UP की आखिरी यानी 403वीं विधानसभा दुद्धी की कहानी:इस बार के बाद फिर कभी नहीं होंगे सूबे के इन 11 गांवों में चुनाव

लखनऊ4 महीने पहले

उत्तर प्रदेश में चुनावी शोरगुल के बीच सोनभद्र के 11 गांव शांत हैं। यहां न कोई नेता वोट मांगने आता है और न ही इन गांवों के लोगों की वोट डालने में कोई दिलचस्पी है। असल में इन गांवों में 7 मार्च 2022 को आखिरी बार विधानसभा चुनाव के लिए वोटिंग होगी। इसके बाद यहां कोई चुनाव नहीं होगा। ये गांव सिर्फ यूपी ही नहीं बल्कि पूरे देश के नक्शे से गायब हो जाएंगे। ये गांव यूपी की आखिरी विधानसभा यानी 403वीं विधानसभा दुद्धी में आते हैं।

दरअसल, यूपी, छत्तीसगढ़ और झारखंड से जुड़ी कनहर सिंचाई परियोजना दिसंबर 2022 में पूरी हो जाएगी। इसके बाद कनहर बांध से पानी छोड़ा जाएगा, जिससे तीनों राज्यों के कुल 21 गांवों का वजूद हमेशा-हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा। इनमें से 11 गांव यूपी के दुद्ध‌ी विधानसभा के हैं। इनके नाम हैं- लाम्बी, रनदहटोला, सुगवामान, कुदरी, कोरची, सुंदरी, भीसुर, अमवार, गोहडा, बरखोहरा और बघाडू। इन गांवों की आखिरी कहानी…

डूब क्षेत्र जैसा कभी कुछ सुना है। इसका मतलब होता है कि वो इलाका जो डूब जाएगा। जब सिंचाई परियोजना बनी तो इन गांवों को डूब क्षेत्र कहा गया। कहने का मतलब है कि इस दिसंबर में जब नहर में पानी छोड़ा जाएगा तब ये गांव डूबते जाएंगे। यूपी के 11 गांवों के साथ छत्तीसगढ़ के 6 और झारखंड के 4 गांव भी अथाह पानी में समा जाएंगे।

लोगों ने‌ विरोध किया तब मुआवजा मिला, लेकिन अब भी सिर्फ 50% को
यूपी के सोनभद्र के इन इलाकों में अधिकतर आदिवासी रहते हैं। बभनी विकासखंड के लांबी गांव के आलम कहते हैं, ‘जब गांव ही नहीं बचेगा, तो वोट किसको देंगे। गांव में 90 परिवार हैं और सबको पता है हमारा गांव खत्म होने वाला है। गांव वालों ने कनहर परियोजना के विरोध में कई बार आवाज उठाईं, लेकिन सरकार मुआवजा देकर हमें चुप करा रही है। हमें तो मुआवजा मिला है, लेकिन गांव के 50% लोगों का पैसा अभी तक नहीं आया।’

दिसंबर 2014। उन्हीं 11 गांव के 1000 से ज्यादा लोग चलकर 200 किलोमीटर दूर सोनभद्र के जिला मुख्यालय रॉबर्ट्सगंज पहुंचे। वे चाहते थे कि उनके गांव बचे रहें।
दिसंबर 2014। उन्हीं 11 गांव के 1000 से ज्यादा लोग चलकर 200 किलोमीटर दूर सोनभद्र के जिला मुख्यालय रॉबर्ट्सगंज पहुंचे। वे चाहते थे कि उनके गांव बचे रहें।

गांव खत्म होने की बात सुनी, तबसे 20 साल हो गए, ठीक से सो नहीं पाए
रन्दह टोला गांव के लोगों को 2001 में साफ-साफ पता चल गया कि उनका गांव सिंचाई परियोजना में चला जाएगा। तब से 20 साल हो गए हैं। उनकी रातों की नींद उड़ी हुई है। 30 साल के संजय कुमार कहते हैं, ‘आंखों के सामने घर बह जाएगा, ये सोचकर नींद नहीं आती। हम लोगों ने गांव को बचाने के लिए बहुत संघर्ष किया, तहसील मुख्यालय पर धरना दिया। एप्लिकेशन दी, परचे चिपकाए. लेकिन कुछ नहीं हुआ। बांध बनकर खड़ा हो गया है, लेकिन हजारों लोगों को अभी तक मुआवजा नहीं मिल पाया है। अब चुनाव होने या न होने से हमें कोई फर्क नहीं पड़ता है।’

महिलाएं लाठी लेकर सड़क पर निकलीं, तो नौकरी देने की बात करके मना लिया
एक तरफ सरकार बांध बनवाने में जुटी हुई थी, तो दूसरीओर 11 गांवों के 1500 लोग अपना आशियाना बचाने के लिए कनहर बांध के खिलाफ आवाज बलुंद कर रहे थे। कनहर बचाओ आंदोलन के दौरान सैकड़ों घरों में चूल्हा नहीं जल पाया, क्योंकि इन घरों की महिलाएं रसोईं से निकलकर बांध निर्माण के विरोध में धरना दे रही थीं। आंदोलन का असर हुआ, सरकार ने जमीन जाने के बदले हर परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी का लॉलीपॉप फेंका। हालांकि, सरकार आजतक अपना वादा निभा नहीं पाई है।

साल 2018। महिलाओं ने आंदोलन की कमान थामी। वो लाठी लेकर सड़कों पर उतर आईं। उन्होंने कहा कि प्रोजेक्ट बनाने वालों को मार डालेंगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं।
साल 2018। महिलाओं ने आंदोलन की कमान थामी। वो लाठी लेकर सड़कों पर उतर आईं। उन्होंने कहा कि प्रोजेक्ट बनाने वालों को मार डालेंगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं।

2017 में सबसे ज्यादा नोटा का बटन दबाया, लेकिन फायदा नहीं हुआ
यहां रह रहे लोगों में पहले तो अपना गांव, जमीन और घर जाने की नाराजगी है। दूसरी इनकी नाराजगी इसलिए भी है कि विस्थापन और मुआवजे के मुद्दे पर किसी दल ने इन ग्रामीणों का साथ नहीं दिया।

यही कारण है कि साल 2017 के विधानसभा चुनाव में पूरे यूपी में EVM पर सबसे ज्यादा 18498 नोटा को वोट मिले थे। ऐसा दावा किया जाता है कि इसमें सबसे ज्यादा कनहर प्रभावित गांवों वालों के वोट थे, लेकिन किसी ने एक न सुनी। इसलिए इस बार ये लोग वोट डालने के लिए बहुत उत्साहित नहीं हैं।

2019 में काम लगभग पूरा हो गया था। लेकिन गांव वाले अपने गांवों को बहाने के पक्ष में नहीं थे। लगातार आंदोलन कर रहे थे। इसलिए बीच में काम बंद करने की नौबत थी।
2019 में काम लगभग पूरा हो गया था। लेकिन गांव वाले अपने गांवों को बहाने के पक्ष में नहीं थे। लगातार आंदोलन कर रहे थे। इसलिए बीच में काम बंद करने की नौबत थी।

46 साल से चल रहा है प्रोजेक्ट, 16 साल तक बंद रहा, 2001 में फिर शुरू हुआ
कनहर सिंचाई परियोजना का काम 1976 में शुरू हुआ। वैसे तो इस योजना का काम 10 साल में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन 46 साल पूरे होने के बाद भी इसका काम जारी है। सिंचाई विभाग के अनुसार, साल 1984 से 2000 तक परियोजना का काम बंद रहा। 2001 में फिर से शुरू किया गया था।

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