स्कंदपुराण में कृष्ण ने बताया दीयों को सूर्य का अंश:पितरों की घर-वापसी के लिए 5000 साल पहले जलाया जाता था रॉकेट जैसा उल्काहस्त

3 महीने पहलेलेखक: देवांशु तिवारी

दीपों का त्योहार दिवाली कार्तिक माह में कृष्णपक्ष की त्रयोदशी से लेकर भाई दूज तक मनाया जाता है। लेकिन ये रिवाज नया नहीं है। 5 दिन तक दिवाली मनाने की परंपरा त्रेतायुग के बाद द्वापर युग से चली आ रही है। आइए दीपावली की शुरुआत कब हुई? सबसे पहला रॉकेट कब छोड़ा गया। आइए प्रूफ के साथ आपको समझाते हैं...

  • शुरुआत 5000 साल पहले द्वापर युग से...

भगवान कृष्ण ने बताया मिट्टी के दीयों का महत्व

मद्र राज्य आज के भारत-पाकिस्तान बॉर्डर के दोनों तरफ फैली हुई जगह है। मैप सोर्स- इंडोलॉजी फाउंडेशन।
मद्र राज्य आज के भारत-पाकिस्तान बॉर्डर के दोनों तरफ फैली हुई जगह है। मैप सोर्स- इंडोलॉजी फाउंडेशन।

देश के जाने-माने इतिहासकार ललित मिश्र बताते हैं, "स्कंदपुराण में श्रीकृष्ण ने मिट्टी के दीयों का महत्व बताया है। स्कंद पुराण के कार्तिक महात्म्य में कृष्ण बताते हैं कि अंधकार विनाशक मिट्टी के दीयों में सूर्य का अंश होता है। सबसे पहले मद्र राज्य के निवासियों ने दीपदान का उत्सव मनाना शुरू किया था, जिसकी जानकारी किसी तरह दैत्यराज बलि तक पहुंची तो वो हैरान रह गए, क्योंकि उस समय रात में प्रकाश किया जाना बिल्कुल नई घटना थी। बलि ने इस घटना के बाद से ही अपने राज्य में धूमधाम से दीपक जालाने का पर्व शुरू कर दिया।" वामन अवतार त्रेतायुग के प्रारंभ में हुआ था, तब से अब तक दीपावली लगातार चलती आ रही है ।

लगभग 6000 साल पहले बलूचिस्तान में पहला दिया मिलने का प्रमाण
मद्र राज्य आज के उत्तर पंजाब और जम्मू को मिलाकर बनता था। आर्कियोलॉजिकली यह क्षेत्र इंडस वैली कल्चर का सीमावर्ती क्षेत्र रहा है। सिंधु घाटी सभ्यता से लगभग चौथी सहस्राब्दी ईसा पूर्व यानी 5000 से 6000 साल पहले से मिट्टी के दीये मिलने के प्रमाण हैं। यही वो समय था जब लोगों ने गो-पालन और कपास की खेती शुरू की थी। इसी प्रकार दीप जलाने से जुड़ी सभी जरूरी चीजें इस दौर में मौजूद थी। यानी कि भारत में चौथी सहस्राब्दी ईसा पूर्व से दीये जलाए जाने लगे थे।

स्कंदपुराण और अग्निपुराण में प्रचीन रॉकेट का जिक्र
इंडोलॉजी फाउंडेशन संस्था भारतीय पुरातत्व से जुड़ी ऐतिहासिक इमारतों पर काम कर रही है। संस्था के एक अध्ययन के मुताबिक, स्कंदपुराण और अग्निपुराण के श्लोकों से हमें पता चलता है कि करीब 5000 साल पहले दिवाली की रात में हाथों में मशाल या फिर दूसरे पात्र जिससे चिंगारियां छोड़ते हुए ऊपर उठती थी, उनका प्रयोग दीपोत्सव के दौरान किया जाता था, जिसे ‘उल्काहस्त’ कहते थे।

दीपावली आयोजन का एक पक्ष पितरों की प्रसन्नता से भी जुडा हुआ है। संकद पुराण के कार्तिकमास महात्म्य में श्लोक संख्या 09.65 के मुताबिक, अश्विन माह में पितृ लोक से आए हुये पितृ दीपावली में वापस जाते हैं, जिनकी वापसी पर ‘उल्काहस्तम’ नामक क्रिया होती थी।

अलेक्सजेंडर की सेना से बचने के लिए भारतीयों ने छोड़े थे रॉकेट
इतिहासकार ललित कहते हैं कि भारत के कुछ हिस्सों की मिट्टी में पोटैशियम नाइट्रेट पाया जाता है। इससे बारूद विस्फोटक सामग्री बनाई जा सकती है। अलेक्सजेंडर के आक्रमण के बाद भारत आए ग्रीक यात्री अपोलोनियस ने 2000 पहले लिख गए यात्रा वृतांत में अंग्रेजी में लिखा- "as soon as the latter (Greeks) approached they were driven off by rockets of fire and thunderbolts. which were hurled obliquely from above and fell upon their armour."

कौटिल्य ने 2,396 साल पहले बारूद के बारे में लिखा
375 BC यानी करीब 2,396 साल पहले कौटिल्य ने अर्थशास्त्र के चौदहवें अध्याय में तेजनचूर्ण बनाने की विधि दी है। इसके बारे में शमशास्त्री संस्करण के पेज नंबर 592 में भी लिखा गया है। तेजनचूर्ण एक तरह का Ignition powder यानी कि बारूद था ।