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‘आजाद’ के ननिहाल से कहानियां:अंग्रेज अफसर को पत्थर खींचकर मारा, मां-बाप को लगा था उन्हें बाघ खा गया

10 दिन पहलेलेखक: राजेश साहू

चंद्रशेखर आजाद...भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का वह मजबूत सिपाही, जिसने अंग्रेजी अफसरों को बहादुरी की परिभाषा सिखाई। उनके हर कोड़ों पर भारत माता की जय बोल कर उन्हें क्रांतिकारियों का देश प्रेम दिखाया। अंग्रेजों के हाथ दोबारा न आकर अपनी मजबूत चालों का लोहा मनवाया। खुद से खुद को गोली मारकर दिखा दिया कि चंद्रशेखर जो कहता है वो करता है। वो जिन्हें अंग्रेज कभी गिरफ्तार नहीं कर पाए।

उनकी वीरता के तमाम किस्से आपने सुने होंगे। इस गणतंत्र दिवस दैनिक भास्कर आजाद के ननिहाल उन्नाव के बदरका गांव पहुंचा। उनके बचपन के किस्सों को जाना। आइए सब कुछ जानते हैं।

जन्म पत्री कहती है चंद्रशेखर यहीं पैदा हुए और उनका बचपन इसी गांव में बीता

तस्वीर में आजाद की विरासत संभाल रहे राजन शुक्ल हैं। उनका दावा है कि चंद्रशेखर का जन्म उन्नाव के बदरका में ही हुआ।
तस्वीर में आजाद की विरासत संभाल रहे राजन शुक्ल हैं। उनका दावा है कि चंद्रशेखर का जन्म उन्नाव के बदरका में ही हुआ।

उन्नाव शहर से करीब 12 किलोमीटर दूर बदरका गांव है। कुल आबादी करीब साढ़े तीन हजार है। गांव के दोनों मुख्य रास्तों के साइड जो शिलापट लगे हैं, उसमें चंद्रशेखर आजाद गृह मार्ग लिखा है। क्योंकि यह गांव चंद्रशेखर का ननिहाल है। यहां के लोग दावा करते हैं कि चंद्रशेखर यहीं पैदा हुए। लेकिन इंटरनेट पर उनका जन्मस्थान मध्य प्रदेश के अलीराजपुर जिले का भाबरा गांव दर्ज है।

बदरका चौकी पर गाड़ी खड़ी करने के बाद हम पतली गलियों से होते हुए गांव के अंदर पहुंचे। लोगों से चंद्रशेखर आजाद का ननिहाल पूछा तो वो समझ ही नहीं पाए। कुछ देर बाद जवाब मिला, "ओह! आप क्रांतिकारी की बात कर रहे हैं। यहां चंद्रशेखर नहीं आजाद जी नाम चलता है।" इसके बाद उनके बताए रास्तों से होते हुए हम चंदू उर्फ चंद्रशेखर सीताराम तिवारी की मां जयरानी देवी के घर पहुंचे। घर पर ताला लगा था। पर पास ही में हमारी मुलाकात राजन शुक्ल से हुई।

राजन जयरानी देवी के पड़ोसी हैं और अब वही यहां की विरासत संभाल रहे हैं। चंद्रशेखर की मूर्तियों का ख्याल रखना हो या फिर उनकी जयंती पर मेले का आयोजन हो, सब कुछ राजन ही देखते हैं। उन्होंने हमें कुछ इंट्रेस्टिंग कहानियां बताई। चलिए आजाद के बचपन के कुछ किस्सों को जानते हैं।

तस्वीर में आजाद की मां का घर है। गांव वालों की माने तो आजाद का बचपन इसी घर में बीता है। तब ये घर कच्चा बना हुआ था। अब यहां कोई नहीं रहता। घर पर ताला पड़ा हुआ है।
तस्वीर में आजाद की मां का घर है। गांव वालों की माने तो आजाद का बचपन इसी घर में बीता है। तब ये घर कच्चा बना हुआ था। अब यहां कोई नहीं रहता। घर पर ताला पड़ा हुआ है।

राजन हमें चंद्रशेखर की जन्म पत्री दिखाते हुए कहते हैं, "इसमें आजाद जी की जन्म तारीख 7 जनवरी 1906 और जन्म स्थान के रूप में इसी बदरका गांव का जिक्र है। न सिर्फ हमारे पिता बृज किशोर शुक्ल बल्कि उनके भी पिता आजाद जी की विरासत को संभाल रहे हैं।" राजन बताते हैं, "जब तक आजाद जी की मां जयरानी देवी जिंदा रहीं तब तक उनके जन्म स्थान को लेकर कोई विवाद नहीं था। लेकिन, जैसे ही 1951 में उनका निधन हुआ उनके जन्मस्थान को बदल दिया गया।"

अंग्रेज अफसर का सिर पत्थर से फोड़ दिया
राजन हमें बताते हैं, "चंदू उर्फ चंद्रशेखर करीब 9 साल के रहे होंगे। वह इसी गांव के मदरसे से पढ़कर आ वापस आ रहे थे। रास्ते में देखा कि गांव के ही कल्लू को लगान नहीं देने की वजह से अंग्रेज अफसर मार रहा था। चंदू ने पास से ही एक पत्थर उठाया और खींचकर मारा। पत्थर सीधे अंग्रेज अफसर के सिर में लगा और वह दर्द से कराह उठा।"

चंदू भागते हुए घर आए। अफसर पीछा करते हुए घर पहुंचा और चंदू के पिता सीताराम तिवारी को गाली देने लगा। चंदू घर से बाहर निकला और अफसर से कहा, "तुम जिसे मार रहे थे वह मेरे दादा समान हैं। मैं उन्हें मार खाता नहीं देख सकता।"

बदरका गांव में चंद्रशेखर को पूजते हैं लोग

बदरका गांव की शुरुआत में ही चंद्रशेखर की मूर्ति लगी हुई है। गांव के लोग इस मूर्ति की पूजा करते हैं।
बदरका गांव की शुरुआत में ही चंद्रशेखर की मूर्ति लगी हुई है। गांव के लोग इस मूर्ति की पूजा करते हैं।

गांव में जिस जगह आजाद जी की मां जगरानी देवी रहती थीं, वहां अब उनकी मूर्ति लगाकर मंदिर बना दी गई है। यह काम यूपी के पूर्व सीएम एनडी तिवारी ने किया। यहां 1966 में देश की प्रधानमंत्री रहीं इंदिरा गांधी आई थी। उन्होंने उस वक्त कहा था, "आजाद के जन्म दिवस पर आज बदरका आकर धन्य हो गई हूं। यहां की मिट्टी ने चंद्रशेखर आजाद जैसे नर रत्न को जन्मा है। यह पावन धरती सारे तीर्थों का तीर्थ है। यहां की मिट्टी को मैं देशवासियों की ओर से नमन करती हूं।"

मां-बाप को लगा आजाद को बाघ खा गया
चंद्रशेखर से जुड़ा राजन एक और किस्सा सुनाते हैं, आजाद जी जब 11 साल के थे तो यहां से अपने पिता सीताराम तिवारी के साथ एमपी के अलीराजपुर चले गए। वह जंगलों से घिरा इलाका था। इसलिए आजाद को वहां अच्छा नहीं लगता था। एक दिन वह नगीना बेचने वाले व्यापारी के साथ भागकर मुंबई चले गए। किसी को बताया ही नहीं। घरवाले जब तक खोज सकते थे खोजा और फिर ये मान लिया कि आजाद को जंगल का ही बाघ खा गया।

लेकिन चंद्रशेखर तो जिंदा थे। वह शुरू में मुंबई के बंदरगाहों पर जहाज में पेंटिंग का काम करते थे। लेकिन कुछ दिन बाद ही वह एक होटल में खाना परोसने और बर्तन धुलने का काम करने लगे। एक दिन बनारस संस्कृत विद्यालय के अध्यापक नंद किशोर गुप्ता उस होटल पर खाना खाने पहुंचे। चंद्रशेखर को देखा तो समझ गए कि यह बालक अच्छे घर का है। उसे वह अपने साथ लेकर बनारस आए। चंद्रशेखर यहीं रहने लगे। उस वक्त गांधी जी का असहयोग आंदोलन चरम पर था। वो बहुत प्रभावित हुए।

15 कोड़े खाए तब चंद्रशेखर बने ‘आजाद’
एक दिन आजाद ने अपने साथियों के साथ हाथ में झंडा लेकर रैली निकाली। बनारस के गोदौलिया चौराहे पर पहुंचे तो अंग्रेजी अफसर ने कहा, झंडा नीचे फेंको। तुम बच्चे हो जाकर पढ़ो। आजाद ने कहा, तुम्हें फेंक देंगे लेकिन झंडा नहीं फेकेंगे। अंग्रेजों ने घेरकर पकड़ लिया और मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया।

मजिस्ट्रेट ने पूछाः तुम्हारा नाम क्या है? चंद्रशेखर ने कहाः आजाद मजिस्ट्रेट ने पूछाः तुम्हारे पिता का क्या नाम है? चंद्रशेखर ने कहाः स्वतंत्रता मजिस्ट्रेट ने पूछा: तुम्हारा पता क्या है? चंद्रशेखर ने कहाः जेल खाना

मजिस्ट्रेट को गुस्सा आया और उसने 15 साल के आजाद को 15 कोड़े मारने की सजा सुनाई। कोड़े पीठ पर जब भी कोड़े पड़ते चंद्रशेखर भारत मां की जय बोलते। पूरी पीठ खून से लाल हो गई लेकिन उनका उत्साह कम नहीं हुआ। नतीजा ये रहा कि एक दिन बनारस में उन्हें देखने के लिए हजारों की भीड़ उमड़ पड़ी। चंद्रशेखर को मेज पर खड़ा किया गया तब जाकर जनता देख पाई थी।

घर में रुकने के लिए कहने पर मां को धक्का दे दिया

गांव में आजाद की मां जगरानी देवी की भी मूर्ति लगी है। लोग सामने के गुजरते हुए मूर्ति के सामने सिर झुकाते हैं।
गांव में आजाद की मां जगरानी देवी की भी मूर्ति लगी है। लोग सामने के गुजरते हुए मूर्ति के सामने सिर झुकाते हैं।

क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल होने के बाद एक बार चंद्रशेखर झांसी से कानपुर आए। उनके साथ महावीर प्रसाद भी थे। उस वक्त किसी भी क्रांतिकारी साथी को नहीं पता था कि आजाद का घर गंगा नदी के पार बदरका गांव में हैं। एक दिन वह महावीर के साथ नदी को पार करते हुए घर पहुंचे। दरवाजा खटखटाया तो मां जगरानी बाहर निकलीं। बेटे को देखते ही लिपट कर रोने लगी। आजाद ने कहा, मां भूख लगी है। जगरानी भागकर पड़ोसी के घर पहुंची और तीन रोटी व सब्जी लेकर आई। दो रोटी आजाद ने और एक महावीर ने खाई।

आजाद जब चलने लगे तो मां फिर से उनसे लिपट गई और कहा, बेटे अब मत जाओ। आजाद ने मां को धक्का देकर गिरा दिया। महावीर ये देखकर चकित रह गए। उन्होंने कहा, ये क्या कर रहे हो आजाद? तुम्हारी मां हैं वो। आजाद ने कहा, ऐसी लाखों माएं हैं महावीर जो अपने बच्चों के लिए तड़प रही हैं। हमें उनके लिए भारत मां को आजाद करवाना है। चलो अब यहां से। इतना कहकर वह मौके से निकल गए। मां आंखो में आंसू लेकर देखती रही।

जब दोस्त ने ही की आजाद के साथ गद्दारी

27 फरवरी 1931 को अंग्रेज जिन्दा ना पकड़ पाएं इसलिए आजाद ने खुद को गोली मार ली।
27 फरवरी 1931 को अंग्रेज जिन्दा ना पकड़ पाएं इसलिए आजाद ने खुद को गोली मार ली।

घर से निकलने के बाद आजाद ने काकोरी कांड में भाग लिया। लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए ब्रिटिश पुलिस ऑफिसर को गोली मार दी। अंग्रेज अफसर जगह-जगह आजाद को ढूंढने लगे। पर आजाद उनके हाथ नहीं आए। 27 फरवरी 1931 का दिन था। आजाद प्रयागराज के अल्फ्रेड पार्क में सुखदेव और एक दोस्त के साथ छुपे हुए थे। आगे क्या करना है उसकी योजना बना रहे थे। इसी दौरान आजाद की उनके दोस्त से किसी बात को लेकर बहस हो गई।

उस दोस्त ने इसका बदला लेने के लिए आजाद की अल्फ्रेड पार्क में छुपे होने की बात अंग्रेजों को बता दी। अंग्रेज उस पार्क में पूरी बटालियन लेकर पहुंच गए। चारों तरफ से पार्क को घेरकर दनादन फायरिंग शुरू कर दी। आजाद के पास बस एक पिस्तौल और गिनी हुई गोलियां थीं।

आजाद 20 मिनट तक अंग्रेजों से लड़े। आखिर में पिस्तौल में सिर्फ एक गोली बची। आजाद को अपनी कसम याद आई कि वो मर जाएंगे लेकिन जीते जी अंग्रेजों के हाथ कभी नहीं आएंगे। आजाद ने वो आखिरी गोली खुद को मार ली और अपनी कसम पूरी की। जाते-जाते वो एक शेर बोल गए…
“दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे, आजाद ही रहे हैं, आजाद ही रहेंगे।”