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सोनिया का गढ़ खत्म करना चाहती है भाजपा:अमेठी को जीतने वाली स्मृति ईरानी की कराई रायबरेली में एंट्री, सोनिया के करीबी 3 लोगों को पहले ही तोड़ चुकी है भाजपा

रायबरेली10 महीने पहले
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दिशा कमेटी की अध्यक्ष बनकर स्मृति ईरानी ने सोनिया के गढ़ में एंट्री कर ली है। - Dainik Bhaskar
दिशा कमेटी की अध्यक्ष बनकर स्मृति ईरानी ने सोनिया के गढ़ में एंट्री कर ली है।

राहुल गांधी के गढ़ अमेठी के बाद अब भाजपा सोनिया के रायबरेली को अपने कब्जे में करना चाहती है। इसीलिए सांसद सोनिया गांधी को जिला विकास एवं समन्वय अनुश्रवण समिति (दिशा) के अध्यक्ष पद से हटा दिया गया है। अब इसकी जिम्मेदारी अमेठी सांसद और केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी को दे दी गई है। वहीं, सोनिया गांधी को कमिटी का को-चेयरपर्सन बनाया गया है। समिति के अध्यक्ष पद से हटाने का कारण बताया गया कि वह पिछले 38 महीनों से मीटिंग में शामिल नहीं हुई हैं। बड़ा सवाल यह है कि आखिर यह जिम्मेदारी स्मृति ईरानी को ही क्यों दी गई है।

इन 5 उदाहरणों से समझिए कैसे ढह रहा है सोनिया का किला

दिनेश प्रताप सिंह
2019 आम चुनाव से ऐन पहले गांधी परिवार के करीबी और कांग्रेस एमएलसी दिनेश प्रताप सिंह ने बीजेपी ज्वाइन कर ली थी। उन्होंने सोनिया के खिलाफ चुनाव लड़ा था। हार मिली थी।

राकेश सिंह
राकेश सिंह दिनेश के भाई हैं। हरचंदपुर से कांग्रेस के विधायक हैं जरूर, पर बीजेपी से नजदीकियां किसी से छुपी नहीं हैं।

अदिति सिंह
रायबरेली सदर से कांग्रेस विधायक अदिति सिंह भी बगावत पर उतारू हैं। समय-समय पर यह बीजेपी का साथ देती आई हैं। पार्टी की ओर से इन्हें कारण बताओ नोटिस भी जारी हो चुका है। हालांकि, अदिति अभी भी कांग्रेस में बनी हुई है।

जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव
अभी हाल ही में हुए जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव में भी रायबरेली में कांग्रेस को भाजपा ने पटखनी दी थी। यह तब हुआ जब भाजपा के जिला पंचायत सदस्यों की संख्या दहाई भी नहीं पहुंच पाई थी। रायबरेली में 52 जिला पंचायत सदस्य हैं। इसमें 14 कांग्रेस और 14 सपा के सदस्य थे। जबकि निर्दलीय 16 और भाजपा के सिर्फ 8 सदस्य जीत कर आए थे। सपा कांग्रेस का गठबंधन हो गया। समाजवादी पार्टी ने रायबरेली में अपना जिला पंचायत अध्यक्ष का कैंडिडेट न उतारकर कांग्रेस के कैंडिडेट को सपोर्ट कर दिया था। इसके बावजूद वहां भाजपा का जिला पंचायत अध्यक्ष चुना गया।

ब्लॉक प्रमुख चुनाव
रायबरेली में 18 ब्लॉक हैं। ब्लॉक प्रमुख चुनाव में भाजपा के 11 कैंडिडेट जीते। जिसमें 5 निर्विरोध थे, जबकि सपा के खाते में 2 सीट और 5 निर्दलियों के खाते में गई है, जबकि कांग्रेस ने एक भी सीट नहीं जीती है।

विधानसभा चुनावों से समझिए कैसे अपने गढ़ में कमजोर हो रही है कांग्रेस

2007 का चुनाव
परिसीमन से पहले 7 विधानसभा सीट रायबरेली में थी। जिसमे कांग्रेस ने अच्छा प्रदर्शन करते हुए 5 सीटों पर कब्जा किया था। जबकि एक पर सपा और एक सीट पर निर्दलीय कैंडिडेट ने जीत दर्ज की थी।

2012 का चुनाव
2012 विधानसभा चुनाव से रायबरेली में कांग्रेस कमजोर हुई है। परिसीमन के बाद जिले में 6 विधानसभा सीट ही बची, जिसमें 5 सपा ने एक पीस पार्टी ने सीट जीती थी। कांग्रेस विधानसभा चुनावों से गायब हो चुकी है।

2017 का चुनाव
2017 चुनावों में भाजपा की आंधी के बाद भी 6 सीटों में 2 सीटें कांग्रेस के पास जबकि 3 भाजपा और 1 पर सपा ने जीत दर्ज कर रखी है। हालांकि, यह जगजाहिर है कि दोनों कांग्रेस विधायकों का झुकाव भाजपा की तरफ ही है।

सोनिया मजबूत, पर अपनों ने किया कमजोर

  • रायबरेली सीट से साल 2004 से सोनिया गांधी निरंतर चुनाव लड़ रही हैं।
  • रायबरेली लोकसभा सीट पर शुरुआत उन्होंने 58।75% वोटों से की। 2006 के इलेक्शन में उनके वोटों का आंकड़ा उछाल मारकर 80।49% तक गया।
  • 2009 आया तो उनके वोटों में -8।36% कटौती हुई, जबकि हाशिये पर रही बीजेपी के वोट बैंक में +0।49% की मामूली बढ़ोतरी। सोनिया को 72।23% उन्हें वोट मिले।
  • वर्ष 2014 में एक बार फिर 8।43% का नुकसान हुआ। इस बार सोनिया का ग्राफ गिर कर 63।80% पर आ ठहरा, जबकि 2009 में मामूली बढ़त वाली बीजेपी +17।23% वोट पाकर उभरी जो सोनिया के लिए संकेत था, जिसे कांग्रेसियों ने गंभीरता से नहीं लिया।
  • बीजेपी ने 2019 से पहले कांग्रेस में सेंधमारी की, कांग्रेस के वफादार सिपाही एमएलसी दिनेश प्रताप की अप्रैल 2018 में पार्टी में इंट्री कराई और फिर 2019 में दिनेश को भारी विरोध के बाद बीजेपी का चेहरा बना दिया। दिनेश को हार मिली। सोनिया गांधी को 55।80% वोट मिले। दिनेश प्रताप सिंह को 38।36% वोट हासिल हुए।

क्या है दिशा कमेटी
अंतर विभागीय समन्वय के माध्यम से विभिन्न केंद्रीय योजनाओं के कार्यान्वयन पर निगरानी रखने के लिए साल 2016 में दिशा कमिटी की परिकल्पना की गई थी।

क्या कहते हैं नियम

  • ग्रामीण विकास मंत्रालय की गाइडलाइन के लिए अनुसार जिले की संसदीय सीट से मौजूदा सांसद को ही कमिटी का चेयरमैन बनाया जाता है।
  • अगर जिले से एक से अधिक सांसद चुने जाते हैं तो वरिष्ठ सांसद को ही चेयरपर्सन बनाना चाहिए।
  • इस तरह से भी देखें तो सोनिया गांधी 2004 से रायबरेली का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। वह सीनियर हैं, जबकि स्मृति ईरानी 2019 में ही पहली बार लोकसभा सांसद चुनी गई हैं।
  • स्मृति ईरानी पहले से ही अमेठी की दिशा कमेटी की अध्यक्ष हैं। वो एक साथ दो जिले देखेंगी। नियमानुसार यह गलत है।
  • ग्रामीण विकास मंत्रालय की वेबसाइट पर अभी भी रायबरेली की दिशा कमेटी में सोनिया गांधी का नाम सामने आ रहा है जबकि राहुल गांधी का नाम को- चेयरपर्सन की जगह लिखा हुआ है। वेबसाइट को अभी अपडेट नहीं किया गया है।

स्मृति को दो जिलों की कमान कैसे?
केंद्रीय मंत्री और बीजेपी सांसद स्मृति ईरानी अमेठी में इस कमिटी की अध्यक्ष हैं। ऐसे में सोनिया के जिले का दिशा का पद भी इन्हें मिलना सवाल खड़े कर रहा है। साथ ही इस पर सवाल उठ रहे हैं सोनिया का जिला ही क्यों? इस पर रायबरेली के डीएम वैभव श्रीवास्तव ने बताया कि रायबरेली जिले का सलोन ब्लॉक अमेठी के अंतर्गत आता है, इसलिए ईरानी को रायबरेली में दिशा का चेयरपर्सन नियुक्त किया गया। एक ब्लॉक का यह तर्क किसी के गले नहीं उतर रहा।

एक सांसद को दो जिले देना राजनीति से प्रेरित

जिले का कोई भी अधिकारी इस बात पर बोलना नहीं चाह रहा है कि एक सांसद के पास दो जिलों की जिम्मेदारी हो सकती है या नहीं, लेकिन जानकारों का कहना है कि कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी के लखनऊ दौरे से ठीक पहले इस बदलाव के मायने हैं। अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले यह बीजेपी की कांग्रेस के गढ़ में एंट्री करना है। बीजेपी समझ रही है कि रायबरेली में सोनिया का साथ उनके अपने धीरे-धीरे छोड़ रहे हैं। इसलिए पड़ोसी जिले की सांसद और अपनी अच्छी पकड़ बना चुकीं स्मृति ईरानी की एंट्री करा दी।