UP में इलेक्‍शन करने गए टीचर्स की रुलाने वाली कहानियां:किसी की शादी के पहले ही अर्थी उठी, कोई अपने बच्चे को दुलार नहीं पाई

5 महीने पहलेलेखक: रक्षा सिंह

गिन के 15 दिन बचे हैं। यूपी के 1 लाख 74 बूथों पर फिर टीचर्स की ड्यूटी लग रही है। टीचर्स एसोसिएशन ने मांगों की लंबी-चौड़ी लिस्ट ले जाकर सरकार दे दी है। असल में टीचर्स पिछले साल की घटनाओं से डरे हुए हैं। पिछले साल मार्च में यूपी में पंचायत चुनाव हुए थे।

तब 1621 टीचर्स की जान गई थी। हमने यहां सिर्फ 5 कहानियां ली हैं। जो भी इनसे गुजरेगा, वो जान जाएगा कि टीचर्स इतने डरे क्यों हैं।

1. शादी के 17 साल बाद बेटा हुआ, दुलार भी नहीं कर पाई

भगतपुर, मुरादाबाद: 23 अप्रैल 2021 को नीलम सुबह जल्दी उठीं। रोज से ज्यादा काम था। डबल मास्क, हेडकवर, ग्लव्स और सेनिटाइजर सब जुटाकर रखा था। सुबह उठीं तो फटाफट नाश्ता बनाने लगीं। शादी के पूरे 17 साल बाद बेटा हुआ था। दिनरात उसी के लिए लगी रहती थीं।

बेटे को नाश्ता कराके इलेक्‍शन ड्यूटी को चली गईं। घर लौटीं, तो शरीर तप रहा था। एक घर में आइसोलेट हो गईं। वे अगले दिन कोविड पॉजिटिव हो गईं। पड़ोस के एक अस्पताल भी गईं, लेकिन वो कोविड वाला नहीं था। जब तक अस्पताल वाले ठीक से समझ पाते, 5वें दिन नीलम की सांसें रुक गई। बेटा आज भी घर पर मां का इंतजार कर रहा है।

2. शादी से 7 दिन पहले उठी बेटी की अर्थी

बुलंदशहर: 30 अप्रैल को स्वाति की शादी थी। टेंट हाउस, कैटरिंग, बैंड-बाजे का भी इंतजाम हो गया था। सभी नाते-रिश्तेदारों को कार्ड भी बंट चुके थे। कुछ तो घर पर आ भी गए थे। इंतजार था तो बस स्वाति का। 15 अप्रैल को चुनाव की ड्यूटी करके वो घर आने वाली थीं। चुनाव की ट्रेनिंग चल रही थी कि उन्हें अपनी तबीयत खराब लगने लगी।

कोरोना टेस्ट कराया। रिपोर्ट पॉजिटिव आई। शादी के लिए जो पैसा रखा था, वो लेकर स्वाति की मां और भाई अस्पताल भागे। शादी में भी बस 7 दिन बचे थे। मां को भरोसा था उनकी बेटी जल्दी ठीक होकर बाहर आएगी। वो बाहर तो आई, पर सफेद कपड़े में लिपटकर। 30 अप्रैल को स्वाति की डोली उठने वाली थी पर उससे 7 दिन पहले उनकी अर्थी उठ गई।

3. ड्यूटी पर न जाते तो आज वो जिन्दा होते

मलिहाबाद, लखनऊः संतोष कुमार के घर 3 दिन से मान-मनौव्वल चल रही थी। परिवार कह रहा था कि नौकरी छोड़ दो, लेकिन इलेक्‍शन ड्यूटी पर मत जाओ। संतोष नहीं माने, ड्यूटी पर चले गए। जब वापस लौटे तो गले में मामूली खराश थी। काढ़ा पीकर सोचा कि ठीक हो जाएंगे।

23 अप्रैल की सुबह 103 डिग्री बुखार में उठे। परिवार अस्पतालों के चक्कर लगाने लगा। बड़ी मुश्किल से लखनऊ के एक अस्पताल में जगह मिली, पर वहां भी ऑक्सीजन की कमी थी। 3 दिन बाद संतोष इस दुनिया में नहीं रहे। उनकी पत्नी का बस यही कहना है कि अगर उस दिन उन्होंने बात मान ली होती और ड्यूटी पर नहीं गए होते तो आज वो जिन्दा होते।

4. क्या सरकार मेरे पिता को वापस लौटा सकती है?

भटहट, गोरखपुर: अशोक प्राइमरी स्कूल में प्रिंसिपल थे। उनके 11 लोगों के परिवार में वो अकेले कमाने वाले थे। उनकी 15 अप्रैल को चुनाव में ड्यूटी लगी। 13 अप्रैल को टीम के साथ चुनाव की तैयारी के लिए ब्लॉक पर गए। जब 14 को सोकर उठे तो कमजोरी लगने लगी। कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव आई, 15 अप्रैल को वो चुनाव ड्यूटी पर नहीं जा सके। चुनाव तो जैसे पहले होना था, वैसे हुआ पर अशोक 29 अप्रैल को इस दुनिया से चले गए।

5. मां पहले ही नहीं थीं अब पिता की भी मौत

सिद्धार्थनगर: अश्विनी तिवारी के परिवार में 4 लोग हैं। उनके बूढ़े मां बाप और दो छोटी बच्चियां। उनकी पत्नी की 2 साल पहले ही मौत हो चुकी है। अश्विनी अकेले ही अपने पूरे परिवार की देख-रेख करते थे। पंचायत चुनाव में उनकी भी ड्यूटी लगी।

11 अप्रैल को ट्रेनिंग के लिए गए, 15 को कोरोना हुआ और 21 वो अपने परिवार को बहुत पीछे छोड़कर चले गए। अश्विनी की मौत उनके पिता सुरेश तिवारी बर्दाश्त नहीं कर पाए। 5 दिन बाद उनकी भी मौत हो गई।

ये सिर्फ 5 घरों के हालात हैं। ऐसे 1600 से ज्यादा परिवार हैं। सबकी कहानियां नहीं हैं पर सबके नाम शिक्षक संघ ने ढूंढ के निकाले थे। पूरी लिस्ट 29 पन्नों की है। हम पहले के 2 और आखरी के 2 पेज यहां लगा रहे हैं -

इस लिस्ट के साथ शिक्षक संघ ने सरकार से कहा कि चुनाव कराने में कोरोना से 706 शिक्षकों की मौत हो गई। कम से कम 2 मई को काउंटिंग मत करवाइए। सरकार नहीं मानी। बोली कोरोना से नहीं मरे हैं, इनकी मौत किसी और वजह से हुई है। काउंटिंग भी करवाई गई। अंजाम ये कि मरने वालों की उस लिस्ट में 894 नाम और जुड़ गए।

इसके बावजूद तीसरी लहर के बीचों-बीच विधानसभा चुनावों का ऐलान हो गया। इस बार शिक्षक ड्यूटी करने को लेकर क्या सोच रहे हैं? हमने शिक्षकों और शिक्षक संघ से बात की।

शिक्षक संघ ने इस मांग को लेकर ट्वीट भी किया है। ये कुछ उस ट्वीट पर आए जवाब हैं-

पिछले चुनाव में मैं लकी थी कि बच गई पर इस बार डर लग रहा है

उन्नाव की एक शिक्षिका ने कहा, “पिछली बार के चुनाव में मेरी भी ड्यूटी लगी थी। वोटिंग के बाद जब घर आई तो थोड़ी तबीयत गड़बड़ महसूस हुई। टेस्ट कराया तो मुझे कोरोना हुआ था। मेरा एक 5 साल का बेटा है। हम छोटे से घर में रहते हैं जहां सोशल डिस्टेंसिंग रखना बहुत मुश्किल हो जाता है। उस समय टीचर्स व्हाट्सएप ग्रुप में हर रोज किसीके संक्रमित होने की तो किसी की मौत की खबरे आती रहती थीं। हर वक्त बस यही डर लगा रहता था कि कहीं मुझे भी कुछ हो न जाए। मैं भाग्यशाली थी जो बच गई पर पिछली बार के हालात देख कर इस बार चुनाव में जाने से बहुत डर लग रहा है।”

बस यही एक रोना, नौकरी बचाना है तो ड्यूटी करना पड़ेगा

नाम न बताने की शर्त पर कन्नौज के एक शिक्षक ने हमसे कहा कि सरकार सारे इंतजाम के दावे तो करती है। पर बूथ पर उनका पालन ठीक से नहीं होता। दोपहर के टाइम वोटर्स की एकदम से भीड़ उमड़ने लगती है। इससे कोरोना का खतरा बढ़ जाता है। वोटिंग के बाद घर आकर भी कई दिनों तक किसी से मिलने से डर लगता है। पर अगर नौकरी बचानी है तो इस बार भी ड्यूटी तो करनी ही पड़ेगी।

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