मेहनत की 'रस्सी' से बांध रहीं परिवार की खुशहाली:सीतापुर के महोली की महिलाओं ने मेहनत से हासिल की मंजिल, कई लोगों को मिला चुका है रोजगार

महोली, सीतापुर5 महीने पहले
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अब रात की दीवार को ढाना है जरूरी, ये काम मगर मुझसे अकेले नहीं होगा। ये लाइनें कस्बे की उन महिलाओं पर सटीक बैठती है जिन्होंने सामाजिक बंदिशों और गरीबी के बावजूद किसी के आगे हाथ नहीं फैलाए। अनुसूचित जाति की यह महिलाएं बेरोजगारी और गरीबी का रोना रोने वालों के लिए आइना हैं। ये महिलाएं अपने समाज की अन्य महिलाओं को भी प्लास्टिक के रेशों से रस्सी बनाना सिखा रहीं हैं ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें।

गीता ने बदली महिलाओं की सोच

कस्बे के अवस्थी टोला में करीब एक दर्जन मकान कंजर बिरादरी के लोगों के हैं। इस बिरादरी की महिला मुखिया गीता ने बताया कि पहले वो सिल-बट्टा का काम करती थीं लेकिन ये धंधा फ्लाप हो चुका है। कंजर जाति की होने के चलते लोग उसे घरों में साफ-सफाई के लिए भी नहीं लगाते थे। परिवार भूखमरी की कगार पर पहुंच गया। लेकिन उसने हाथ न फैलाकर मेहनत की रोटी खाना पसंद किया। उसने दुकानों से कम कीमत पर प्लास्टिक की कटी-फटी निष्प्रयोज्य बोरियां खरीदीं और उसके रेशों से रस्सी बनाकर साप्ताहिक बाजारों में बेचना शुरू किया। धीरे-धीरे जीवन की गाड़ी पटरी पर आ गई। गीता ने अपने समाज की परेमा, राखी, पायल, काजल को भी प्लास्टिक के रेशों से रस्सी बनाना सिखाया है। अब कंजर समाज की सभी महिलाएं रेशों से रस्सी बनाती हैं।

मुनाफा से ज्यादा मेहनत

गीता ने बताया कि हम सब बाजार से 20 रुपये किलो की दर से निष्प्रयोज्य बोरियां खरीदती हैं जिसमें करीब 45 रुपये की रस्सी बन जाती है। रस्सी बनाने में घर के सभी लोग दिन-रात जुटते हैं तब जाकर कहीं रुपये हाथ में आते हैं। समाज की बेहतरी के लिए सभी बच्चे पड़ोस के सरकारी स्कूल में पढ़ते भी हैं। राशन कार्ड से खाने भर को गल्ला भी मिल जाता है।