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इंजीनियर समोसा का स्वाद बना पहली पसंद:​​​​​​​प्रयागराज में इंजीनियर अमित पिता संग बेचते हैं समोसे, पढ़ाई से नौकरी तक नही टूटा दुकान से नाता

प्रयागराज8 महीने पहले
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दुकान तेलियरगंज के समीप अपट्रान चौराहे पर है, जहां रोज 300-400 लोग समोसे खाने आते हैं। - Dainik Bhaskar
दुकान तेलियरगंज के समीप अपट्रान चौराहे पर है, जहां रोज 300-400 लोग समोसे खाने आते हैं।

संगमनगरी प्रयागराज के रहने वाले अमित यादव उर्फ गोलू दिनभर इंजीनियर की भूमिका में रहते हैं। लेकिन, शाम होते ही पिता की दुकान पर समोसा बेचते दिखते हैं। बीटेक की पढ़ाई करने वाले अमित अपने बुजुर्ग पिता के काम में हाथ बंटाने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते। पिता बीपी के मरीज हैं, इसलिए वे उन्हें ज्यादा काम करते नहीं देखना चाहते।

वह इलाहाबाद हाईकोर्ट में बतौर टेक्निकल असिस्टेंट पद पर तैनात हैं। इंजीनियरिंग के साथ अमित समोसा बनाने में भी उस्ताद हैं। लोगों का कहना है कि अमित के हाथों से बने समोसे बड़े स्वादिस्ष्ट होते हैं। परिवार के लोगों को उनके समोसे पहली पसंद बन गए हैं। इनकी दुकान तेलियरगंज के समीप अपट्रान चौराहे पर है। जहां प्रतिदिन 300-400 लोग समोसे खाने आते हैं।

यह है इंजीनियर वाला समोसा
अमित के घर का नाम गोलू है। मोहल्ले के ही गुड्डू शुक्ला बताते हैं कि गोलू के हाथ से बने समोसे हमारे परिवार की पहली पसंद हैं। तभी तो लोग इसे इंजीनियर समोसा के नाम से पुकारते हैं। अजय पांडेय का कहना है कि यह कोई सामान्य समोसा नहीं बल्कि इंजीनियर वाला समोसा है। गोलू से दुकान पर चाहे जब मिलिए वह हमेशा मुस्कुरा कर ही स्वागत करते हैं। खुद समोसा बनाते हैं और उसे परोसते भी हैं। पिता ध्रुव कहते हैं मैं सौभाग्यशाली हूं कि मेरा बेटा इंजीनियर है। उससे भी ज्यादा खुशी है कि वह मेरे साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा है। एक पिता के लिए इससे बड़ी खुशी की बात और क्या हो सकती है।

अमित के पिता ध्रुव कहते हैं मैं सौभाग्यशाली हूं कि बेटा मेरे साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा है।
अमित के पिता ध्रुव कहते हैं मैं सौभाग्यशाली हूं कि बेटा मेरे साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा है।

पिता के कार्यों में सहयोग करना गर्व की बात
अमित ने दैनिक भास्कर से बातचीत में बताया कि शाम को जब वह ऑफिस से लौटते हैं तो सीधे अपने समोसे की दुकान पर पहुंचते हैं। वहां रात नौ बजे तक पिता और भाई के साथ समोसे बेचते हैं। इस काम से मुझे बहुत खुशी होती है। पिता जी के कार्यों में हाथ बंटाने से मुझे खुद पर गर्व होता है। पिता जी ने कई बार मना भी किया कि वह दुकान पर न आए। कहते हैं मुझे अपने इस कार्य को करने में कोई हिचक नहीं होती है।

जीवन में नहीं छूटा समोसे का साथ
अमित बताते हैं कि वर्ष 1985 में मेरे दादा स्व. बीपी यादव समोसे की दुकान चलाते थे। बाद में पिताजी ध्रुव यादव इसे संभालने लगे। अब वह अस्वस्थ हैं लेकिन तब भी दुकान पर आते हैं। हम दोनों भाई दुकान पर उनका हाथ बंटाते हैं। यानी तीन पीढ़ी से समोसे का कारोबार चल रहा है। हाईस्कूल की परीक्षा रही हो या फिर बीटेक की पढ़ाई, समोसे से कभी नाता नहीं तोड़ा। परीक्षा के दिन भी समोसे की दुकान पर आकर पिताजी के हाथ बंटाता था। अब नौकरी के दिनों में ये जारी रहेगा।

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