सुल्तानपुर...कादीपुर में पहली बार कांग्रेस की महिला प्रत्याशी:पुराने दौर में इस सीट पर 11 बार रहा कब्जा, 1989 के बाद से नहीं मिली जीत

सुल्तानपुर6 महीने पहले
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सुल्तानपुर में पूर्वांचल के छोर वाली कादीपुर सुरक्षित सीट पर कांग्रेस ने अब तक के इतिहास में पहली बार महिला उम्मीदवार उतारा है। पार्टी ने वॉर्ड-19 से जिला पंचायत सदस्य निकलेश सरोज को प्रत्याशी बनाया है। वहीं बसपा छोड़कर सपा में आए 3 बार के पूर्व विधायक भगेलू राम प्रबल दावेदार हैं। जबकि बीजेपी के मौजूदा विधायक राजेश गौतम टिकट बचाने की कवायद में लगे हैं। हालांकि क्षेत्र में उनका विरोध जमकर है।

उल्लेखनीय रहे कि कांग्रेस प्रत्याशी निकलेश धनपतगंज के ग्राम पंचायत विनगी निवासी राजाराम की बेटी हैं। निकलेश ने अपना राजनीतिक सफर बसपा से शुरू किया था। 15 जनवरी 2016 को वे बसपा में शामिल हुई थीं। 2021 में उन्होंने बसपा प्रत्याशी के रूप में वार्ड नंबर 19 से जिला पंचायत सदस्य का चुनाव लड़ा और जीत कर जिला पंचायत पहुंचीं। परिवार में माता-पिता के अलावा दो भाई और एक बहन हैं। पिता खेती किसानी करते हैं। दो भाई हैं, जो लुधियाना में सब्जी बेचते हैं। बहन की शादी हो चुकी है, लेकिन निकलेश ने शादी नहीं की। निकलेश ने एमए बीएड के साथ पॉलिटेक्निक से मार्केटिंग मैनेजमेंट का कोर्स किया है।

मोदी लहर में 25 साल बाद खिला था कमल

बता दें कि 2017 के विधानसभा चुनाव में कादीपुर विधानसभा सीट से सपा-कांग्रेस के गठबंधन से सपा के विधायक रहे रामचंद्र चौधरी के पुत्र अंगद चौधरी, बसपा से दो बार विधायक रहे भगेलू राम और भाजपा से राजेश गौतम चुनावी मैदान में थे। यहां भाजपा उम्मीदवार राजेश गौतम ने दोनों दिग्गजों को पटकनी देते हुए 87,136 वोट पाकर भाजपा का परचम कादीपुर में लहरा दिया था।

आजादी के बाद से आरक्षित है सीट

कादीपुर विधानसभा सीट आजादी के बाद से कभी सामान्य नहीं हुई। 1957 से पूर्व यह संयुक्त विधानसभा हुआ करती थी। यहां के मतदाता 2 विधायक चुनते थे। एक अनुसूचित व एक सामान्य वर्ग से। इसके बाद सीट सुरक्षित घोषित हुई, तब से अब तक यह सिलसिला चला आ रहा है। पुराने दौर में यह सीट कांग्रेस का गढ़ हुआ करती थी। यहां कांग्रेस का टिकट जीत की गारंटी माना जाता था। इस विधानसभा पर पहली बार 1951 में चुनाव हुए थे। उस वक्त यह सीट अनारक्षित श्रेणी में आती थी। इस चुनाव में कांग्रेस के शंकर और काशी प्रसाद ने जीत हासिल की थी।

1957 में सीट सुरक्षित श्रेणी में आ गई। हालांकि इस बार भी कांग्रेस के काशी प्रसाद और शंकर ही विधायक बने। 1962 में श्रीपति मिश्रा, 1967 में सुखदेव, 1969 में जगदीश प्रसाद, 1974 में जयराज गौतम कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा पहुंचे। 1977 में जनता पार्टी ने कांग्रेस के जीत के क्रम को तोड़ दिया। हालांकि 1980 में कांग्रेस के जयराज गौतम फिर विधायक बने। वहीं 1985 रामआसरे, 1989 में तीसरी बार जयराज गौतम ने विधायक बनकर कांग्रेस का परचम लहराया।

1993 से बसपा-सपा का यहां रहा कब्जा

90 के दशक में चल रहे राम लहर पर सवार होकर भाजपा ने कांग्रेस के इस गढ़ को तोड़ दिया और 1991 के चुनाव में काशीनाथ विधायक बनकर विधानसभा पहुंचे। हालांकि भाजपा जीत दोहरा नहीं पाई और इस सीट पर बसपा काबिज हुई। 1993, 2002 और 2007 में बसपा के भगेलू राम लगातार यहां से विधायक बने। वहीं 2012 में चली साइकिल की रफ्तार ने सबको पीछे छोड़ दिया और रामचंद्र चौधरी यहां से विधायक बने, लेकिन 2017 की मोदी लहर में भाजपा ने 25 साल बाद इस सीट पर कब्जा किया।

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