218 साल बाद अक्षयवट को CDS ने कराया था आजाद:प्रयागराज में अंग्रेजों ने कर दिया था बंद, बिपिन रावत ने तैयार किया था दर्शन का रोडमैप

प्रयागराज10 महीने पहले
2019 में प्रयागराज में तत्कालीन रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण के साथ बिपिन रावत। (फाइल फोटो)।
  • 18वीं शताब्दी से बंद थे दर्शन, सेना ने आम आदमी को नहीं दी थी इजाजत

इलाहाबाद किले में 1801 से बंद अक्षय वट के दर्शन आम आदमी के लिए आसान कराने में बिपिन रावत की बड़ी भूमिका रही है। देश गुलाम होने के बाद अंग्रेजों ने इस अक्षय वट तक लोगों के जाने का रास्ता बंद करा दिया था। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण मोक्ष के लिए अक्षय वट से कूदकर जान देने की प्रथा थी।

2019 में जनरल बिपिन रावत की कड़ी मेहनत से यह कुंभ में आम लोगों के लिए खोला गया। कुंभ में 5 करोड़ लोगों ने अक्षय वट के दर्शन किए। यह इलाहाबाद फोर्ट के अंदर स्थित है। यह किला सेना के कब्जे में है।

18वीं शताब्दी तक मोक्ष की चाह में अक्षय वट से कूदकर होती थीं आत्महत्याएं

कुंभ में 5 करोड़ लोगों ने अक्षय वट के दर्शन किए। यह इलाहाबाद फोर्ट के अंदर स्थित है। यह किला सेना के कब्जे में है।
कुंभ में 5 करोड़ लोगों ने अक्षय वट के दर्शन किए। यह इलाहाबाद फोर्ट के अंदर स्थित है। यह किला सेना के कब्जे में है।

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के इतिहासविद प्रो. हेरंब चतुर्वेदी कहते हैं कि अक्षय वट यानी कभी न सूखने और खत्म होने वाला वृक्ष। कहा जाता है, जब प्रलय आई, तो धरती पर यही एकमात्र वृक्ष बचा था। इसलिए ऐसी मान्यता बनी कि इसमें अमृत तत्व पाया जाता है। इसी धारणा के कारण 18वीं शताब्दी तक इस पेड़ से कूदकर आत्महत्याएं होती रही हैं।

माना जाता रहा है कि अक्षय वट के नीचे जान देने से मोक्ष मिलता है। इसी के चलते अंग्रेजों ने 1801 में इसके दर्शन पर रोक लगा दी थी। इसके बाद से इसे खोलने की मांग की जाती रही।

2018 में बिपिन रावत ने खींचा था दर्शन का खाका

2019 में अक्षय वट को खोलने से पहले 22 अगस्त, 2018 में बिपिन रावत ने किले का दौरा किया था। उन्होंने सुरक्षा से बिना किसी प्रकार का समझौता किए अक्षय वट के दर्शन का रोडमैप तैयार किया था। उनके साथ में तत्कालीन रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण भी आई थीं। फोर्ट में बैठक करने के बाद अक्षय वट को आम जनता के लिए खोलने का निर्णय लिया था। अक्षय वट के दर्शन के लिए एक वैकल्पिक रास्ता भी बनाया गया था। सेना की सुरक्षा में किले के अंदर इसके दर्शन के लिए स्थानीय पुलिस भी लगाई जाती थी।

अक्षय वट को लेकर ये हैं मान्यताएं

चीनी यात्री ह्वेनसांग व अलबरूनी ने भी अपने यात्रा वृतांत्र में इसके बारे में लिखा है। अलबरूनी कहता है कि गंगा-यमुना के संगम पर एक विचित्र वटवृक्ष है। ऐसा विशाल वृक्ष पहली बार जीवन और प्रयाग में देखा। इसके अलावा इतिहासकारों ने लिखा है कि इस वृक्ष पर लोग चढ़ जाते थे और कूदकर जान दे देते थे। जब अंग्रेज भारत आए, तो 1801 में इसके दर्शन को बंद कर दिया।

यह सृष्टि और प्रलय का साक्ष्य है : प्रो. हेरंब चतुर्वेदी

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के इतिहासकार प्रो. हेरंब चतुर्वेदी कहते हैं कि मुगल शासक जहांगीर ने इसे काटवाने और नष्ट करने का प्रयास किया था। हालांकि, वह सफल नहीं हो सका। कहा जाता है कि यह वृक्ष सृष्टि और प्रलय का साक्ष्य है। यह कभी नष्ट नहीं होता। इसीलिए इसे अक्षय वट कहा जाता है। देश-दुनियाभर के करोड़ों लोगों की इस अक्षय वट में आस्था है। इसे आम लोगों के लिए खोले जाने की मांग हो रही थी।

रामचरित मानस और मत्स्य पुराण में भी है अक्षय वट का उल्लेख

अक्षय वट का उल्लेख पुराणों में भी है। गुप्तकाल से इसका विशेष उल्लेख मिलता है। गुप्तकालीन साहित्य मत्स्य एवं वायुपुराण में संगम तट पर अक्षय वट के होने का उल्लेख मिलता है। मत्स्य पुराण में कहा गया है कि यह कभी भी नष्ट नहीं होगा। स्वयं महेश्वर शिव वट वृक्ष का रूप धारण करके यहां निवास करते हैं। रामचरित मानस के अयोध्याकांड में भी अक्षय वट का वर्णन किया गया है।

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