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हॉकी स्टार गुरजीत कौर की कहानी, बहन की जुबानी:छठी क्लास में पिता ने गिफ्ट की थी हॉकी स्टिक, दो दिन तक खेला नहीं सिर्फ देखती रही, बड़ी बहन ने बताए अनछुए किस्से

प्रयागराजएक वर्ष पहलेलेखक: अमरीश शुक्ल

कभी कभी बचपन में आपका बच्चों को दिया गया एक गिफ्ट उनकी जिंदगी बदल सकता है। टोक्यो ओलिंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व कर रही इंटरनेशनल हॉकी प्लेयर गुरजीत कौर के साथ भी वही हुआ। तीन बार की ओलिंपिक चैंपियन ऑस्ट्रेलिया का गुरूर तोड़ने वाली गुरजीत को कक्षा 6 में उनके पिता ने गिफ्ट में हॉकी की स्टिक और एक जोड़ी शूज गिफ्ट में दिए थे।

उस वक्त वह बोर्डिंग स्कूल में थीं। पिता जब दूसरी बच्चियों को खेलते देखते तो उनके मन में भी आया था कि उनकी बेटी भी खेले। इसके बाद जब गुरजीत ने हॉकी पकड़ी तो कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। क्रिकेट के देश में हॉकी खेल की गूंज आज गुरजीत जैसी बेटियों की वजह से है। गुरजीत कौर वर्तमान में उत्तर मध्य रेलवे के प्रयागराज मंडल के कार्मिक विभाग में बतौर क्लर्क तैनात हैं। 'दैनिक भास्कर' ने गुरजीत की बड़ी बहन प्रदीप कौर से बात की। वह भी हॉकी की नेशनल प्लेयर हैं। इस समय वह जालंधर में स्पोर्ट्स डिपार्टमेंट में हॉकी कोच हैं। पेश है बातचीत के अहम बिंदु...

पिता ने खेलने के लिए दिलाया था पहला ट्रैक
प्रदीप ने बताया कि गुरजीत को पिता सरदार सतनाम सिंह ने बचपन में जब शूज, ट्रैक शूट लाकर दिया था तो पहले वो उसे एकटक देखती रहीं। दो दिन तक पहना नहीं। इसके बाद शूज पहनकर जब मैदान में उतरीं तो पीछे मुड़कर कभी नहीं देखा। पिता की मंशा की गुरजीत ने लाज रखी। पिता चाहते थे कि बेटियां हमारी खेल में खूब नाम करें।

पंजाब के अमृतसर जिले में स्थित गांव मियादी कलां के रहने वाले सतनाम सिंह की तीन संतानें हैं। गुरजीत दूसरे नंबर की हैं। उनसे बड़ी एक बहन हैं, जिनका नाम प्रदीप कौर है। प्रदीप कौर भी जालंधर में स्पोर्ट्स डिपार्टमेंट में हॉकी कोच हैं।

प्रदीप कौर ने बताया कि मेरे पिता सतनाम सिंह को अपनी बेटियों को पढ़ाने का बहुत शौक था। यही कारण था कि गांव में सरकारी स्कूल होने के बावजूद उन्होंने हमें शहर से 12 किलोमीटर दूर तरनतारन जिले के कैंरो गांव के एक बोर्डिंग स्कूल में दाखिला कराया। कभी वो हम दोनों को साइकिल पर कभी बस से स्कूल छोड़ने और लेने आते। काफी परेशानी होती थी। इसलिए उन्होंने कक्षा 6 से हम दोनों को बोर्डिंग स्कूल में डाल दिया। हम दोनों बहनें वहीं पढ़ने लगीं। कक्षा सात में मैं अमृतसर आ गई। गुरजीत कौर ने वहीं से 12वीं तक की पढ़ाई की।

गुरजीत ने केवल हॉकी खेली, अच्छा खाना खाया और सोया
प्रदीप कौर बताती हैं कि उनकी छोटी बहन के मन में बोर्डिंग स्कूल के दौरान कक्षा 6 से ही हॉकी के प्रति दीवानगी ने जन्म लिया। इसके बाद वह केवल प्रैक्टिस करती, खाना खाती और सो जाती। पढ़ाई में औसत रही।

गुरजीत ने घर आकर भी नहीं छोड़ी प्रैक्टिस
प्रदीप बताती हैं कि गुरजीत जब कभी कैंप से छुट्‌टी मिली तो घर आती हैं। घर आने के बाद वो कभी अपनी फिटनेस के साथ समझौता नहीं किया। सुबह-शाम मैदान पर दो घंटे समय बिताना ही है उसे। पसीना बहाना ही है। कभी उसने आलस्य नहीं किया। यही कारण है कि वह फिटनेस के मामले में हिट है।

उत्तर मध्य रेलवे के बाहर अंतरराष्ट्रीय हॉकी प्लेयर गुरजीत कौर।
उत्तर मध्य रेलवे के बाहर अंतरराष्ट्रीय हॉकी प्लेयर गुरजीत कौर।

पिता ने कहा परमात्मा की कृपा से सब कुछ मिला
पिता सतनाम सिंह ने दैनिक भास्कर से बातचीत में कहा कि यह हम सबके लिए खुशी का दिन है। यह सब परमात्मा की कृपा है। मां हरजिंदर कौर और दादी दर्शन कौर अपनी बेटी गुरजीत कौर के प्रदर्शन से बेहद खुश हैं। हर तरफ खुशी का माहौल है। गुरजीत ने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ टोक्यो ओलंपिक में गोल दागकर टीम को जीत दिलाई तो घर में बधाई देने वालों का तांता लग गया।

गुरजीत का संयुक्त परिवार। बाएं से प्रथम उनके पिता सरदार सतनाम सिंह व मां हरजिंदर कौर, चाचा-चाची व अन्य।
गुरजीत का संयुक्त परिवार। बाएं से प्रथम उनके पिता सरदार सतनाम सिंह व मां हरजिंदर कौर, चाचा-चाची व अन्य।

यूं रहा शुरुआती सफर

  • गुरजीत ने शुरुआती पढ़ाई गांव के पास एक निजी स्कूल से की।
  • तरनतारन जिले के कैंरो गांव के एक बोर्डिंग स्कूल में दाखिला लिया।
  • यहीं से हॉकी की शुरुआत हुई और उन्हें छात्रवृति भी मिली।
  • इसके बाद गुरजीत कौर ने जालंधर के लायलपुर खालसा कॉलेज में बीए किया।
  • बीए में लगातार पांच साल तक कॉलेज की अकादमी की ओर से खेला।
  • गुरजीत ने उत्तर मध्य रेलवे प्रयागराज में खेल कोटे से सितंबर 2016 ज्वाइन किया था।
  • उस समय गुरजीत हॉकी की नेशनल प्लेयर थीं।
  • इस दौरान उनका चयन भारतीय हॉकी टीम में हुआ।
  • इसके बाद 2018 में एशियन गेम्स में हिस्सा लिया।
  • इसके बाद कॉमन वेल्थ गेम में भी हिस्स्सा लेने का मौका मिला। गुरजीत डिफेंडर हैं।
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