लिव-इन जोड़े को सुरक्षा देने से इंकार:इलाहाबाद HC ने कहा- ऐसे तो सामाजिक ताना-बाना ही बिखर जाएगा, 5 हजार जुर्माना भी ठोका

प्रतापगढ़4 महीने पहले
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याचिका में यह मांग की गई थी कोर्ट यह आदेश जारी करें कि याची के शांतिपूर्ण लिव-इन-रिलेशन में हस्तक्षेप न किया जाए और पुलिस जबरदस्ती परेशान न करे। - Dainik Bhaskar
याचिका में यह मांग की गई थी कोर्ट यह आदेश जारी करें कि याची के शांतिपूर्ण लिव-इन-रिलेशन में हस्तक्षेप न किया जाए और पुलिस जबरदस्ती परेशान न करे।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने घर से भागे हुए एक जोड़े को सुरक्षा देने से साफ इंकार कर दिया और गंभीर टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि अगर इस तरह से लिव इन रिलेशनशिप में रहने वालों को साथ रहने और सुरक्षा देने की अनुमति दे दी जाएगी तो इससे पूरा सामाजिक ताना-बाना ही बिगड़ जाएगा। इसलिए संरक्षण देने का कोई आधार नहीं बनता। कोर्ट ने प्रेमी युगल की सुरक्षा देने की मांग की याचिका को खारिज करते दोनों पर पांच हजार रुपये का अर्थदंड भी लगाया।

महिला पहले से शादीशुदा, पति के साथ नहीं रहना चाहती
न्यायमूर्ति डॉ. कौशल जयेंद्र ठाकर और न्यायमूर्ति दिनेश पाठक की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि “दोनों याची वयस्क हैं, तो क्या हम इन लोगों को सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं जो ऐसा करना चाहते हैं जिसे हिंदू विवाह अधिनियम के जनादेश के खिलाफ कहा जा सकता है।" दरअसल, घर से भागे हुए जोड़े में लड़की पहले से ही शादीशुदा है। कोर्ट ने कहा कि भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 किसी व्यक्ति को अपनी स्वतंत्रता की अनुमति देता है, लेकिन स्वतंत्रता उस कानून के दायरे में होनी चाहिए जहां वो लागू होती है।

सुरक्षा देने की मांग खारिज
याचिका में यह मांग की गयी थी कि कोर्ट यह आदेश जारी करें कि याची के शांतिपूर्ण लिव-इन-रिलेशन में हस्तक्षेप न किया जाए और पुलिस जबरदस्ती परेशान न करे। इसके अलावा पुलिस की सुरक्षा मुहैया कराई जाए। महिला याची ने कहा था कि वह प्रतिवादी संख्या 5 की कानूनी रूप से विवाहित पत्नी है और उसने कुछ कारणों से अपने पति से दूर जाने का फैसला किया है।

स्वतंत्रता की सुरक्षा की आड़ में लिव-इन-रिलेशन की अनुमति नहीं दे सकते
इस पर पीठ ने कहा- क्या हम इन्हें जीवन और स्वतंत्रता की सुरक्षा की आड़ में लिव-इन-रिलेशन की अनुमति दे सकते हैं। क्या उसके पति ने ऐसा कृत्य किया था, जिसे धारा 377 आईपीसी के तहत अपराध कहा जा सकता है, जिसके लिए उसने कभी शिकायत नहीं की है। ये सभी तथ्यों के विवादित प्रश्न हैं।

इस मामले में कोई प्राथमिकी भी नहीं है इसलिए, हम यह समझने में विफल हैं कि इस तरह की याचिका से समाज में अवैधता की अनुमति कैसे दी जा सकती है। ऐसे में रिट याचिका को पांच हजार के अर्थदंड के साथ खारिज किया जाता है।

पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने भी खारिज की थी याचिका
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में लिव-इन में रह रहे एक कपल ने संरक्षण देने की मांग करते हुए याचिका दाखिल की थी। याचिका दाखिल करने वालों में लड़के की उम्र लड़की की उम्र 18 साल के आसपास थी। याचिका में कहा गया था कि उन्हें लड़की के परिवार वालों से खतरा है, इसलिए उन्हें सुरक्षा दी जाए।

इस पर भी हाईकोर्ट ने कहा कि अगर इस तरह के संरक्षण का दावा करने वालों को इसकी अनुमति दे दी जाएगी तो इससे समाज का पूरा सामाजिक ताना-बाना बिगड़ जाएगा. इसलिए संरक्षण देने का कोई आधार नहीं बनता है। इससे पहले राजस्थान हाईकोर्ट ने भी पिछले महीने लिव-इन में रह रहे 21 साल की लड़की और 19 साल के लड़के की संरक्षण देने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया था।

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