रवा चाहिए ना सिफा चाहिए...मैं मरीज ए मोहब्बत...:सामूहिक दुआ के साथ उर्स का समापन हुआ

सहारनपुर4 महीने पहले
उर्स में अजमेर शरीफ से आई चादर को लेकर जुलूस निकालती अकीदतमंद।

सहारनपुर के सरसावा में दरगाह जमालिया का 155वां उर्स सामूहिक दुआ के साथ समाप्त हो गया। राजस्थान के जयपुर से आए मशहूर कव्वाल गौरव कुमार ने अपनी हाजिरी पेश करते हुए कव्वाली, 'तू कुंजा मन कुंजा, मेरा घर खाक पर और तेरी रह गुजर' सुनाकर महफिल में चार चांद लगा दिए।

कव्वालों ने पेश किये कलाम..

उर्स में कव्वाली गाते जयपुर से आए कव्वाल गौरव कुमार।
उर्स में कव्वाली गाते जयपुर से आए कव्वाल गौरव कुमार।

नकुड़ रोड स्थित आमों के बाद में सफेद संगमरमर के पत्थरों से बनी दरगाह के हाजी सज्जादनशीं विकारुर्रहमान, नया नायाब गद्दी नशीन सैफुर रहमान जमाली, हम्माद जमाली, मुजिदीद जमाली सहित अन्य सम्मानित प्रबुद्ध लोगों की उपस्थिति में महफिल का आयोजन किया गया।

कव्वाल खालिक हुसैन ने दरगाह की शान में अपनी कव्वाली पढ़ी, 'ना रवा चाहिए ना सिफा चाहिए, में मरीज ए मोहब्बत हूं मुझको तो बस इक नजरिया हबीबा खुदा चाहिए' सुनाकर खूब दाद बटोरी। कव्वाल नासिर जाहिद ने 'रंग पड़ा रंग है मेरे महबूब के घर रंग है।' कस्बा अंबेहटा के कव्वाल जाहिद एंड पार्टी, गंगोह के नसीर आदि कव्वालों ने दरगाह की शान में एक से बढ़कर एक कलाम पेश किये।

दरगाह पर चादर चढ़ाकर मांगते हैं मन्नत

दरगाह जमालिया के उर्स में कव्वाली पेश करते कव्वाल।
दरगाह जमालिया के उर्स में कव्वाली पेश करते कव्वाल।

हिंदू-मुस्लिम भाईचारे के प्रतीक चार वलियों की दरगाह जमालिया ऐतिहासिक ही नहीं बल्कि आध्यात्मिक दृष्टि से स्वयं में इतिहास संजोए हैं। दरगाह जमालिया पिछले सैकड़ों वर्षो से आज तक अकीदतमंदो की अकीदत की श्रद्धा व आस्था का केंद्र बनी है। यहां लगने वाले सालाना उर्स में विभिन्न राज्यों से हजारों मुरीद पहुंचते हैं और दरगाह पर चादर चढ़ा कर मनौती मांगते और जियारत करते हैं।

संगमरमर के पत्थरों से बनी दरगाह जमालिया के गद्दी नशीन हाजी विकारू रहमान चिश्ती निजामी जमाली के पूर्वज हांसी हिसार के चार कुतुब कहलाते हैं। इन्हीं चार कुतुबो की पांचवीं पीढ़ी में हजरत हबीबुर्रहमान जमाली सरसावा आकर बस गए थे। उनके बाद उनके बेटे हजरत खलीलुर रहमान जमाली गद्दी नशीन हुए जो अपनी चिल्लाकसी के कारण जल्दी ही मशहूर हो गए।

तीन दिन चला दरगाह में उर्स

उर्स में अन्य राज्यों से आए लोग।
उर्स में अन्य राज्यों से आए लोग।

दरगाह जमालिया के नायाब सहजादा नसीन सैफुररहमान जमाली ने बताया कि दरगाह में तीन दिवसीय उर्स 23 सितंबर से शुरू हुआ था। जिसका 25 सितंबर को समापन हो गया है। उर्स में कुरान-ए-पाक की नात ख़्वानी, रूहानी मजलिसों के अतिरिक्त कव्वालियां हुई। उर्स के अंतिम दिन जुलूस निकालकर दरगाह पर पवित्र चादर चढ़ाई गई। प्रसाद बांटा गया।

1314 हिजरी में पड़ा था दरगाह जमालिया का नाम

कव्वाली सुनते लोग।
कव्वाली सुनते लोग।

1314 हिजरी में खलीलुर रहमान जमाली ने अपने पिता की मजार बनाकर उसे दरगाह जमालिया का नाम दिया। हजरत खलीलुल्लाह मान उर्दू व फारसी के विद्वान थे। उन्होंने आइना हुकुमनामा तथा दीवान-ए-खलील नामक पुस्तकें भी लिखी।

इनकी मृत्यु के बाद उनके बेटे हजरत वलीलु रहमान जमाली दरगाह के गद्दी नशीन हुए। इन्होंने भी रिसाला तालीमुल उद्दीन नामक पुस्तक लिखी 12 जून 1961 को इनकी मृत्यु के बाद हजरत कुतुब-उल-आलम जमाली गद्दीनशीन हुए।

उन्होंने जयपुर में रहकर उर्दू व फारसी की शिक्षा प्राप्त की। 15 दिसंबर 1999 को इनके निधन के बाद से हाजी विकार उर रहमान जमाली गद्दी नशीन हुए और उन्होंने भी अपने पूर्वज हजरत जमाल हाशमी के नाम से सिलसिला जमालिया की स्थापना की।

उर्स में हाजिरी लगा चुके नवाब पटौदी भी
उर्स में अब से पूर्व हाजिरी देने के लिए नवाब पटौदी, नवाब झज्जर हरियाणा, नवाब धनबाड़ी बंगाल, महाराजा अलवर के अलावा स्वास्थ्य केंद्रीय मंत्री काजी रशीद मसूद, बसपा सरकार में रहे पूर्व मंत्री डॉ.धर्म सिंह सैनी, पूर्व विधायक संजय गर्ग व वक्फ बोर्ड के चेयरमैन लियाकत अली के अलावा गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के वीसी भी यहां आ चुके हैं।

अजमेर शरीफ से लाई गई चादर शरीफ का निकाला जुलूस
उर्स के दूसरे दिन 25 सितंबर को मोहल्ला मिर्धान स्थित दरगाह के गद्दी नशीन हाजी विकारू रहमान जमाली के आवास से जयपुर स्थित अजमेर शरीफ से आई हुई चादर शरीफ का जुलूस निकाला गया। जिसे बाद में कस्बे की परिक्रमा करते हुए दरगाह कमालिया में बड़ी अकीदत के साथ चढ़ाया जाएगा।

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