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राजनीति के किरदार और किस्से-31:संजय गांधी का शौक बना था उनकी मौत का कारण, एक दिन पहले उसी विमान पर मेनका संग भरी थी उड़ान

11 दिन पहलेलेखक: राजेश साहू

23 जून 1980 यानी आज से ठीक 42 साल पहले दिल्ली के आसमान में एक विमान गुलाटियां खाते नजर आया। जब तक लोग समझ पाते, तब तक वह अशोका होटल के पीछे जाकर जमीन पर गिर गया। उसमें सवार दोनों लोगों की मौत हो गई। लोग नजदीक पहुंचे तो देखा उस वक्त की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी मृत पड़े हैं।

राजनीति के किरदार और किस्से सीरीज में संजय से जुड़ी तीसरी कहानी हम उनकी मौत की बताएंगे। पहले की दो कहानियां आप यहां पढ़ सकते हैं।

1: इमरजेंसी के वक्त संजय गांधी ने मीडिया संस्थानों की बिजली कटवा दी, लोगों को घेरकर नसबंदी करवाई गई
2: संजय गांधी और मेनका की लव स्टोरी, इंदिरा भी नहीं चाहती थीं कि दूसरा बेटा भी विदेशी बहू लाए

विपक्ष ने संजय का लाइसेंस रद्द कर दिया था
संजय गांधी जब इंग्लैंड में पढ़ाई कर रहे थे, तब उन्होंने विमान उड़ाने की ट्रेनिंग ली थी। भारत आए तो उनकी मां इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं। संजय को हल्का विमान उड़ाने का लाइसेंस मिल गया। संजय को जब भी वक्त मिलता, वह दिल्ली फ्लाइंग क्लब जाकर हल्के विमान उड़ाते थे। 1977 में जब इमरजेंसी खत्म हुई और जनता दल की सरकार बनी तो संजय गांधी के लाइसेंस को छीन लिया गया।

यह फोटो उस वक्त की है जब संजय और राजीव गांधी विदेश विमान उड़ाने की ट्रेनिंग लेकर लौटे थे।
यह फोटो उस वक्त की है जब संजय और राजीव गांधी विदेश विमान उड़ाने की ट्रेनिंग लेकर लौटे थे।

1980 में दोबारा इंदिरा गांधी की दोबारा सरकार बनी तो संजय गांधी के लाइसेंस को वापस कर दिया गया। उन्हें पिट्स-एस 2 ए विमान पहले से ही पसंद था। सरकार बनी तो उसे विदेश से मंगाने के बारे में बात शुरू हो गई। मई 1980 में कस्टम विभाग ने पिट्स को भारत लाने की मंजूरी दे दी।

दुर्घटना के एक दिन पहले मेनका के साथ भरी थी उड़ान
संजय गांधी उस विमान को लेकर इतने ज्यादा उत्सुक थे कि आनन-फानन में उसे असेंबल करके सफदरगंज के दिल्ली फ्लाइंग क्लब में पहुंचा दिया गया। 21 जून को वह पहली बार पिट्स पर सवार हुए और उसे उड़ाया। उस वक्त उनके साथ फ्लाइंग क्लब के ही सदस्य थे। 22 जून को वह अपनी पत्नी मेनका, इंदिरा गांधी के विशेष सचिव आरके धवन और धीरेंद्र ब्रह्मचारी को लेकर करीब 40 मिनट तक उड़ान भरी।

दुर्घटना के ठीक एक दिन पहले उन्होंने उसी विमान में मेनका गांधी को बैठाकर उड़ान भरी थी।
दुर्घटना के ठीक एक दिन पहले उन्होंने उसी विमान में मेनका गांधी को बैठाकर उड़ान भरी थी।

23 जून को माधवराव के साथ उड़ान भरने की तैयारी थी
23 जून यानी दुर्घटना वाला दिन। संजय सुबह 7 बजे उठे और कार लेकर दिल्ली फ्लाइंग क्लब के लिए निकल लिए। एक दिन पहले तय हुआ था कि माधवराव सिंधिया के साथ उड़ान भरेंगे, लेकिन आधे रास्ते जाने पर संजय गांधी का मूड बदल गया और वह सिंधिया के घर न जाकर दिल्ली फ्लाइंग क्लब के पूर्व इंस्ट्रक्टर सुभाष सक्सेना के घर पहुंच गए।

द रेड साड़ी किताब में स्पेनिश लेखर जेवियर मोरो लिखते हैं, "सुभाष सक्सेना जानते थे कि संजय को अनुभव नहीं है। इसलिए वह उड़ान में साथ जाने से बचना चाहते थे। संजय ने जिद की तो वह मान गए।" 7 बजकर 58 मिनट पर पिट्स ने टेकऑफ किया। संजय लूप बनाकर नई दिल्ली के आकाश में 12 मिनट तक उड़ते रहे। फिर वह सफदरगंज रोड के उस मकान पर उड़े, जहां एक घंटा पहले इंदिरा गांधी ने उनसे कहा था, "सावधान रहना, सब कहते हैं कि तुम हड़बड़ी में काम करते हो।"

पिछले इंजन ने काम करना बंद कर दिया
विमान हवा में कलाबाजियां दिखा ही रहा था कि तभी पिछला इंजन बंद हो गया। घटना के वक्त वहां मौजूद एक व्यक्ति ने बताया, जहाज पहले तो एक तीर की तरह सीधा ऊपर गया और ड्राइव मारने की तैयारी में एक लूप सा लेने लगा, लेकिन फिर वह उठ नहीं पाया। अशोका होटल के पीछे की खाली जमीन पर जाकर गिरा। संजय गांधी और कैप्टन सक्सेना मारे गए।

विमान इतना बुरी तरह से छतिग्रस्त हुआ था कि लाश पहचानना मुश्किल हो गया था।
विमान इतना बुरी तरह से छतिग्रस्त हुआ था कि लाश पहचानना मुश्किल हो गया था।

प्रधानमंत्री इंदिरा एंबुलेंस पर बैठकर अस्पताल गईं
विमान हादसे की जानकारी इंदिरा गांधी को दी गई। बेटे की मौत की खबर सुनकर इंदिरा एंबेसडर कार पर सवार हुईं और तुरंत घटना स्थल पर पहुंचीं। उस वक्त यूपी के सीएम वीपी सिंह उनसे मिलने के बैठे थे। इंदिरा को परेशान देखा तो पीछे-पीछे वह भी चल दिए। घटना स्थल पर लाश को एंबुलेंस में रखा जा रहा था। इंदिरा एंबेसडर के बजाय उस उस एंबुलेंस में सवार हो गईं। शायद उन्हें उम्मीद थी कि संजय की सांसे चल रही हैं।

सोनिया उस वक्त इटली में थीं। उन्हें इंदिरा की सचिव ऊषा ने घबराई आवाज में फोन करके कहा, मैडम, संजय के साथ हादसा हो गया। सोनिया चौक गईं। उन्हें कुछ समझ नहीं आया। ऊषा ने विमान हादसे की पूरी बात बताई। वह भारत लौटने के लिए तुरंत तैयार हुईं, उसी दिन शाम को भारत आ गईं।

संजय के डर से इंदिरा से शिकायत नहीं कर पाए थे अधिकारी
मई में पूर्व नागरिक विमानन के डायरेक्टर जनरल एयर मार्शल जे जहीर ने अपने अधिकारियों से कहा था, ''संजय अक्सर सुरक्षा प्रोटोकाल का उल्लंघन करते हैं। उन्होंने अधिकारियों से इस बारे में इंदिरा गांधी से बात करने को कहा था। सभी बात करने को तैयार भी हो गए थे, लेकिन संजय के डर के चलते कोई भी इंदिरा से बात नहीं कर सका था।''

  • हम फिर से संजय की मौत पर आते हैं

अटल बिहारी वाजपेयी और चंद्रशेखर अस्पताल पहुंचे
संजय की लाश अस्पताल लाई गई तो अटल बिहारी वाजपेयी और चंद्रशेखर भी पहुंच गए। इंदिरा बेटे की मौत का दुख छिपाने के लिए काला चश्मा पहने हुई थीं। चंद्रशेखर सांत्वना देने के लिए आगे बढ़े तो इंदिरा गांधी ने उनसे असम में जारी उथल-पुथल की बात करते हुए कहा, ''हम इस मामले में मीटिंग करते हैं।''

चंद्रशेखर ने कहा, ''मैडम आप अभी इन सब बातों पर ध्यान नहीं दीजिए।'' तभी इंदिरा की नजर वीपी सिंह पर पड़ी। उन्होंने उन्हें तुरंत लखनऊ जाकर जरूरी कामों पर ध्यान देने को कहा। 24 जून को यमुना के किनारे अंतिम संस्कार हुआ। पूरे समय इंदिरा गांधी संजय की पत्नी मेनका का हाथ पकड़े रहीa।

सबकुछ समान्य दिखाने के लिए इंदिरा गांधी ने आंखो पर चश्मा लगा रखा था।
सबकुछ समान्य दिखाने के लिए इंदिरा गांधी ने आंखो पर चश्मा लगा रखा था।

72 घंटे बाद रोई थीं इंदिरा
बेटे की मौत के 72 घंटे बाद वह पार्टी के नेताओं के साथ कार्यालय में बैठी थीं। संजय का नाम आया तो रो पड़ीं। यह पहली बार था जब इंदिरा का आंसू लोगों के सामने नजर आया। किसी तरह खुद को संभाला। 27 जून को पहली बार अपने दफ्तर पहुंचीं। तब उन्होंने कहा था, "लोग तो आते जाते हैं, पर राष्ट्र सदैव जीवंत रहता है।"

संजय की मौत के बाद
संजय की मौत के बाद उनके समर्थकों ने उनकी मूर्तियां बनाई। सड़क और चौराहों के नाम रखे। नए खुले कॉलेज और अस्पताल के नाम संजय के नाम से रखा गया। लेकिन इन सबके बीच एक वर्ग ऐसा भी था जो खुश था। खुश होने वाला वही वर्ग था, जिसकी तीन साल पहले जबरन नसबंदी कर दी गई थी।

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