इलाहाबाद हाईकोर्ट की 4 बड़ी खबरें:SIT ने कोर्ट में कहा-लखीमपुर के तिकुनिया कांड में कई प्रत्यक्षदर्शियों के बयान लिए जाने बाकी

इलाहाबाद7 महीने पहले
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इलाहाबाद हाईकोर्ट - फाइल फोटो - Dainik Bhaskar
इलाहाबाद हाईकोर्ट - फाइल फोटो

SIT की ओर से हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ के समक्ष जानकारी दी गई है, कि लखीमपुर खीरी के तिकुनिया कांड मामले में कई प्रत्यक्षदर्शियों के बयान दर्ज किए जाने अभी बाकी हैं। लिहाजा उसे 2 सप्ताह का समय गृह राज्य मंत्री के पुत्र आशीष मिश्रा उर्फ मोनू की जमानत याचिका पर जवाब दाखिल करने के लिए दिया जाए, कोर्ट ने इस अनुरोध को स्वीकार कर लिया है व अगली सुनवाई के लिए मामले को 6 जनवरी को सूचीबद्ध करने का आदेश दिया है।

यह आदेश जस्टिस करुणेश सिंह पवार की एकल पीठ ने आशीष मिश्रा उर्फ मोनू की जमानत याचिका पर पारित किया। शुक्रवार को मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अपर महाधिवक्ता वीके शाही ने न्यायालय को बताया कि सर्वोच्च न्यायालय के 17 नवंबर 2021 के आदेश के अनुपालन में इस मामले में एसआईटी का पुर्नगठन किया गया है।

साथ ही एसआईटी को जांच त्वरित तरीके से पूरी कर के चार्जशीट दाखिल करनी है। अपर महाधिवक्ता ने न्यायालय को बताया कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के अनुसार जांच चल रही है लेकिन इस मामले में बड़ी मात्रा में प्रत्यक्षदर्शी हैं जिनका बयान लिया जाना है।

शिया वक्फ बोर्ड के पूर्व चेयरमैन वसीम के खिलाफ याचिका दाखिल

शिया वक्फ बोर्ड के पूर्व चेयरमैन वसीम रिजवी के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की गई है। याचिका में कहा गया है कि किसी भी प्रकार से राजनीति से प्रेरित होकर पैगंबर मोहम्मद व पवित्र कुरान को उसमें घसीटा जाना उचित नहीं है। याचिकाकर्ता युसूफ उमर अंसारी की अधिवक्ता सहर नकवी का कहना है कि वसीम रिजवी का लंबा अपराधिक इतिहास है। वह पैगंबर मोहम्मद व पवित्र कुरान पर विवादित टिप्पणी करके दुनिया भर में माहौल बिगाड़ने का प्रयास कर रहे हैं ।कुरान इस्लाम की धार्मिक पुस्तक है जिसमें दुनिया भर के मुस्लिमों की आस्था है ।इसमें किसी प्रकार की संशोधन की बात करना अनुचित है। वह गलत इतिहास प्रस्तुत कर रहे हैं। याचिका में मांग की गई है कि वसीम रिजवी के खिलाफ रासुका के तहत कार्रवाई की जाए। उनके द्वारा की जा रही सोशल मीडिया पर तमाम इस्लाम विरोधी टिप्पणियों को हटाया जाए।

प्रत्यावेदन तय करने में लगा दिया 18 साल, कोर्ट ने कहा- दोषी अधिकारी से वसूली जाए हर्जाना राशि

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रदेश के मुख्य सचिव को निर्देश दिया है कि निदेशक (प्रशासन) चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के खिलाफ कार्रवाई कर महानिबंधक के मार्फत हाईकोर्ट को कार्रवाई की रिपोर्ट से सूचित करें। यही नहीं कोर्ट ने दो लाख रुपए हर्जाना भी लगाया है। इसी के साथ शंकरगढ़ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र प्रयागराज में लिपिक देशबन्धु तेज नारायण मिश्र की याचिका स्वीकार कर ली है।कोर्ट ने याची लिपिक की बरखास्तगी रद्द कर दी है तथा दो हफ्ते में बहाल करने का आदेश पारित करने का आदेश दिया है।

कोर्ट ने राज्य सरकार को मामले की जांच कर कोर्ट के आदेश का पालन न करने व प्रत्यावेदन तय करने में 18 साल लगाने वाले दोषी अधिकारी से हर्जाना राशि वसूल करने का भी निर्देश दिया है। कोर्ट ने चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के निदेशक (प्रशासन)के रवैए को अफसोस जनक करार दिया है। जिसने कोर्ट के आदेश की उपेक्षा की और पालन न करने के लिए दूसरे आदेश का सहारा लिया। जिससे याची का कोई सरोकार ही नहीं है।

कोर्ट ने कहा कि एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी से न्यायिक आदेश की उपेक्षा कर विपरीत आदेश पारित करने की उम्मीद नहीं की जा सकती। यह आदेश न्यायमूर्ति आलोक माथुर ने देशबंधु तेज नारायण मिश्र की याचिका पर दिया है।

याची का कहना था कि उसके पिता प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र नौरगांव जिला बलिया में स्वास्थ्य सहायक थे। सेवाकाल में 10 नवंबर 95 को उनकी मौत हो गई। निदेशक ने 1996 मे आश्रित कोटे में याची की नियुक्ति की। 21 नवंबर 96 को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र शंकरगढ़ में कार्यभार ग्रहण किया। 23 मई 98 तक वेतन मिला।सी एम ओ प्रयागराज ने यह कहते हुए बर्खास्त कर दिया कि नियुक्ति पत्र निदेशालय में नहीं है। आदेश देने के पहले न तो जांच की और न ही सुनवाई की गई।

कोर्ट ने बर्खास्तगी आदेश रद्द कर दिया और बहाल करने का आदेश दिया।यह भी छूट दी कि याची के प्रत्यावेदन को तय किया जाय। जिसे 18 साल तक तय नहीं किया गया और न ही याची को कार्यभार सौंपा गया। इतने साल बाद प्रत्यावेदन निरस्त कर दिया गया। ऐसे ही एक दूसरे मामले में भी कोर्ट ने बर्खास्तगी रद्द कर बहाल करने का निर्देश दिया था। कोर्ट ने निदेशक को व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल कर पूछा कि लापरवाही की जवाबदेही तय कर क्यों न अधिकारी की चरित्र पंजिका में प्रविष्टि की जाय।

निदेशक प्रशासन ने हलफनामा दाखिल कर बताया कि कोर्ट का आदेश 2001मे पारित हुआ और 2019 में प्रत्यावेदन तय किया गया।देरी को कुछ देरी करार दिया गया।एक अन्य याचिका में पारित 2017 के आदेश का सहारा लिया गया। जबकि कोर्ट ने बर्खास्तगी रद्द कर दी थी और याची को प्रत्यावेदन देने की छूट देते हुए सरकार को निर्णय लेने को कहा था।

बहाल न करने का कोई कारण नहीं बताया। राज्य के वरिष्ठ अधिकारी ने कोर्ट आदेश की मनमानी व्याख्या की। कहा नियुक्ति आदेश निदेशालय में उपलब्ध नहीं है। पता लगाने का कोई प्रयास नहीं किया गया और न याची को सुना गया। 24 अक्टूबर 19 को नियुक्ति निरस्त कर दी गई। कोर्ट ने कहा अधिकारियों ने दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से कार्य किया। राज्य से ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती। कानून के शासन का उल्लघंन है।

ऊष्मा व आशुतोष संयुक्त सचिव, अरुण कोषाध्यक्ष

ऊष्मा मिश्रा ने हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के संयुक्त सचिव महिला व आशुतोष कुमार त्रिपाठी ने संयुक्त सचिव प्रेस और अरुण कुमार सिंह ने कोषाध्यक्ष पद पर जीत हासिल की है। उधर उपाध्यक्ष के पांच पदों के लिए नीरज त्रिपाठी, सुरेंद्र नाथ मिश्र, धर्मेंद्र सिंह, सत्यम पांडेय व श्यामाचरण त्रिपाठी मुनचुन अन्य प्रत्याशियों से आगे चल रहे हैं।

शुक्रवार को संयुक्त सचिव महिला, संयुक्त सचिव प्रेस व कोषाध्यक्ष पद की मतगणना पूरी हुई। संयुक्त सचिव महिला पद पर ऊष्मा मिश्रा ने अपनी निकटतम प्रतिद्वंद्वी रितिका मौर्या को 791 वोटों के अंतर से शिकस्त दी। ऊष्मा मिश्रा को 2991 व रितिका मौर्या को 2200 वोट मिले। आंचल ओझा 2104 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहीं। संयुक्त सचिव प्रेस बने आशुतोष त्रिपाठी ने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी कपिलदेव यादव पर 538 वोटों से विजय पाई।

आशुतोष को 1839 व कपिलदेव को 1301 वोट मिले। अमरेंदु सिंह ने 1034 वोटों के साथ तीसरा स्थान प्राप्त किया। कोषाध्यक्ष पद पर विजयी अरुण कुमार सिंह ने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी आशीष मिश्र को 75 वोटों से पीछे छोड़ा। अरुण ने 923 व आशीष ने 848 वोट पाए। रणविजय सिंह 799 वोट लेकर तीसरे स्थान पर रहे। उपाध्यक्ष के पांच पदों के लिए शुक्रवार शाम तक हुई 2100 वोटों की गिनती तक नीरज त्रिपाठी 440, सुरेंद्र नाथ मिश्र 397, धर्मेंद्र सिंह 387, सत्यम पांडेय 375 व श्यामाचरण त्रिपाठी मुनचुन 340 वोट पाकर पहले पांच स्थान पर थे। कमलेश रतन यादव 308 वोटों के साथ छठे स्थान पर चल रहे थे।

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