इलाहाबाद हाईकोर्ट की बड़ी खबरें:237 करोड़ हड़प कर विदेश भागे शाइन सिटी के मुख्य आरोपी नसीम ब्रदर्स की गिरफ्तारी का निर्देश

प्रयागराज19 दिन पहले
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प्रतीकात्मक फोटो - Dainik Bhaskar
प्रतीकात्मक फोटो

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने धोखाधड़ी कर सैकड़ों निवेशकों का करोड़ों रुपये हड़प लेने वाली शाइन सिटी कम्पनी के मुख्य आरोपी डायरेक्टर राशिद नसीम और उसके भाई आसिफ नसीम व अन्य आरोपियों की गिरफ्तारी का आदेश दिया है।

कोर्ट ने यह भी कि देश से भागे आरोपी का पासपोर्ट तत्काल निरस्त किया जाये। कोर्ट ने आर्थिक अपराध शाखा के निदेशक को 22 अक्तूबर को तलब किया है। उनसे यह भी पूछा है कि विदेश भागने वाले दो मुख्य आरोपियों में से एक का ही पासपोर्ट क्यों निरस्त किया गया। कोर्ट ने कहा कि 1647 निवेशकों के 237 करोड़ हड़पने वालों के खिलाफ 284 एफआईआर दर्ज कराई गई हैं। एफआईआर दर्ज होते ही पासपोर्ट क्यों नहीं निरस्त किया गया।

यह आदेश कार्यवाहक मुख्य न्यायमूर्ति एमएन भंडारी एवं न्यायमूर्ति पीयूष अग्रवाल की खंडपीठ ने श्रीराम राम की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है। कोर्ट ने हैरानी जताई कि अभियुक्तों के खिलाफ वारंट जारी है। एक अभियुक्त अधिवक्ता के माध्यम से केस में पक्ष भी रख रहा है लेकिन उसकी गिरफ्तारी नहीं की गई। कोर्ट ने निदेशक आर्थिक अपराध शाखा व प्रदेश के डीजी आर्थिक अपराध को तलब किया था। कोर्ट ने डीजी की अगली सुनवाई पर हाजिरी माफ कर दी लेकिन, निदेशक को हाजिर होने का निर्देश दिया है।

राज्य सरकार की ओर से अपर महाधिवक्ता मनीष गोयल ने अनुपालन रिपोर्ट पेश की।कोर्ट ने पुलिस की क्राइम ब्रांच के रवैये पर नाराजगी जताई और कहा कि 2019 में एफआईआर दर्ज हुई है और सैकड़ों निवेशकों का करोड़ों हजम करने वाले अभियुक्तों की गिरफ्तारी नहीं की जा सकी। दो मुख्य आरोपियों राशिद नसीम व आसिफ नसीम में से केवल एक का ही पासपोर्ट निरस्त किया गया है।एफआईआर दर्ज होते ही पासपोर्ट निरस्त क्यों नहीं किया गया। यह समझ से परे है। कोर्ट ने कहा कि विदेश मंत्रालय नहीं पता लगा सका कि मुख्य आरोपी किस देश में हैं ताकि उन्हें वापस लाया जा सके। कोर्ट ने अभियुक्तों की गिरफ्तारी के लिए दो सप्ताह का समय दिया है। साथ ही कार्रवाई के लिए आदेश की प्रति विदेश मंत्रालय को भेजने का निर्देश दिया है।

CISF जवान का प्रदेश पुलिस भर्ती में 6 हफ्ते में मेडिकल टेस्ट लेने का निर्देश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सिंह भूमि झारखंड में तैनात केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल कांस्टेबल को प्रदेश की 2018 की पुलिस भर्ती में चयनित याची को 6 हफ्ते में मेडिकल टेस्ट करने का निर्देश दिया है। याची को 9 सितंबर 20 को मेडिकल जांच के लिए बुलाया गया था।एक दिन पहले उसके भाई को फोन पर सूचना दी गई।

कोविड 19 संक्रमण के चलते यातायात की कमी व दूर होने के कारण याची उपस्थित नहीं हो सका था। जिस पर उसने हाईकोर्ट की शरण ली। कोर्ट ने मेडिकल जांच रिपोर्ट के आधार पर नियमानुसार कार्रवाई करने का निर्देश दिया है।

यह आदेश न्यायमूर्ति एम सी त्रिपाठी ने कानपुर नगर के अश्वनी सविता की याचिका को निस्तारित करते हुए दिया है। याची का कहना था कि वह पुलिस कांस्टेबल भर्ती परीक्षा में हर स्तर पर सफल रहा। 8 सितंबर 20 को सूचना दी गई कि 9सितंबर को मेडिकल जांच के लिए पेश हो।सुरक्षा बल में सुदूर तैनाती व समय की कमी के कारण मेडिकल जांच में नहीं पहुंच सका।

इसलिए उसे एक मौका दिया जाय। कोर्ट ने कहा कि याची सुरक्षा बल में कांस्टेबल है और वह पुलिस कांस्टेबल भर्ती में चयनित किया गया है। यह अलग ढंग का मामला है। इसलिएअधिक मानवीय आधार पर विचार किया जाय।

आय से अधिक संपत्ति की शिकायत पर जांच शासनादेशों के अनुसार करें

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि सरकारी सेवकों के खिलाफ प्राप्त शिकायतों की जांच व उसके निस्तारण के लिए प्रदेश सरकार की ओर से जारी शासना देशों का कड़ाई से पालन किया जाय।

कोर्ट ने कहा कि मिली शिकायतों पर कार्रवाई करने से पूर्व शिकायतकर्ता से यह पुष्टि की जाय कि शिकायत पर उसी के हस्ताक्षर हैं और उससे समुचित साक्ष्य लेने के बाद ही कार्रवाई शुरू की जाय। हाईकोर्ट ने इसी के साथ आय से अधिक संपत्ति को लेकर जारी जाँच के मामले में इटावा में तैनात हेड कांस्टेबल महेश कुमार पाठक की याचिका को निस्तारित करते हुए एडीजी ( लोक शिकायत ) पुलिस मुख्यालय, महानिदेशक लखनऊ को दो माह में निर्णय लेने का निर्देश दिया है।

यह आदेश जस्टिस पंकज भाटिया ने दिया है। कोर्ट ने कहा कि शिकायतों की जांच के लिए सरकार द्वारा जारी शासना देश 9 मई 1997, 1 अगस्त 1997, 19 अप्रैल 2012 व 6 अगस्त 2016 पर विचार कर जाँच को निरस्त करने के सम्बन्ध में निर्णय लिया जाय।

आय से अधिक संपत्ति को लेकर याची के खिलाफ जांच डिप्टी एस पी आगरा, भ्रष्टाचार निवारण संगठन, अपराध अनुसंधान विभाग, आगरा द्वारा की जा रही है। इस जारी जाँच को याचिका दाखिल कर चुनौती दी गई थी।

याची के वरिष्ठ अधिवक्ता विजय गौतम का तर्क था कि हाईकोर्ट के कुमदेश कुमार शर्मा केस में दिए निर्णय के आधार पर राज्य सरकार ने शासनादेश जारी कर समूह क,ख,ग,घ के सरकारी कर्मचारियों के विरुद्ध प्राप्त शिकायतों के निस्तारण के लिए शासनादेशों के अनुसार ही कार्रवाई करने का निर्देश दिया है। अधिवक्ता का कहना था कि शासना देशों में दी गई प्रकिया का पालन किए वगैर याची के खिलाफ जांच जारी है, जो गलत व गैरकानूनी है।

सरकार ने शासनादेश 9 मई 1997 व 1 अगस्त 1997 जारी कर निर्देश दिया है कि शिकायतों के सम्बन्ध में कार्रवाई करने से पूर्व शिकायतकर्ता को पत्र भेज कर यह पुष्टि की जाय कि शिकायत पर उसी के हस्ताक्षर हैं और शिकायत पर उसका संतोष हो गया है कि शिकायत तथ्यों पर आधारित है। यही नहीं शासनादेश के मुताबिक शिकायतकर्ता से शपथ पत्र मुहैया कराने व शिकायत की पुष्टि हेतु साक्ष्य उपलब्ध कराए जाने के बाद जाँच की कार्रवाई आगे बढ़ाई जाये।

याची का कहना था कि वह 1989 मे नियुक्त हुआ। उसने दर्जनों एनकाउंटर किए और उसे अधिकारियों ने दर्जनों प्रशस्ति-पत्र भी दिया है। कहा गया था कि याची को वगैर शिकायत की कापी दिए उसके खिलाफ जांच की कार्रवाई शासनादेशों में विहित प्रक्रिया को दरकिनार कर की जा रही है। कोर्ट ने याची के मामले में नियमानुसार निर्णय लेने का अधिकारी को निर्देश दिया है।

गवर्नमेंट डिग्री कॉलेजों में सहायक प्रोफेसर के लिए स्नातक में 45 % से कम अंक वाले भी कर सकेंगे आवेदन

राजकीय डिग्री कॉलेजों में सहायक प्रोफेसर की नियुक्ति के लिए ऐसे अभ्यर्थी भी आवेदन कर सकेंगे जिनके स्नातक में 45 प्रतिशत से कम अंक हैं। कोर्ट ने इस संबंध में लोक सेवा आयोग की ओर से जारी विज्ञापन में उचित संशोधन करने का निर्देश दिया है।

विज्ञापन में यह शर्त थी कि आवेदन करने वाले अभ्यर्थी का स्नातक में न्यूनतम 45 % अंक होना चाहिए। जिसे हाईकोर्ट में चुनौती देकर कहा गया कि यूजीसी ने 2018 में ही यह अनिवार्यता समाप्त कर दी है। गोपाल सिंह व अन्य की याचिका पर न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा ने सुनवाई की।

इससे पूर्व कोर्ट ने लोक सेवा आयोग व राज्य सरकार से इस मामले में जानकारी मांगी थी। कोर्ट को बताया गया कि लोक सेवा आयोग ने 24 नवंबर 2020 को राजकीय डिग्री कॉलेजों में सहायक प्रोफेसर की भर्ती के लिए विज्ञापन निकाला। जिसमें शर्त है की आवेदन करने वाले अभ्यर्थी का स्नातक में न्यूनतम 45 % अंक होना चाहिए।

याची का कहना था कि यूजीसी ने अपने रेगुलेशन में संशोधन करते हुए 18 जुलाई 18 को स्नातक में 45 प्रतिशत अंक की अनिवार्यता समाप्त कर दी थी। अब कोई भी अभ्यर्थी जिसके पास स्नातक और परास्नातक की डिग्री है। नेट क्वालीफाई है सहायक प्रोफेसर के लिए आवेदन कर सकता है । अपर महाधिवक्ता नीरज त्रिपाठी ने कोर्ट को बताया कि यूजीसी के संशोधन को राज्य सरकार ने 28 जून 2019 को स्वीकार कर लिया है।

मगर लोक सेवा आयोग को इस बारे में समय से सूचना ना हो पाने के कारण गलत विज्ञापन जारी किया गया। आयोग जल्द ही खंडन प्रकाशित कर संशोधित विज्ञापन जारी करेगा ताकि सभी अभ्यर्थी आवेदन कर सकें। अपर महाधिवक्ता के इस आश्वासन के बाद कोर्ट ने याचिका निस्तारित कर दी।

अंतिम चयनित अभ्यर्थी से अधिक अंक पाने के बावजूद नियुक्ति न करने पर सचिव बेसिक शिक्षा परिषद तलब

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सहायक अध्यापक भर्ती में अंतिम चयनित अभ्यर्थी से अधिक अंक पाने के बावजूद नियुक्त न करने को गंभीरता से लेते हुए सचिव बेसिक शिक्षा परिषद को तलब किया है। साथ ही उन्हें यह स्पष्ट करने को कहा है कि चयनित अभ्यर्थी से अधिक अंक वाले याची को पद नहीं है, कहकर नियुक्त करने से इनकार कैसे किया जा सकता है।

यह आदेश न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव ने वी ए जेहरा की याचिका पर दिया है। याची मो अल्लिम-ए-उर्दू में स्नातक हैं। उसे सहायक अध्यापक भर्ती में 55.285 क्वालिटी प्वाइंट अंक प्राप्त हुए हैं। यह अंक अंतिम चयनित अभ्यर्थी से अधिक हैं।

याची को 15 अप्रैल 2014 को डिग्री के आधार पर नियुक्ति से इनकार कर दिया तो हाईकोर्ट में याचिका की। कोर्ट ने बेसिक शिक्षा अधिकारी अमरोहा को नए सिरे से आदेश करने का निर्देश दिया। इसके बाद यह कहते हुए याची की अर्जी खारिज कर दी गई कि उर्दू अध्यापक का पद नहीं है।

कोर्ट ने पद न होने के आधार पर नियुक्ति देने से इनकार को अवैध व‌ मनमाना पूर्ण करार दिया और सचिव बेसिक शिक्षा परिषद को तलब करते हुए कहा कि याची अपनी नियुक्ति के अधिकार के लिए पिछले सात साल से इधर से उधर दौड़ लगा रही है।

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