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  • Chief Minister Was Elected From Sultanpur's Isauli Seat; The Seat Has Been Around SP BSP For Two And A Half Decades, BJP Candidate Was Also The Runner In Modi Wave

इसौली में 3 दशक से नहीं खुला BJP का खाता:सुल्तानपुर की इसी सीट से चुनाव जीत श्रीपति मिश्र बने थे CM, ढाई दशक से सपा-बसपा के इर्द-गिर्द रही सीट

सुल्तानपुर8 महीने पहले
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सुल्तानपुर की इसौली सीट पर बीजेपी अभी तक सिर्फ एक बार चुनाव जीती है। मोदी लहर में भाजपा प्रत्याशी रनर रहा। यूपी की यह सीट इतनी अहम है कि यहां से मुख्यमंत्री चुना गया था। करीब ढ़ाई दशक से यह सीट सपा-बसपा के इर्द-गिर्द रही। हालांकि सुल्तानपुर की सांसद मेनका गांधी ने इस पर आंखें गड़ा रखी हैं। हाल ही में इसौली विधानसभा क्षेत्र में आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा था कि हमें यह सीट चाहिए।

श्रीपति मिश्रा ने सीएम होते हुए क्षेत्र का किया विकास

वर्ष 1980 के चुनाव में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता श्रीपति मिश्र ने चुनाव लड़ा तो इसौली की जनता ने इस बार विधायक नहीं प्रदेश का मुख्यमंत्री चुनकर भेजा था। चुनाव जीतने के बाद श्रीपति मिश्र सत्ता में रहते हुए वर्ष 1982 में प्रदेश के मुख्यमंत्री चुने गए। अपने मुख्यमंत्री काल में श्रीपति मिश्रा ने विधानसभा क्षेत्र की सड़कों का निर्माण कार्य करवाने के साथ इसौली घाट पर एक पुल का निर्माण करवाया। साथ ही बल्दीराय में एक महिला अस्पताल की आधारशिला रखी। यह आज भी मौजूद है, लेकिन क्षेत्र के लोगों का दुर्भाग्य रहा कि उक्त अस्पताल के निर्माण हो जाने के बाद भी अभी तक स्वास्थ्य विभाग के शीर्ष अधिकारियों ने गैर जिम्मेदाराना रुख अख्तियार करके किसी डॉक्टर और कर्मचारी की नियुक्ति नहीं की।

साल 2000 में इंद्रभद्र सिंह की हुई हत्या

1989 में फिर चुनाव हुआ तो मायंग निवासी इंद्रभद्र सिंह ने जनता दल के निशान पर विजय हासिल की और जब 1993 में चुनाव हुआ तो इंद्रभद्र सिंह ने निर्दल चुनाव लड़कर मतदाताओं का विश्वास कायम रखा। वर्ष 1996 में चुनाव का बिगुल बजा तो कांग्रेस के कद्दावर नेता कहे जाने वाले जय नारायण तिवारी पार्टी से बागी हो गए और बसपा के बैनर तले चुनाव लड़कर इंद्रभद्र सिंह को हरा दिया। आगामी चुनाव की रूप-रेखा तैयार करते-करते पूर्व विधायक इन्द्रभद्र सिंह की हत्या वर्ष 2000 में कर दी गई।

ढ़ाई दशक से चुनावी मैदान में है भद्र परिवार

2002 के विधानसभा चुनाव में स्व. इंद्र सिंह के बड़े पुत्र चंद्रभद्र सिंह 'सोनू' ने अपने पिता की खोई हुई विरासत को पाने के लिए सपा के बैनर तले चुनाव लड़ा और विजय हासिल की। बसपा की सरकार होने के बाद भी सोनू सिंह मतदाताओं में उतने ही चर्चित हो गए थे, जितने उनके पिता इंद्रभद्र सिंह थे। 2007 के चुनाव में चंद्रभद्र सिंह 'सोनू' ने सपा से टिकट पाकर अपनी इस स्थानीय सीट पर कब्जा बरकरार रखा। 2009 में सपा छोड़ वो बसपा में आए और जीत हासिल की, लेकिन 2012 में वो पीस पार्टी के टिकट पर सुल्तानपुर चले गए और छोटे भाई यश भद्र सिंह 'मोनू' को इसौली की कमान सौंप दिया।

मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका में

सपा लहर में जनपद के अझुई निवासी अबरार अहमद ने साइकिल पर सवारी की और विधानसभा का सफर तय कर लिया। 2017 की मोदी लहर में भी अबरार बाजी मार गए। दोनों चुनावों में मोनू सम्मानजक स्थिति में रहे। अब जब 2022 का बिगुल बजा है तो मोनू बसपा के टिकट पर मैदान में हैं। उनके मुकाबले पर सपा से पूर्व सांसद ताहिर खाने के आने का कयास लगाया जा रहा। जबकि भाजपा में कई दावेदार हैं। ऐसे में करीब 4 लाख मतदाताओं में सामान्य जाति के मतदाताओं के साथ ही अन्य पिछड़ा वर्ग और दलित मतदाताओं की तादाद अच्छी खासी है। मुस्लिम मतदाता भी इसौली सीट से चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। जिस ओर मुस्लिम वोटर अधिक डायवर्ट हुए उसकी विजय श्री होना है।

इसौली विधानसभा सीट का इतिहास

1952 में कांग्रेस से नाजिम अली विधायक बने। 1957 में जनसंघ से गया बक्स सिंह विधायक बने। 1962 में कांग्रेस से रामबली मिश्र विधायक बने। 1967 में कांग्रेस से रामबली मिश्र विधायक बने। 1969 में भारतीय क्रान्ति दल से रामजियावन दुबे विधायक बने। 1974 में कांग्रेस से अम्बिका सिंह विधायक बने। 1975 में जनता पार्टी से रामबरन वर्मा विधायक बने। 1985 में कांग्रेस से जय नारायन तिवारी विधायक बने।