9 साल की नौकरी में मात्र 530 रुपए का इंक्रीमेंट:अनुदेशकों की सैलरी 9 हजार हुई, शिक्षक बोले- इस सैलरी से भरपेट खाना भी संभव नहीं

लखनऊ4 महीने पहलेलेखक: राजेश साहू

यूपी सरकार ने 27 हजार 555 अंशकालिक अनुदेशकों की सैलरी 7 से बढ़ाकर 9 हजार कर दी है। 26 अप्रैल को लखनऊ के एनेक्सी भवन में शिक्षा मंत्री संदीप सिंह मीडिया के सामने आए। बताया कि बेसिक शिक्षा विभाग ने अंशकालिक अनुदेशकों की सैलरी बढ़ाने का जो प्रस्ताव रखा था, उसे पारित कर दिया गया है। सरकार के इस फैसले के बाद अनुदेशकों ने संदीप सिंह और सीएम योगी आदित्यनाथ के ट्वीट पर अपनी प्रतिक्रिया दी।

संदीप सिंह ने मीडिया के सामने जो घोषणाएं कीं, उसका वीडियो उन्होंने 1.30 बजे ट्वीट कर दिया। 77 सेकेंड के वीडियो में 420 कमेंट आए। इसमें 250 कमेंट अनुदेशक शिक्षकों के थे, जो फैसले से नाराज नजर आ रहे थे। ये ट्वीट और उस पर आए पांच कमेंट पढ़िए।

शिक्षा मंत्री संदीप सिंह ने जैसे ही ट्वीट किया, अनुदेशक शिक्षक अपनी राय कमेंट करने लगे।
शिक्षा मंत्री संदीप सिंह ने जैसे ही ट्वीट किया, अनुदेशक शिक्षक अपनी राय कमेंट करने लगे।

कामिल अख्तर ने लिखा; "एक अहसान हम अनुदेशकों पर और करें। हमको बाहर निकाल दें। अपने मन से नौकरी छोड़ी नहीं जाती, क्योंकि जिंदगी के 10 साल बर्बाद किए हैं।"

सुदर्शन त्रिपाठी ने लिखा; "अब आपसे उम्मीद टूट गई। हम अनुदेशक शिक्षकों का 1470 रुपए काटकर 2000 रुपए बढ़ाकर बहुत सम्मान दे दिया। हम लोगों ने सिर्फ आपसे सम्मानजनक जीवन जीने के लिए मेहनताना मांगा था।"

कन्हैया लाल चौहान ने लिखा; "शिक्षा मंत्री जी, जो अनुदेशक दिख रहे हैं वह बीपीएड अनुदेशक हैं। प्रदेश में 46 हजार जूनियर हाईस्कूल हैं। अनुदेशकों का पद सृजित हैं, जिसमें 32 हजार खाली हैं। नियुक्ति देने का कष्ट करें।"

लव कुमार सिंह ने लिखा; मंत्री जी, "अनुदेशक का मानदेय कोर्ट और सरकार ने 2017 से 17 हजार का आदेश दिया। आज की महंगाई में हमारा मानदेय 8470 से घटाकर 7000 किया गया और अब 2000 बढ़ाए गए। ये कहां का न्याय है?"

जीतेंद्र पांडे ने लिखा; "कम से कम पुराना वादा निभा कर नई सरकार में दे देते, तब भी आपका अहसान होता। महाराज जी ने अनुदेशकों की जिंदगी बरबाद करने की ठान ली है।"

शिक्षा मंत्री के ही ट्वीट पर कई और कमेंट नजर आए।
शिक्षा मंत्री के ही ट्वीट पर कई और कमेंट नजर आए।

इन सभी कमेंट्स के रिप्लाई में भी "सही बात, सही कहा, हक नहीं मिला" जैसी बातें लिखी थी। कुछ अनुदेशक सीएम योगी आदित्यनाथ और डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक के ट्वीट के कमेंट बॉक्स में हक देने की मांग कर रहे हैं। आखिर उनका हक क्या है? उनकी मांग क्या है? क्या वह मांग पूरी हो सकती है इसे लेकर पहले उनके मुद्दे को समझिए।

अपर प्राइमरी स्कूलों में 7 हजार की सैलरी पर भर्ती किए गए अनुदेशक
2013 में अपर प्राइमरी स्कूलों में 6वीं क्लास से 8वीं क्लास तक के लिए 41,307 अनुदेशकों की भर्ती हुई। अनुदेशक शिक्षक शारीरिक शिक्षा, कला, कम्प्यूटर और कृषि विज्ञान पढ़ाने के लिए रखे गए। शुरूआती सैलरी 7000 रुपए तय की गई थी। इसमें 60% पैसा केंद्र सरकार देती थी और 40% पैसा राज्य सरकार देती थी।

सपा सरकार ने बढ़ाया, लेकिन बीजेपी सरकार ने उसे वापस ले लिया
2016 में उस वक्त की अखिलेश सरकार ने अनुदेशक अध्यापकों की सैलरी में 1470 रुपए बढ़ा दिए। अब उन्हें 8470 रुपए मिलने लगे थे। मगर, 2017 में बीजेपी सरकार बनने के बाद सपा सरकार में बढ़े 1470 रुपए को गलत बताते हुए शिक्षकों से इसकी रिकवरी कर ली गई।

2017 में यूपी सरकार ने अनुदेशक शिक्षकों की सैलरी 17 हजार किए जाने को लेकर केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय को प्रस्ताव भेजा। प्रोजेक्ट अप्रूवल बोर्ड ने सब कुछ देखा और 17 हजार को मंजूर कर लिया। वह अपने हिस्से का 10 हजार 200 देने को तैयार हो गए। मगर राज्य सरकार अपने हिस्से का 6 हजार 800 देने को तैयार नहीं हुई।

बीजेपी के ऑफिसियल हैंडल पर अनुदेशकों की सैलरी बढ़ाने को लेकर पोस्ट किया गया।
बीजेपी के ऑफिसियल हैंडल पर अनुदेशकों की सैलरी बढ़ाने को लेकर पोस्ट किया गया।

केंद्र सरकार की मंजूरी मिलने के बाद राज्य कार्यकारी समिति की बैठक हुई। उस वक्त की शिक्षा मंत्री अनुपमा जायसवाल ने 17 हजार में बदलाव करते हुए 9 हजार 800 रुपए मंजूर किया। हालांकि यह सैलरी शिक्षकों को कभी मिली नहीं।

कोर्ट ने 7 हजार को गलत बताते हुए 17 हजार देने को कहा
अनुदेशक शिक्षक अपनी मांगों को लेकर कोर्ट चले गए। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने राज्य सरकार के फैसले को गलत बताया। जज राजेश सिंह चौहान ने कहा, राज्य की कार्यकारी समिति को सैलरी घटाने का कोई अधिकार नहीं है। उनका यह फैसला गैरकानूनी है। वह बकाया राशि को नौ प्रतिशत ब्याज के साथ शिक्षकों को दें।

लखनऊ खंडपीठ के फैसले के बाद भी अनुदेशक शिक्षकों को सैलरी नहीं मिली। अनुदेशक शिक्षकों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दी। 11 सितंबर, 2020 को कोर्ट ने 7 हजार की सैलरी को शोषण माना। राज्य सरकार से कोर्ट ने जवाब मांग लिया। सरकार ने कोई जवाब नहीं दिया और सुप्रीम कोर्ट में पहुंचकर इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर स्टे ले लिया। 12 मई, 2022 को सुप्रीम कोर्ट इस पर फैसला सुनाएगा।

ये तो रहा अब तक का हाल। लेकिन इन सबके बीच भी बहुत सारी बातें ऐसी हैं जिससे अनुदेशक शिक्षक नाराज हैं। उन्होंने 6 प्वाइंट में अपनी बात बताई है।

  • अनुदेशकों को साल में 12 महीने की नहीं, बल्कि 11 महीने की सैलरी मिलती है। अनुदेशक शिक्षकों का कहना है कि सरकार कई विभाग के कर्मचारियों को 1 साल में 13 महीने की सैलरी दे सकती है, तो क्या हमें पूरे 12 महीने की नहीं दे सकती।
  • सुदर्शन त्रिपाठी कहते हैं कि 9 साल में हमारी सैलरी में 530 रुपए बढ़े हैं। देश में क्या कोई और भी ऐसा कर्मचारी है जो एक ही सैलरी पर 9 साल से काम कर रहा है?
  • कामिल अख्तर पूछते हैं कि 2017 में योगी सरकार ने अनुदेशकों के लिए 17 हजार सैलरी के प्रस्ताव को पास कर दिया था। अब वह 2 हजार बढ़ाकर इसे उपलब्धि बता रहे हैं। जबकि यह तो कुछ भी नहीं है।
  • कन्हैया लाल कहते हैं कि जिस भी स्कूल में 100 से कम बच्चे हुए वहां अनुदेशकों को नौकरी से मुक्त कर दिया गया। अब जो इतने साल से काम कर रहा है अब वह कहां जाए?
  • प्रियंका यादव कहती हैं कि महिला अनुदेशकों के लिए मातृत्व अवकाश जैसी कोई बात नहीं है। अब तो देश की बड़ी सरकारी कंपनियां भी छुट्टी देती हैं।
  • अशोक कुमार कहते हैं कि सुरक्षित नौकरी सबसे जरूरी है, अनुदेशक शिक्षकों को उनके पद पर रेगुलर किया जाए। वह तो यह भी कहते हैं कि चाहे सैलरी 17 हजार ही रहे।

सरकार अगर 17 हजार सैलरी देती है, तो उसका खर्च कितना बढ़ेगा इसे इस चार्ट में समझिए

यूपी सरकार पर 8.81 करोड़ महीने का अतिरिक्त खर्च आएगा।
यूपी सरकार पर 8.81 करोड़ महीने का अतिरिक्त खर्च आएगा।

क्या उनकी सैलरी 17 हजार हो सकती है
अनुदेशक शिक्षक संघ के प्रमुख विक्रम सिंह कहते हैं कि अनुदेशकों को कम सैलरी देने के मामले में राज्य सरकार ही जिम्मेदार है। उम्मीद है कि 12 मई को इलाहाबाद हाईकोर्ट की तरह सुप्रीम कोर्ट भी अनुदेशकों के हित में अपना फैसला सुनाएगा और सैलरी को 17 हजार करेगा।

अंत में यूपी अनुदेशक योगी जी से मांगे न्याय नाम के ट्विटर हैंडल पर की गई यह पोस्ट देख लीजिए।

बेटे के इलाज के लिए एक अनुदेशक को कर्ज लेना पड़ गया, क्योंकि सैलरी इतनी कम है कि पूरा नहीं पड़ता।
बेटे के इलाज के लिए एक अनुदेशक को कर्ज लेना पड़ गया, क्योंकि सैलरी इतनी कम है कि पूरा नहीं पड़ता।