इलाहाबाद हाईकोर्ट की बड़ी खबरें:अधिग्रहण प्रक्रिया पूरी होने के बाद भूमि स्वामी को कब्जा जमाए रखने का अधिकार नहीं

प्रयागराजएक महीने पहले
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एक बार जब भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी हो गई और कब्जा ले लिया, तो सरकार से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह कब्जा बनाए रखने के लिए पुलिस तैनात करे। ऐसे में अगर भूमि स्वामी जमीन पर कब्जा बनाए है या उस पर कोई निर्माण करता है, तो उसे अतिचारी माना जाएगा। यह बात मंगलवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कही।

शिवराज सिंह व अन्य की याचिका पर मुख्य न्यायमूर्ति राजेश बिंदल और न्यायमूर्ति पीयूष अग्रवाल की खंडपीठ ने सुनवाई की। कोर्ट ने अधिग्रहीत भूमि सरकार द्वारा उपयोग न करने के आधार पर वापस करने की याची की मांग ठुकरा दी। कोर्ट का कहना था कि अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। अवार्ड घोषित हो गया और याची ने मुआवजा ले लिया है। जमीन पूरी तरह से मुक्त होकर सरकार में निहित हो गई है।

अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता रामानंद पांडेय का कहना था कि सरकार ने अधिग्रहण के बाद जमीन का कब्जा औद्योगिक विकास निगम को सौंप दिया है। निगम ने प्लाट काट कर अलॉटमेंट भी कर दिए हैं। मात्र जमीन का कुछ हिस्सा छूटा था। जिस पर याची ने अतिक्रमण कर निर्माण किया है। अधिग्रहण के बाद भूमि का उपयोग किया गया है।

मुआवजा ब्याज सहित लौटाने को तैयार था याची

याची की ओर से दलील दी गई कि 1986 में जमीन का अधिग्रहण औद्योगिक विकास के लिए किया गया। मगर राज्य सरकार ने अभी तक जमीन पर कब्जा नहीं‌ लिया। भूमि याची के ही कब्जे में है। उसने मुआवजा प्राप्त किया है, जिसे ब्याज सहित लौटाने को तैयार है। जिस प्रोजेक्ट के लिए जमीन ली गई थी, ‌वह पूरा हो चुका है। याची ने 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून का हवाला भी दिया कि 5 साल तक अधिग्रहीत भूमि का उपयोग न करने पर उसे भूमि स्वामी को लौटानी होगी। कोर्ट ने कहा कि याची के मामले में 2013 का कानून लागू नहीं होगा। क्योंकि अधिग्रहण की प्रक्रिया यह कानून आने से पहले पुराने कानून से पूरी हो चुकी है।

# इकलौते बेटे की दुर्घटना में मौत पर मां को साढ़े 33 लाख रुपए मुआवजा दें

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नेशनल बीमा कंपनी को नौकरी कर रहे अपने माता-पिता की इकलौती संतान की सड़क हादसे में मौत पर 33 लाख 50 हजार रुपए का मुआवजा देने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि एक युवा की दुर्घटना में मौत माता-पिता और परिवार के लिए सदमा है। माता-पिता के जीवित रहते युवा बेटे की मौत पर दुख और मानसिक पीड़ा की हम कल्पना ही कर सकते हैं। मां ने पहले अपना इकलौता बेटा खोया, फिर पति भी नहीं रहे। वह अपना बाकी का जीवन संघर्षों में बिता रही है। कोर्ट ने अधिकरण के अवार्ड की तारीख से 8 फीसदी ब्याज भी देने का निर्देश दिया है।

20 जुलाई, 2004 को अभिषेक की दिल्ली-पर सड़क हादसे में मौत हो गई थी। जिसमें मुआवजे का दावा किया गया था।

कोर्ट ने बीमा कंपनी की इस दलील को नहीं माना कि ट्रक 50 किमी की रफ्तार से चल रहा था। ज्यादा स्पीड नहीं थी। कोर्ट ने कहा कि लापरवाही से ड्राइविंग को हमेशा तेज रफ्तार से जोड़ा नहीं जा सकता। यह आदेश न्यायमूर्ति सुनीता अग्रवाल और न्यायमूर्ति कृष्ण पहल की खंडपीठ ने डॉ. अनूप कुमार भट्टाचार्य (मुकदमे के दौरान मृत) और लीना भट्टाचार्य की अवार्ड के खिलाफ दाखिल अपील पर दिया है।

अपील करने वाले का कहना था कि ट्रक ड्राइवर लापरवाही से ट्रक चला रहा था। उसका बीमा था। ऐसे में बीमा कंपनी को उचित मुआवजे का भुगतान करना चाहिए। बीमा कंपनी का कहना था कि एक चश्मदीद ने ट्रक का कुछ दूर तक पीछा भी किया। स्पीड 50 किमी ही थी। अधिकरण ने 2 लाख 30 हजार 400 रुपए 8 फीसदी ब्याज सहित मुआवजे के भुगतान का आदेश दिया था। जिसे हाईकोर्ट ने बढ़ा दिया।

# फर्जी मुकदमे दर्ज करने के मामले में हाईकोर्ट में पेश हुए DGP

मुजफ्फनगर के कटौली थाने की पुलिस द्वारा एक व्यक्ति पर 23 सालों में 49 फर्जी मुकदमे दाखिल करने के मामले में DGP और SSP हाईकोर्ट में पेश हुए। उनकी ओर से हलफनामा दाखिल कर बताया गया कि याची द्वारा किए जा रहे दावे सही नहीं हैं। यहां तक कि उसने जो याचिका में कहा है और उसके समर्थन में जो कागजात लगाए हैं, उनमें विरोधाभास है। DGP की ओर से दाखिल हलफनामे पर कोर्ट ने याची के अधिवक्ता को जवाब दाखिल करने का समय दिया है। कोर्ट ने अगली सुनवाई पर DGP को पेश होने से छूट दे दी।

प्रदेश सरकार का पक्ष रख रहे अपर महाधिवक्ता मनीष गोयल ने कोर्ट को बताया कि याची ने ‌जिन मुकदमों में खुद को बरी बताया है, दरअसल उनमें सजायाफ्ता है। याचिका में लगाए गए दस्तावेजों से ही यह पता चलता है। फर्जी मुकदमे द‌ाखिल करने की बात मनगढ़ंत है।

इससे पहले कोर्ट ने फर्जी मुकदमों की बात सामने आने पर सख्त रुख अपनाते हुए DGP और SSP को तलब किया था। कोर्ट ने कहा था कि यह केवल जमानत का मसला नहीं है। बल्कि अनुशासित पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर उठे सवालों के जवाब का है। कोर्ट ने कहा था कि हर आदमी के जीवन की कीमत समान है। बीता दिन लौट कर वापस नहीं आता। जीवन पर लगे दाग मुआवजे से धुल नहीं सकते।

कोर्ट ने कहा पिछले 23 सालों में पुलिस ने याची पर 49 आपराधिक केस दर्ज हुए। अधिकांश में वह बरी हो गया। कुछ में पुलिस ने गलती से शामिल होना मानते हुए वापस ले लिया। मानवाधिकार आयोग ने भी पुलिस पर याची के पक्ष में 10 हजार रुपए का हर्जाना भी लगाया। केस में फंसाने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। इसलिए दोनों शीर्ष अधिकारी अदालत में हाजिर हो। यह आदेश न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह ने गौरव उर्फ गौरा की नारकोटिक्स ड्रग्स एक्ट के तहत दर्ज मामले में दाखिल जमानत अर्जी पर दिया है।

कोर्ट के निर्देश पर याची का आपराधिक केस चार्ट पेश किया गया। जिससे एक ही थाने कटौली में 49 केस दर्ज होने का खुलासा हुआ है। याची का दावा था कि 45 मामलो में से 11 में बरी हो चुका है। 9 केस पुलिस ने वापस ले लिया। 2 में गलती से शामिल किया गया है। एक केस में NSA लगाया है। जो रद्द हो चुका है। 21 केस में जमानत पर है। एक में अग्रिम जमानत मिली है। याची व उसकी पत्नी ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को फर्जी केस में फंसाने की शिकायत की। जिसकी जांच के बाद पुलिस पर हर्जाना लगाया गया।