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वाराणसी:जीवित्पुत्रिका व्रत के दिन लक्ष्मी कुंड पर पुलिस का पहरा; कोविड-19 के चलते प्रशासन ने लगाई रोक, निराश होकर लौटीं महिलाएं

वाराणसी2 महीने पहले
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वाराणसी में जीवित्पुत्रिका व्रत के दिन दर्शन के लिए मंदिर पहुंची महिलाओं को निराश होकर वापस लौटना पडृा। महामारी को देखते हुए मंदिर बंद कर दिया गया था और वहां पुलिस का पहरा लगा दिया गया है।
  • हर साल हजारों महिलाएं लक्ष्मी कुंड,मंदिर और परिसर में कथा सुनती हैं
  • निर्जला व्रत रखने वाली महिलाएं दर्शन पूजन न कर पाने से निराश होकर लौटीं

संतान के दीर्घायु की कामना के व्रत जीवित्पुत्रिका का कठिन व्रत गुरुवार को मनाया जा रहा है। इस दौरान महिलाएं जीवित्पुत्रिका व्रत निर्जला रहती हैं। शहर के लक्सा में स्थित लक्ष्मी कुंड पर हजारों महिलाएं पूजन के साथ कथा सुनती हैं। लेकिन इस बार कोविड 19 के चलते जिला प्रशासन ने पूर्णतः किसी भी आयोजन पर रोक लगा रखा है। कुंड पर पुलिस का पहरा है। वहीं जैतपुरा थाना अंतर्गत ईश्वरगंगी पोखरा के पास जिऊतिया का पूजा पाठ करने दर्जनों महिलाएं पहुंची। रोक के बावजूद बिना मास्क महिलाएं पूजा पाठ करती दिखीं।

वहीं, पंडित कमलेश चतुर्वेदी ने बताया महिलाएं व्रत रह कर मां लक्ष्मी की आराधना और पूजा करती हैं। इसके पीछे मान्यता है कि इससे सुख समृद्धि और संतान सुख कि प्राप्ति होती है। आज आखरी दिन जीवित्पुत्रिका व्रत से कठिन व्रत का समापन होता है।

पूजन करतीं व्रती महिलाएं।
पूजन करतीं व्रती महिलाएं।

मां लक्ष्मी की पूजा का विशेष स्थान

हिन्दू मान्यता में मां लक्ष्मी को पूजे जाने का विशेष स्थान है। मां लक्ष्मी को धन, सम्पदा, और वैभव की देवी माना जाता है। काशी मे 16 दिनों का एक खास पर्व सोरहिया मेला का होता हैं. मां लक्ष्मी का लगातार 16 दिनों तक पूजन अर्चन चलता है। जिस दौरान हजारों श्रद्धालु लक्सा स्थित प्राचीन लक्ष्मी कुण्ड पर मां कि उपासना करते हैं। मंदिर मे मां के दर्शन करते हैं। इन सोलह दिनों मे महिलाएं व्रत रहकर रोज़ मां लक्ष्मी कि कथा कहानियां सुनती हैं। व्रती महिलाएं पहले ही दिन से मां लक्ष्मी की मूर्ति में धागा लपेट के पुरे सोलह दिन उसकी पूजा अर्चना करती हैं। अंतिम 16वें दिन जीवित्पुत्रिका यानि जिऊतिया पर्व के साथ इस कठिन व्रत तप की समाप्ति करती हैं।

मां लक्ष्मी को 16 प्रकार के फल, फूल और अन्य सामग्री अर्पित करती हैं महिलाएं
तीर्थ पुरोहित मनोज पाण्डेय बताते हैं की महाराजा जिउत की कोई संतान नहीं थी। जिसपर महाराजा ने मां लक्ष्मी का ध्यान किया और उन्होंने सपने में दर्शन देकर सोलह दिनों के इस कठिन व्रत को महाराजा से करने को कहा। जिसके बाद महाराजा को संतान के साथ समृद्धि और एश्वर्य की भी प्राप्ति हुई। तभी से परंपरा चली आ रही है।

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