NOTA दबाने का कोई मतलब है या नहीं?:उन 7.5 लाख वोटरों की सुनने वाला कोई माई-बाप है, जिन्होंने नोटा को वोट दिया ?

6 महीने पहलेलेखक: देवांशु तिवारी

12 दिन बाद फिर वोटिंग होगी। फिर वो कैंडिडेट भी मैदान में होगा, जिसे पूरे 403 विधानसभाओं के लोग वोट देते हैं। वो भी बिना किसी प्रचार के। कोई एक-दो लोग नहीं, 2017 में असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM और ओम प्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी से ज्यादा लोगों ने इसे वोट दिया।

राजभर तो बीजेपी सरकार में मंत्री बन गए, लेकिन नोटा का क्या हुआ? हम यहां नोटा पर सबसे ज्यादा वोट देने वाले इलाकों की पूरी कहानी लेकर आए हैं। देखिए और तय कीजिए कि नोटा दबाना किसी काम का है, या ये फालतू की झंझट है।

2017 यूपी विधानसभा चुनाव में पार्टियों को मिला वोट प्रतिशत। चुनाव में कुल 757643 लोगों ने NOTA बटन दबाया था।
2017 यूपी विधानसभा चुनाव में पार्टियों को मिला वोट प्रतिशत। चुनाव में कुल 757643 लोगों ने NOTA बटन दबाया था।

मटेरा विधानसभा सीट: नोटा न होता तो कोई और विधायक होता, लेकिन हुआ कुछ नहीं

बहराइच जिले की मटेरा विधानसभा सीट पर 2017 में सपा के यासर शाह ने बीजेपी के अरुणवीर सिंह को हराया था। सपा को 1,595 वोटों से जीत मिली थी। नोटा को 2,717 वोट मिले थे।

मोहम्मदाबाद गोहना सीट: नोटा न होता तो बीजेपी की 1 सीट कम हो गई होती

मऊ जिले की मोहम्मदाबाद गोहना सीट पर 2017 में भाजपा के श्रीराम सोनकर ने बसपा के राजेंद्र को सिर्फ 538 वोटों से हराया। यहां नोटा को 1,945 वोट मिले थे।

श्रावस्ती सीटः नोटा न होता तो 100% कुछ और होता यहां का रिजल्ट

श्रावस्ती विधानसभा सीट में भाजपा के राम फेरन ने सपा के मो. रमजान को महज 445 से हराया था। नोटा पर 4,289 वोट पड़े थे। अगर ये वोट उम्मीदवारों में बंटे होते तब भी रिजल्ट पर फर्क पड़ता।

2017 विधानसभा नहीं, 2019 लोकसभा में भी नोटा दबाया, लेकिन हुआ क्‍या

2019 लोकसभा चुनाव में सोनभद्र और बुंदेलखंड में सबसे ज्यादा लोगों ने नोटा का बटन दबाया। यहां 28 सीट ऐसी थीं जहां 10 हजार से ज्यादा लोगों ने नोटा का प्रयोग किया।

पहले नंबर पर सोनभद्र था। यहां 21118 लोगों ने नोटा दबाया। बुंदेलखंड के बांदा में 19250, झांसी में 18,239,मिर्जापुर में 15353 और हमीरपुर में 15155 लोगों ने नोटा को दबाया था।

सोनभद्र में नोटा दबाने की वजह थी कनहर नहर योजना। इसमें 11 गांव डूब जाएंगे। लोग चाहते थे नोटा दबाकर वो अपनी बात ऊपर तक पहुंचा देंगे। कुछ हुआ नहीं। इस बार उन लोगों ने वोट न देने की सोची है।

खिलौना बन गया है NOTA, घटता जा रहा है भरोसा

देश में पहली बार 2013 में छत्तीसगढ़, मिजोरम, राजस्थान, मध्य प्रदेश और दिल्ली के चुनाव में NOTA का प्रयोग हुआ। लगने लगा था कि यह लंबी रेस का घोड़ा है। चुनाव आयोग के एक बयान ने इसकी पावर कम कर दी।

चुनाव आयोग ने कहा कि NOTA वोट गिने तो जाएंगे। लेकिन इसे रद्द मतों की श्रेणी में रखा जाएगा। तभी से नोटा का भौकाल डाउन पड़ गया। इतना कम कि इसे 2014 में 1.08% और 2019 के लोकसभा चुनाव में देश के मात्र 1.04% वोटरों ने दबाया।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या सोचकर NOTA लाने का आदेश दिया था

27 सितंबर 2013 को सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसला सुनाया। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी EVM में एक और कैंडिडेट जोड़ने को कहा। नाम है, NOTA यानी जितने भी लोग विधायकी लड़ रहे हैं, कोई काबिल नहीं।

कहां से आया नोटा का कॉन्सेप्ट, कौन-कौन से देश मानते हैं इसे

साल 1976, अमेरिका के कैलिफोर्निया में म्युनिसिपल काउंसिल के चुनाव थे। यह ऐसा पहला चुनाव था, जब लोगों के पास किसी भी पार्टी को वोट न देने का ऑप्शन था।अमेरिकी चुनाव में शुरू हुई इस व्यवस्था को आज NOTA के नाम से जाना जाता है। नोटा ने शुरुआत के 24 साल में अच्छी प्रोग्रेस की। इसको इतना पसंद किया गया कि अमेरिका को देख रूस, कोलंबिया, यूक्रेन, ब्राजील ,स्पेन और फ्रांस ने भी इसे लागू कर दिया। साल 2013 तक नोटा को दुनिया के 14 देशों ने अपना लिया।

सन 2000 की शुरुआत से इसकी साख गिरती चली गई। अमेरिका में साल 2000 से हुए जनरल इलेक्शन में नोटा वोटिंग 64% से 36% रह गई। 2006 के बाद रूस ने भी नोटा पर चुनावों में बैन कर दिया।

क्या है NOTA?

नोटा का मतलब 'नन ऑफ द एबव' यानी इनमें से कोई नहीं है। इस बटन को दबाने का मतलब है कि आपको चुनाव लड़ रहे कैंडिडेट में से कोई भी उम्मीदवार पसंद नहीं है। EVM में इनमें से कोई नहीं या नोटा का बटन गुलाबी रंग का होता है।

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