प्रयागराज में दिखा दुर्लभ प्रजाति का उल्लू:5 साल से रेड लिस्ट में शामिल है यह पक्षी, विलुप्त होने की कगार पर मोटल्ड वुड आउल

प्रयागराज3 महीने पहले
  • कॉपी लिंक
हरिश्चंद्र रिसर्च इंस्टीट्यूट में दुर्लभ प्रजाति का मोटल्ड वुड आउल देखा गया। - Dainik Bhaskar
हरिश्चंद्र रिसर्च इंस्टीट्यूट में दुर्लभ प्रजाति का मोटल्ड वुड आउल देखा गया।

प्रयागराज के झूंसी क्षेत्र में विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गए मोटल्ड वुड उल्लू को देखा गया है। शहर के पक्षी प्रेमी डॉक्टर अर्पित बंसल ने अपने कैमरे में इसे कैद किया है। इस दुर्लभ पक्षी को 2016 से इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (IUCN) की रेड लिस्ट में विलुप्त हो रही प्रजाति के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।

हरिश्चंद्र रिसर्च इंस्टीट्यूट में पीली रंग की दुर्लभ पक्षी।
हरिश्चंद्र रिसर्च इंस्टीट्यूट में पीली रंग की दुर्लभ पक्षी।

HRI झूंसी में देखा गया मोटल्ड वुड उल्लू

प्रयागराज के झूंसी में गंगा किनारे प्रकृति की गोद में हरिश्चंद्र रिसर्च इंस्टीट्यूट स्थित है। यहां काफी हरियाली और वातावरण काफी शांत रहता है। विभिन्न प्रकार के पक्षी यहां देखे जाते हैं। शहर के उत्साही वन्यजीव फोटोग्राफर और जीवन ज्योति अस्पताल के निदेशक लेप्रोस्कोपिक सर्जन डॉ. अर्पित बंसल ने बताया कि हाल ही में वह झूंसी में एचआरआई परिसर गए थे। सुबह का समय था उन्होंने जब धब्बेदार मोटल्ड वुड आउल को देखा। उल्लू आम तौर पर निशाचर होते हैं, इसलिए दिन के समय मोटल्ड वुड आउल को कैमरे में कैद करना काफी सुकून भरा रहा। यह उल्लू उस समय एक शाखा पर बैठा था और उससे कौवे व अन्य पक्षी परेशान कर रहे थे। अचानक वह शिकार के लिए जमीन पर आ गिरा। उसी समय मैंने उसे अपने कैमरे में कैद कर लिया। मैं काफी दिन से इस प्रजाति के उल्लू को ढूंढ रहा था और आखिरकार उस दिन मेरा सपना पूरा हुआ।

हरिश्चंद्र रिसर्च इंस्टीट्यूट में पेड़ पर बैठे मोर।
हरिश्चंद्र रिसर्च इंस्टीट्यूट में पेड़ पर बैठे मोर।

इसका स्पॉटिंग बहुत दुर्लभ है

डॉ. बंसल ने बताया कि इसका स्पॉटिंग बहुत दुर्लभ है, इसलिए हमने इसका विवरण ebird.org पर भी अपलोड कर दिया है। यह पक्षियों के बारे में जानने का एक अंतरराष्ट्रीय ऑनलाइन डेटाबेस है जो वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और शौकिया प्रकृतिवादियों को पक्षी के बारे में विवरण प्रदान करता है। इससे पक्षी प्रेमियों को इस उल्लू के संभावित ठिकाने के बारे में पता चल सकेगा। इसके बाद अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं इसे संरक्षित करने का प्रयास करेंगी।

अब तक खोजे 887 प्रजातियों के पक्षी

डॉ. बंसल ने बताया कि भारत में पक्षियों की लगभग 1,349 प्रजातियां हैं। इनमें से उनके कैमरे ने अब तक 887 प्रजातियों को पहले ही क्लिक कर लिया है। धब्बेदार मोटल्ड वुड आउल के साथ ही डॉ बंसल शहर के अंदर भी उल्लू की पांच विलुप्तप्राय प्रजातियों की तस्वीरें कैद कर चुके हैं। इनमें स्पॉटेड उल्लू, जंगल उल्लू, बार्न उल्लू और इंडियन स्कोप्स उल्लू शामिल हैं। ये सभी घटते वन के कारण खतरे में हैं।

गंगा किनारे स्थित हरिश्चंद्र रिसर्च इंस्टीट्यूट का मनोरम दृश्य।
गंगा किनारे स्थित हरिश्चंद्र रिसर्च इंस्टीट्यूट का मनोरम दृश्य।

उल्लू की 36 प्रजातियों में से 31 को कर चुके हैं क्लिक

डॉ. अर्पित ने इस क्लिक के साथ भारत में पाए जाने वाले उल्लुओं की 36 प्रजातियों में से 31 की तस्वीरें खींचने में सफलता हासिल की है। डॉ. अर्पित पिछले 10 सालों से वन्यजीव और पक्षी फोटोग्राफी कर रहे हैं। उनका कहना है कि अब समय आ गया है कि हम यहां प्रयागराज और देश के अन्य हिस्सों में भी उल्लुओं के बारे में जागरूकता फैलाएं। ताकि लोग जागरूक हों और इस प्रजाति को बचाने में आगे आएं। इससे सुंदर और उपयोगी पक्षियों की रक्षा हो सकेगी। उल्लू को मानव का मित्र पक्षी माना जाता है। यह चूहों को खाता है और चूहे फसलों को काफी नुकसान पहुंचाते हैं।

फोटोग्राफी के शौकीन व पक्षी प्रेमी सर्जन डॉ. अर्पित बंसल।
फोटोग्राफी के शौकीन व पक्षी प्रेमी सर्जन डॉ. अर्पित बंसल।

प्रयागराज के जिला वन अधिकारी रमेश चंद्र ने बताया कि पक्षी प्रेमियों और संरक्षणवादियों द्वारा प्रयागराज में पिछले कुछ वर्षों में 250 से अधिक पक्षी प्रजातियों को देखा गया है। हम शहर और उसके आसपास उल्लू की कुछ प्रजातियों जैसे जंगल उल्लू, चित्तीदार उल्लू, कॉलर वाले स्कॉप्स उल्लू, छोटे कान वाले उल्लू और रॉक ईगल उल्लू की उपस्थिति से अवगत हैं। लुप्तप्राय मोटल्ड वुड आउल का दिखना अच्छी खबर है। इसे किसी भी नुकसान से बचाने के लिए सभी प्रयास किए जाएंगे।

संरक्षित प्रजाति है उल्लू

भारतीय वन्य जीव अधिनियम, 1972 की अनुसूची-एक के तहत उल्लू को संरक्षित प्रजाति का पक्षी घोषित किया गया है। ये लुप्तप्राय जीवों की श्रेणी में दर्ज है। इनके शिकार या तस्करी करने पर कम से कम 3 साल या उससे अधिक की सजा का प्रावधान है। इन्हें पालना और शिकार करना दोनों पर प्रतिबंध है। पूरी दुनिया में उल्लू की लगभग 225 प्रजातियां हैं।

कहीं शुभ तो कहीं अशुभ माना जाता है उल्लू

कई संस्कृतियों में उल्लू को अशुभ माना जाता है, लेकिन साथ ही संपन्नता और बुद्धि का प्रतीक भी है। यूनानी मान्यताओं में उल्लू का संबंध कला और कौशल की देवी एथेना से माना गया है। जापान में भी इसे देवताओं का संदेशवाहक समझा जाता है। धन की देवी लक्ष्मी उल्लू पर विराजती हैं। इससे आयुर्वेदिक इलाज भी होता है। इसके चोंच और नाखून को जलाकर तेल तैयार होता है जिससे गठिया ठीक होता है। इसके मांस का प्रयोग यौनवर्धक दवाओं में किया जाता है। यही कारण है कि यह शिकारियों के निशाने पर रहता है और दिवाली पर इसकी बड़े पैमाने पर तस्करी होती है। दिवाली पर इसकी बली भी दिए जाने की कहीं कहीं कुप्रथा है।

खबरें और भी हैं...