तहसीलदार पर 85.49 करोड़ के भ्रष्टाचार का मामला:हाईकोर्ट ने कहा- FIR के लिए विभागीय जांच का पूरा होना जरूरी नहीं, दोनों कार्रवाई साथ-साथ चलेगी

प्रयागराज6 महीने पहले
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हाईकोर्ट की फाइल फोटो। - Dainik Bhaskar
हाईकोर्ट की फाइल फोटो।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बुधवार को एक अहम फैसला सुनाया। कहा- भ्रष्टाचार के मामले में FIR दर्ज करने के लिए विभागीय जांच का पूरी होना जरूरी नहीं है। बिना विभागीय जांच पूरी हुए भी रिपोर्ट लिखी जा सकती है। हाईकोर्ट ने यह आदेश यमुना एक्सप्रेस वे औद्योगिक विकास प्राधिकरण में तैनात रहे अलीगढ़ जनपद के खैर तहसीलदार रणवीर सिंह पर लगे भ्रष्टाचार मामले की सुनवाई के दौरान दिया।

तहसीलदार पर 85.49 करोड़ रुपए के गबन का आरोप है। जस्टिस एमएन भंडारी और जस्टिस शमीम अहमद की खंडपीठ ने अभियोग चलाने को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दिया है। अब तहसीलदार पर भ्रष्टाचार का केस चलेगा।

बिना विभागीय जांच के FIR को किया था चैलेंज
हाईकोर्ट ने कहा है कि शासनादेश कानूनी उपबंध को आच्छादित नहीं कर सकता। याची का कहना था कि कोर्ट ने पुलिस चार्जशीट पर संज्ञान लेने के बाद अभियोग चलाने की अनुमति देने में विवेकाधिकार का उपयोग नहीं किया। बिना विभागीय जांच पूरी किये एफआईआर दर्ज कर लिया गया, जोकि उचित नहीं है। कोर्ट ने दोनों तर्कों को निराधार व कानून के विपरीत मानते हुए हस्तक्षेप करने से साफ इंकार कर दिया।

कोर्ट ने कहा- विभागीय जांच और आपराधिक कार्रवाई दोनों साथ चल सकती है
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि दंड प्रक्रिया संहिता और भ्रष्टाचार निरोधक कानून में यह बात कहीं नहीं लिखी है कि विभागीय जांच करने के बाद ही एफआईआर दर्ज की जा सकती है। अगर अपराध हुआ है तो कार्यवाही होगी। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश का हवाला देते हुए कहा कि विभागीय जांच और आपराधिक कार्रवाई दोनों साथ-साथ चल सकती हैं।

यह है पूरा मामला
यमुना एक्सप्रेसवे इंडिस्ट्रयल डेवलेपमेंट अथॉरिटी का काम चल रहा था। इसमें अलीगढ़ जनपद के खैर, तहसीलदार के विरूद्ध 85.49 करोड़ रुपए के भ्रष्टाचार में संलिप्त होने का आरोप लगा था। विभागीय जांच के साथ ही साथ पुलिस ने चार जून 2018 को घोटाले की शिकायत पर याचिकाकर्ता और अन्य अधिकारियों के विरुद्ध रिपोर्ट लिखी। विभागीय जांच भी शुरू हुई। फिर प्राथमिकी दर्ज कर पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की। बिना सरकार से अभियोग चलाने की अनुमति लिए मुकदमे को सीजेएम ने संज्ञान ले लिया। उसे हाई कोर्ट ने विधि विरुद्ध मानते हुए रद्द कर दिया। तत्पश्चात सरकार से अभियोग चलाने की अनुमति ली गई और कोर्ट ने आरोप निर्मित किये।

यह था याची का तर्क
याचिकाकर्ता का कहना था कि सरकार ने 28 जनवरी 2020 को अनुमति प्रदान करते हुए एफआईआर का जिक्र नहीं किया। एफआईआर में याची का नाम भी नहीं था बाद में पुलिस नेजब चार्जशीट दाखिल की तो उसका नाम भी दर्ज था। इससे लगता है कि कोर्ट द्वारा विवेक का इस्तेमाल नहीं किया गया। पहले विभागीय जांच में दोषी मिलते फिर एफआईआर दर्ज की जानी चाहिए थी। शासनादेश है कि विभागीय जांच के बाद कार्रवाई की जाए, जिसका उल्लंघन किया गया है।

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