टोक्यो से हॉकी टीम के कोच पीयूष दुबे से बातचीत:बोले- सेमी फाइनल में हम इतना कांफिडेंट हो गए थे कि जीत का जश्न मनाने की तैयारी कर रहे थे, पेनाल्टी कार्नर ने गेम पलट दिया

लखनऊ2 महीने पहलेलेखक: रवि श्रीवास्तव
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41 साल बाद ओलिंपिक में ब्रॉन्ज जीतने वाले हॉकी के हीरोज को देशभर से बधाई मिल रही है। हालांकि, इन प्लेयर्स को हीरो बनाने में इंडियन हॉकी टीम के सहायक कोच पीयूष दुबे का भी बड़ा योगदान है। पीयूष दुबे हाथरस के सादाबाद के रसमई गांव के रहने वाले हैं, जबकि उनकी पढ़ाई लिखाई प्रयागराज में हुई है।

टोक्यो से पीयूष दुबे ने दैनिक भास्कर से विशेष बातचीत की...

सवाल: सेमीफाइनल में जब आप पहुंचे तो टीम की क्या स्ट्रेटजी थी?

सेमीफाइनल में हम जीत के लिए मैदान में उतरे थे। खिलाड़ियों को बोला गया था कि उन्हें 90 मिनट के गेम में रिलैक्स नहीं करना है। बॉल की हर मूवमेंट पर नजर रखनी है। आखिरी सीटी तक अपना बेहतर प्रदर्शन ही दिखाना था। हालांकि, हम यह कर भी रहे थे लेकिन लास्ट टाइम में बेल्जियम को मिले पेनाल्टी कार्नर से पूरा गेम बिगड़ गया।

सवाल: टीम पर मेडल जीतने का प्रेशर था, क्योंकि सालों बाद ऐसा मौका आया था?

यह स्वाभाविक है कि जब आप सेमीफाइनल में पहुंचते हैं तो अपने आप एक प्रेशर दिमाग पर बनने लगता है। हमारी टीम के साथ भी ऐसा ही हुआ। स्पोर्ट्स में बैलेंस प्रेशर होना अच्छा होता है। चूंकि हमारी टीम में युवाओं के साथ-साथ अनुभवी खिलाड़ियों का मिश्रण है तो जो खिलाड़ी अनुभवी थे, उन्होंने जूनियर खिलाड़ियों को प्रेशर से निकालने में मदद की। मनप्रीत और श्रीजेश तीसरी बार ओलिंपिक खेल रहे थे तो उनके अनुभव का भी फायदा मिला।

सवाल: ओलिंपिक के दौरान कोई ऐसा पल जो जिंदगी भर याद रहेगा?

बिल्कुल। यह ओलिंपिक तमाम यादें दे गया है। पहला...जब हम सेमीफाइनल में पहुंचे तो सभी की आंखें नम हो गई थीं। कई खिलाड़ी भावुक हो गए थे। तब हमारे हेड कोच ने कहा, इमोशन अच्छी बात है, लेकिन यह इमोशन आगे के लिए बचाकर रखो। जब मेडल आएगा तब यह इमोशन दिखाना।

दूसरा...सेमीफाइनल मैच में हम आगे चल रहे थे। हमारे खिलाड़ी बेहतर खेल रहे थे। हम इतना आत्मविश्वास में आ गए कि सभी ने जीत का जश्न मनाने की तैयारी कर ली थी। अंतिम समय में गेम पलट गया। तीसरा...जब हम सभी निराश थे, तब देशवासी और प्रधानमंत्री ने फोन पर हमसे बातचीत की। उनकी बातचीत से टीम जल्द ही निराशा से बाहर निकल आई।

हॉकी टीम के साथ कोच पीयूष दुबे। (बाएं से चौथे)
हॉकी टीम के साथ कोच पीयूष दुबे। (बाएं से चौथे)

सवाल: हॉकी में मेडल का 41 साल का सूखा हुआ, यह कैसे संभव हो पाया?

इस बात का जवाब सिर्फ एक है, वह है टीम वर्क। हालांकि, विश्लेषण किया जाए तो हम इस समय वर्ल्ड रैंकिंग में नंबर तीन पर हैं। हम ओलिंपिक से पहले जर्मनी, बेल्जियम, ऑस्ट्रेलिया और नीदरलैंड को हरा चुके हैं। ऐसे में हमारे अंदर कॉफिडेंस था। इस बार जब हम विपक्षी टीम के सामने होते थे तो वह हमें कमजोर विपक्ष नहीं समझते थे। उसके बाद मैदान पर हमारा गेम भी उन पर प्रभाव डालता था। यह बात विपक्षी टीम भी मानती है।

सवाल: कोविड के कारण ओलिंपिक एक साल आगे बढ़ गया था। ऐसे में कैसे तैयारियां हुई?

बिल्कुल, कोविड ने काफी नुकसान किया। 33 मेंबर्स की कोर टीम 15 महीने तक बेंगलुरु के साई सेंटर (भारतीय खेल प्राधिकरण) में रहकर ओलिंपिक की तैयारियों में जुटी हुई थी। हमारे लिए सारी सुविधा थी। कुछ नहीं था तो प्रैक्टिस के लिए कंपटीशन नहीं था। हमें ओलिंपिक की बेहतर तैयारी के लिए इंटरनेशनल मैच खेलने थे, लेकिन कोविड के कारण यह संभव नहीं था। फिर हमने 33 लोगों की दो टीम बनाई और आपस में मैच खेलने शुरू कर दिए।

एक समय ऐसा आया कि टीम बराबरी पर रहने लगी, तब हम लोगों की चिंता बढ़ी। इधर, फरवरी 2021 में थोड़ी छूट मिली तो हम लीग खेलने जर्मनी गए। इसी जर्मनी को हमने वहां हराया। फिर हम वहां से बेल्जियम और इंग्लैंड भी गए। वहां से जीतकर लौटे। जब हम ओलिंपिक में पहुंचे तो आत्मविश्वास से भरे हुए थे। हमें उम्मीद थी कि हम फाइनल तक पहुंचेंगे।

सवाल: किस स्ट्रेटजी के साथ इंडियन हॉकी टीम ओलिंपिक में गयी थी?

इस बार हम जीत का माइंडसेट लेकर ही ओलिंपिक में पहुंचे थे। यह पूरी टीम को क्लियर था कि हम सिर्फ पार्टिसिपेट करने या ओलिंपियन बनने नहीं जा रहे हैं। हम फाइनल में खेलने के लिए जा रहे हैं। हमें कुछ करके ही लौटना है। इसी माइंडसेट से ही खिलाड़ियों को तैयार भी किया गया था।

भारतीय तिरंगे के साथ कोच पीयूष दुबे।
भारतीय तिरंगे के साथ कोच पीयूष दुबे।

सवाल: इस मुकाम तक बतौर कोच आपको कितनी मेहनत करनी पड़ी?

कोई भी मैच किसी एक व्यक्ति की मेहनत से नहीं जीते जाते हैं। यह टीम वर्क होता है। इस मुकाम तक पहुंचने के लिए सभी टीम मेंबर्स ने कड़ी मेहनत की है। हम लोगों ने 15 से 16 घंटे तक काम किया। ओलिंपिक में हम दो सेशन में मीटिंग और बाकी वक्त फील्ड पर गुजारते थे। सबसे ज्यादा उस समय दिक्कत हुई जब कोविड के कारण ओलिंपिक का समय एक साल तक बढ़ गया। यह एक मानसिक प्रेशर की ही तरह था, क्योंकि खिलाड़ियों का मानसिक प्रेशर एक बार पीक पर आता है। स्पोर्ट्स में सभी चाहते हैं कि यह मानसिक प्रेशर हो, लेकिन संतुलित हो। हमें इस बात का ध्यान रखना था कि खिलाड़ियों का जो टेंपरामेंट है, वह ओलिंपिक तक बरकरार रहे। हालांकि, हम इसमें कामयाब भी रहे।

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