प्रयागराज मे पिंडदान कर पितरों से मांगा आशीर्वाद:पुरखों के श्राद्ध के लिए दूर-दूर से पहुंचे परिजन, संगम में किया स्नान, मुंडन के बाद श्राद्ध कर्म में हुए शामिल

प्रयागराज4 महीने पहले
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संगम तट पर सुबह से पितरों के आशीर्वाद एवं तर्पण के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ जुटी है। - Dainik Bhaskar
संगम तट पर सुबह से पितरों के आशीर्वाद एवं तर्पण के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ जुटी है।

पितृपक्ष पर आज भोर से ही पितरों के श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान के लिए संगम पर ​​​​​श्रद्धालुओं की भीड़ जुटने लगी है। प्रयागराज में पिण्डदान के लिए श्रद्धालुओं का दो दिन पहले ही अपने तीर्थ पुरोहितों के यहां आना शुरू हो गया था। कई प्रदेशों से श्रद्धालु प्रयागराज पहुंचे हैं।

डॉ. पंडित सत्यधर पाण्डेय ने बताया कि प्रयागराज में पिण्डदान का विशेष महत्व है, चूंकि प्रयागराज में 12 माधव हैं। कहा जाता है कि पिण्डदान की शुरुआत सबसे पहले प्रयागराज से की जाती है। इसके बाद काशी व गया में पिण्डदान की परंपरा है। आज से शुरू हुए पितृपक्ष पर संगम तट पर पितरों के आशीर्वाद के लिए जुटे श्रद्धालुओं ने सबसे पहले संगम स्नान किया। उसके बाद मुण्डन के साथ ही पितरों के पिण्डदान की प्रक्रिया शुरू हुई।

पितरों के आशीर्वाद के लिए जुटे श्रद्धालुओं ने सबसे पहले संगम स्नान किया। उसके बाद मुण्डन के साथ ही पितरों के पिण्डदान की प्रक्रिया शुरू हुई।
पितरों के आशीर्वाद के लिए जुटे श्रद्धालुओं ने सबसे पहले संगम स्नान किया। उसके बाद मुण्डन के साथ ही पितरों के पिण्डदान की प्रक्रिया शुरू हुई।

तीर्थ पुरोहित कराते हैं श्रद्धालुओं के पूरे इंतजाम

पण्डा समाज के पंडित यतींद्र त्रिपाठी ने बताया कि भोर से ही पितरों के निमित्त होने वाले कर्मकाण्ड के लिए श्रद्धालुओं का जुटना शुरू हो गया है। प्रयागराज में पण्डा समाज के 1484 घर हैं। जो अपने यहां आने वाले जजमानों का पूरा ख्याल रखते हैं। पं यतींद्र त्रिपाठी ने बताया कि उनके यहां दो दिन पहले से ही जजमान आ चुके थे।उनके रहने से लेकर खाने-पीने, नाई, आचार्य, नावों की व्यवस्था यहां तक कि तर्पण कार्य पूर्ण करने के बाद स्टेशन तक पहुंचाने तक की व्यवस्था करायी जाती है।

समूह में कराया पिण्डदान

संगम तट पर सुबह से पितरों के आशीर्वाद एवं तर्पण के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ जुटी है। पंडित देवेंद्र कुमार त्रिपाठी शास्त्री ने बताया कि श्रद्धालुओं की भीड़ ज्यादा होने की वजह से एक-एक का अलग-अलग पिण्डदान का कर्मकाण्ड कराना मुमकिन नहीं होता है, इसलिए सामूहिक रूप से कतार में बैठाकर पिण्डदान की परंपरा निभाई जाती है।

पंडित देवेंद्र कुमार त्रिपाठी शास्त्री ने बताया कि श्रद्धालुओं की भीड़ ज्यादा होने की वजह से एक-एक का अलग-अलग पिण्डदान का कर्मकाण्ड कराना मुमकिन नहीं होता है, इसलिए सामूहिक रूप से कतार में बैठाकर पिण्डदान की परंपरा निभाई जाती है।
पंडित देवेंद्र कुमार त्रिपाठी शास्त्री ने बताया कि श्रद्धालुओं की भीड़ ज्यादा होने की वजह से एक-एक का अलग-अलग पिण्डदान का कर्मकाण्ड कराना मुमकिन नहीं होता है, इसलिए सामूहिक रूप से कतार में बैठाकर पिण्डदान की परंपरा निभाई जाती है।

तीर्थ पुरोहितों ने कर रखा रेट फिक्स

पण्डा समाज अपने यहां आने वाले श्रद्धालुओं को किसी भी प्रकार की परेशानी न हो, इसके तहत सभी का रेट तीर्थ पुरोहितों की ओर से फिक्स कर रखा है। नाई की ओर से मुण्डन करने का मात्र 30 रुपये देना होता है। वहीं नाविकों को स्नान कराने के लिए प्रति व्यक्ति 50 से 80 रुपए तक निर्धारित किया गया है। स्टेशन तक पहुंचाने के लिए आटो वाले 100 रुपए लेते हैं।

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