट, अब गुमनाम जिंदगी जीने को मजबूर

सुल्तानपुर3 महीने पहले
यह तस्वीर सुल्तानपुर में बने एक वृद्धा आश्रम की है। यहां एक ऐसा शख्स रह रहा है, जिसके बारें में न तो प्रशासन को पता है न ही किसी अन्य को। वृद्धा की भाषा भी किसी को समझ नहीं आ रही है। कुछ समाजसेवियों ने उसके बारें में पता करने का प्रयास शुरू किया है।
  • केएनआईएमटी में बनाए गए क्वारैंटाइन सेंटर में 14 दिन बिताया समय
  • कोरोना जांच की रिपोर्ट निगेटिव, कहां से और कैसे सुल्तानपुर पहुंचा शख्स? किसी को नहीं जानकारी

वैश्विक महामारी कोरोना के खतरे के बीच लॉकडाउन में गैर राज्यों से तमाम लोग यूपी लौटे। कोई हजार किमी पैदल चलकर आया तो कोई रास्ते में जो साधन मिला उस पर सवार होकर जैसे तैसे घर पहुंचा। लेकिन उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले में आया एक शख्स अबूझ कहानी बनकर रह गया है। उसकी न तो जुबान किसी को समझ आ रही है न ही उसकी लिखावट। इशारों में बात करने पर सिर्फ इतना समझ में आता है कि, उसकी एक संतान है। लेकिन वहां कहां का रहने वाला है? यहां कैसे पहुंचा? इसका जवाब नहीं मिल रहा है। 14 दिन क्वारैंटाइन अवधि पूरा करने के बाद प्रशासन ने उसे वृद्धा आश्रम में रखा है। कुछ समाजसेवी उसके खाने पीने का भी इंतजाम कर रहे हैं। 

28 मार्च को बस स्टॉप से मिला था बुजुर्ग

कोरोना के प्रसार को रोकने के लिए देश में 22 मार्च को जनता कर्फ्यू और 25 मार्च से देशव्यापी लॉकडाउन किया गया था। 28 मार्च को जब जनता अपने घरों में कैद थी तो कोतवाली नगर स्थित बस स्टॉप पर एक बुजुर्ग बैठा था। प्रशासनिक अधिकारियों को जब इस बाबत जानकारी हुई तो स्वास्थ्य टीम भेजकर वृद्ध को फरीदीपुर स्थित केएनआईएमटी क्वारैंटाइन सेंटर में शिफ्ट कराया गया था। जहां उसकी सैंपलिंग हुई और जांच रिपोर्ट नार्मल आई। इसके बाद 14 दिन यहां क्वारैंटाइन रहने के बाद वृद्ध को शहर के मंडी मोड़ गोरा बारिक स्थित वृद्धा आश्रम में ले जाकर रखा गया है।

समाजसेवियों ने बुजुर्ग की मदद का बीड़ा उठाया है।
समाजसेवियों ने बुजुर्ग की मदद का बीड़ा उठाया है।

लेकिन बुजुर्ग न तो अपना नाम बता पा रहा है और न ही उसकी भाषा को कोई भी अधिकारी और कर्मचारी समझ पा रहा है। केएनआईएमटी में तैनात असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. रिजवान खान ने बताया कि हम लोगों ने काफी कोशिश की कि इनकी पहचान हो जाए। लेकिन भाषा के चलते पहचान नहीं हो सकी। अंत में मैंने संस्थान के प्रबंधक विनोद सिंह से बुजुर्ग को नौकरी पर रखने के लिए बात की थी। सोचा था कि जब तक पहचान नहीं होती तब तक यहां रहकर काम करेंगे और उनके खाने-पीने और रहने का प्रबंध हो जाएगा। लेकिन लेकिन प्रशासन ने उन्हें वृद्धा आश्रम भेज दिया।

समाजसेवियों ने बुजुर्ग से लिखवाकर उसके बारें में जानने की कोशिश की। लेकिन बुजुर्ग की भाषा कोई समझ नहीं पा रहा है।
समाजसेवियों ने बुजुर्ग से लिखवाकर उसके बारें में जानने की कोशिश की। लेकिन बुजुर्ग की भाषा कोई समझ नहीं पा रहा है।

12 अप्रैल से वृद्धाश्रम में रह रहा 

12 अप्रैल से बुजुर्ग आश्रम में गुमनामी की जिंदगी जी रहा है। यहां बीच-बीच में गनपत सहाय डिग्री कालेज के प्रवक्ता डाॅ. दिनकर प्रताप सिंह अपने साथियों के साथ आकर इनके खाने-पीने का अलग से प्रबंध भी कराते हैं। दिनकर सिंह बताते कि हम लोग इनकी पहचान के लिए निरंतर प्रयासरत हैं। उन्होंने ये भी बताया कि वृद्धा आश्रम में ये एक ऐसे अकेले व्यक्ति हैं जो गुमनामी में हैं और भाषा के चलते अकेलेपन में जी रहे हैं।वृद्धा आश्रम के व्यवस्थापक श्रीप्रकाश शर्मा ने बताया कि आश्रम में आए वृद्ध निगेटिव हैं। जिला प्रशासन भी इनकी भाषा को नहीं समझ पाया है। वो अपना नाम, एड्रेस भी अब तक नहीं बता पाए हैं। हां इशारो में इतना बताया कि एक लड़का है। 

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