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आत्मनिर्भरता की असल कहानी:हादसा जिंदगी में "लॉकडाउन" लाया तो हौसले ने बंधनों को "अनलॉक" किया; अब बिस्तर पर लेटकर सिलाई करते हैं

वाराणसी2 महीने पहलेलेखक: अमित मुखर्जी
यह तस्वीर वाराणसी में रहने वाले जितेंद्र वर्मा की है। एक हादसे में जितेंद्र की रीड़ की हड्डी में चोट लगी। जिसके बाद अब वे अपने पैरों पर खड़े नहीं हो सकते। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। जब स्वस्थ्य थे तो पैरों से सिलाई मशीन चलाते थे। लेकिन अब उन्होंने अपने हाथों से सिलाई मशीन चलाकर परिवार का गुजारा करने का निर्णय लिया है।
  • सारनाथ के हिरामनपुर गांव के रहने वाले हैं जितेंद्र
  • साल 2003 में छत से गिरने के बाद कमर के नीचे का हिस्सा सुन्न पड़ गया
  • चार साल 2007 में ब्रेन स्ट्रोक हुआ फिर भी जीने का इच्छा नहीं छोड़ी
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कोरोना संकट काल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आत्मनिर्भर बनने का मूल मंत्र दिया। पीएम के संसदीय क्षेत्र में रहने वाले जितेंद्र वर्मा पर आत्मनिर्भरता, जीजीविषा, दृढ़ इच्छा शक्ति जैसे शब्द सटीक बैठते हैं। 17 साल पहले हुए एक हादसे में उनके शरीर का आधा हिस्से (कमर के नीचे) ने काम करना बंद कर दिया। उसके बाद ब्रेन स्ट्रोक पड़ा। लेकिन, जितेंद्र हर मुश्किल परिस्थितियों से जीतकर उबरे बिस्तर पर लेटे हुए हाथों से सिलाई मशीन चलाकर परिवार का भरण पोषण कर रहे हैं। बिटिया बीएचयू से बीएससी कर रही है। जितेंद्र वर्मा और उनकी पत्नी ज्योति ने दैनिक भास्कर से साझा की हौसले की कहानी...

साल 2003 में हादसे में शरीर का निचला हिस्सा पैरालाइज्ड हुआ
सारनाथ के हिरामनपुर गांव निवासी जितेंद्र वर्मा भैरोनाथ के पास बड़े भाई दिनेश के साथ कपड़े सिलने का काम करते थे। बात 25 फरवरी 2003 की है। जितेंद्र वर्मा छत से गिर गए थे। चोट उनकी रीड़ की हड्डी में लगी थी। डॉक्टरों की सलाह पर उन्होंने ऑपरेशन कराया। लेकिन, चोट और घाव दे गई। जिन पैरों से सिलाई मशीन को वे सरपट चलाते थे, उस हादसे के बाद कमर के नीचे हिस्से ने काम करना बंद कर दिया। नित्यक्रिया भी बिस्तर पर ही करने को मजबूर हो गए। डॉक्टरों ने कह दिया था कि, अब कभी पैरों पर खड़े नहीं हो पाएंगे। बस हिम्मत कभी मत हारना। जितेंद्र ने इस शब्द को अपने जीवन में ढाल लिया। पत्नी ज्योति ने पूरा सहयोग दिया। वे 45 दिनों तक अस्पताल में भर्ती रहे। एक दिन जितेंद्र ने अपने हाथों से मशीन को चलाने का फैसला लिया। 

जितेंद्र अब अपने हाथ से सिलाई मशीन चलाकर अपनी आजीविका चलाते हैं।

छह माह तक घर में खाली पड़ा रहा
जितेंद्र कहते हैं कि, अस्पताल से घर आकर 6 महीने कुछ भी नहीं कर पाया। फिर एक दिन मशीन को घर मंगाकर पूरा पत्नी और भाई के मदद से पैरों की जगह हाथों से चलाने के लिए सेट कर दिया। जीवन में लगे लॉकडाउन को अनलॉक किया। धीरे-धीरे कपड़े सीलना शुरू कर दिया। काम आने लगा। शुरुआत में स्पीड स्लो थी, अब आठ घंटे आराम से काम कर लेता हूं। बिस्तर या व्हील चेयर से कस्टमर का नाप ले लेता हूं। कपड़े की कटिंग लेटे लेटे ही करता हूं। वैसे ही उसे सील भी लेता हूं, प्रेस भी कर लेता हूं। जीवन में कभी हार नही मानी, बस यही समझा कि भगवान ने हुनर दिया है तो आत्मनिर्भर बन कर रहूंगा।

परिवार की मदद ने हादसे के बाद एक बार फिर संभलने का हौसला दिया।

पत्नी बोलीं- इलाज में गहने बेच दिए पर हिम्मत नहीं टूटने दी

पत्नी ज्योति वर्मा ने बताया कि जब पति गिरे तो बच्ची डेढ़ साल की थी। इलाज में गहने तक बिक गए। 8 लाख से ज्यादा रुपए इलाज में खर्च हो गया। हादसे में चोट पति को लगी थी, लेकिन कई जिंदगियां एक साथ लड़ रही थीं। इसी बीच 2007 में ब्रेन स्ट्रोक हो गया। फिर 10 दिन अस्पताल में भर्ती करना पड़ा। 500 रुपए की दवा एक दिन की पड़ती थी। एक हाथ में कमजोरी आई और बात करने की क्षमता कम हो गई। लेकिन अस्पताल में देखा कि मुझसे भी ज्यादा लोग परेशान हैं। तभी से हार न मानने की ठान ली। सरकार को ऐसे लोगो की मदद करनी चाहिए। 10 साल बाद 300 रुपए पेंशन मिलना शुरू हुआ है।

हादसे के दस साल बाद जितेंद्र को सरकार की तरफ से 300 रुपए मासिक पेंशन मिलना शुरू हुई।

बिटिया होनहार, मां बोली- मेरा बेटा देश के लिए मिसाल

जितेंद्र की बेटी बीएचयू से बीएससी कर रही है। इंटरमीडिएट में उसका यूपी बोर्ड से जिले में चौथी रैंक थी। उसे स्कॉलरशिप मिली है। जिसकी मदद से वह पढ़ाई कर रही है। मां पदमा देवी ने कहा- मुझे अपने बेटे पर गर्व है। वह बिना पैरों के आज खड़ा है। किसी के सामने उसने बोझ न बनने की ठानी। अपनी लाचारी को हुनर में बदलकर परिवार चला रहा है। लोग कपड़े का आर्डर देने आने लगे हैं।

जितेंद्र के जीवन को सामान्य बनाने में उनका पूरा परिवार सहयोग कर रहा हैद्ध

एक्टर सुशांत सिंह की मौत से दुखी जितेंद्र, बोले- लड़ना चाहिए था

जितेंद्र ने बताया की एक्टर सुशांत को आत्महत्या न करके उदाहरण बनना चाहिए था। संघर्ष कर उन्होंने बहुत बड़ी बड़ी फिल्मों को दिया। स्ट्रगल जीवन में आया तो लड़ना चाहिए था। भागने से इंसान में नकारात्मक सोच पनपती है। डिप्रेशन का शिकार इंसान हो जाता है। 

जितेंद्र का कहना है- जीवन में कभी निराश नहीं होना चाहिए। मुसीबतों से जूझना चाहिए।

जल्द मिल सकती है सरकारी मदद

केंद्रीय सलाहकार बोर्ड दिव्यांगजन सशक्तीकरण के सदस्य डॉ. उत्तम ओझा ने बताया कि कुछ महीने पहले जितेंद्र को 37 हजार रुपए से मोटराइज्ड ट्राई साइकिल दिया गया था। कई सालों बाद वो घर के बाहर निकले थे। इनके लिए कई कारीगरों से बात चल रही है कि टीम जोड़कर इनको रोजगार और दिया जाए। साथ ही इनके घर तक की सड़क और पीएम आवास के लिए भी बात किया जा रहा है। 

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