54 रंगरूट बने भारतीय सेना का हिस्सा:वाराणसी के 39 GTC में पासिंग आउट परेड के बाद जवानों ने सर्वस्व बलिदान की ली शपथ; भेंट किया गया खुखरी

वाराणसी9 दिन पहले
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गोरखा रंगरूटों की पासिंग आउट परेड की सलामी ब्रिगेडियर राजीव नागयाल (सेना मेडल) ने ली। उन्होंने कहा कि एक सैनिक को हमेशा अनुशासन, अपनी फिटनेस और शस्त्र के ठीक से रखरखाव पर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए। बदलते परिवेश के साथ युद्ध के तौर-तरीके में हो रहे बदलाव और तकनीक में सैनिक को पारंगत होना चाहिए। - Dainik Bhaskar
गोरखा रंगरूटों की पासिंग आउट परेड की सलामी ब्रिगेडियर राजीव नागयाल (सेना मेडल) ने ली। उन्होंने कहा कि एक सैनिक को हमेशा अनुशासन, अपनी फिटनेस और शस्त्र के ठीक से रखरखाव पर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए। बदलते परिवेश के साथ युद्ध के तौर-तरीके में हो रहे बदलाव और तकनीक में सैनिक को पारंगत होना चाहिए।

वाराणसी के छावनी क्षेत्र स्थित 39 गोरखा ट्रेनिंग सेंटर (GTC) में 42 हफ्ते के कठिन प्रशिक्षण के बाद शुक्रवार को 54 रंगरूटों ने देश की रक्षा के लिए जान न्यौछावर करने की शपथ ली। प्रभावशाली पासिंग आउट परेड के बाद भारतीय सेना का हिस्सा बने गोरखा जवानों को नेपाली संस्कृति के अनुसार उनका परंपरागत हथियार खुखरी भेंट किया गया। इससे पहले परेड की सलामी लेने के बाद मुख्य अतिथि 39 जीटीसी के कमांडेंट ब्रिगेडियर राजीव नागयाल (सेना मेडल) ने कहा कि सभी जवान सदैव अनुशासन, शारीरिक क्षमता और लक्ष्य को हमेशा ध्यान में रखते हुए शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ते रहें।

तस्वीरों में देखें, प्रभावशाली पासिंग आउट परेड...।

रंगरूटों के शपथ लेने का अंदाज अनूठा था। उन्होंने कहा- 'जब कभी भी जमीन, हवा और पानी के रास्ते भेजा जाएगा, जाऊंगा। भारतीय संघ के अधिनायक और सेना के उच्च अधिकारियों के आदेशों का पालन करूंगा। चाहे इसके लिए जीवन ही क्यों न बलिदान करना पड़े।'
रंगरूटों के शपथ लेने का अंदाज अनूठा था। उन्होंने कहा- 'जब कभी भी जमीन, हवा और पानी के रास्ते भेजा जाएगा, जाऊंगा। भारतीय संघ के अधिनायक और सेना के उच्च अधिकारियों के आदेशों का पालन करूंगा। चाहे इसके लिए जीवन ही क्यों न बलिदान करना पड़े।'
रंगरूटों ने प्रशिक्षण के दौरान यह सीखा कि विषम परिस्थितियों में भी वह देश के लिए ही जिएंगे और मरेंगे। दुश्मन देश के सामने कभी सिर नहीं झुकाएंगे और भारत भूमि की रक्षा के लिए जरूरत पड़ी तो हंसते हुए शहीद हो जाएंगे। गोरखा रेजीमेंट के पाइप बैंड की धुन के बीच पासिंग आउट परेड के बाद रंगरूट स्मृति धाम पहुंचे और शहीदों को श्रद्धांजलि दी।
रंगरूटों ने प्रशिक्षण के दौरान यह सीखा कि विषम परिस्थितियों में भी वह देश के लिए ही जिएंगे और मरेंगे। दुश्मन देश के सामने कभी सिर नहीं झुकाएंगे और भारत भूमि की रक्षा के लिए जरूरत पड़ी तो हंसते हुए शहीद हो जाएंगे। गोरखा रेजीमेंट के पाइप बैंड की धुन के बीच पासिंग आउट परेड के बाद रंगरूट स्मृति धाम पहुंचे और शहीदों को श्रद्धांजलि दी।
परेड के बाद बेस्ट इन ड्रिल का खिताब यंग राइफलमैन सिद्धांत कटुवाल को मिला। बेस्ट इन फायरिंग का खिताब यंग राइफलमैन संजोग सारकी को मिला। बेस्ट इन Combat Obstacle Course का खिताब और ले. कपाड़िया ट्रॉफी यंग राइफलमैन प्रवेश छेत्री को मिली। बेस्ट इन टेक्टिस का खिताब यंग राइफलमैन दिनछेन तम्मांग को मिला।
परेड के बाद बेस्ट इन ड्रिल का खिताब यंग राइफलमैन सिद्धांत कटुवाल को मिला। बेस्ट इन फायरिंग का खिताब यंग राइफलमैन संजोग सारकी को मिला। बेस्ट इन Combat Obstacle Course का खिताब और ले. कपाड़िया ट्रॉफी यंग राइफलमैन प्रवेश छेत्री को मिली। बेस्ट इन टेक्टिस का खिताब यंग राइफलमैन दिनछेन तम्मांग को मिला।
बेस्ट इन बेनेट एंड खुखरी फाइटिंग का खिताब यंग राइफलमैन पेमसांगाय तम्मांग को मिला। बेस्ट इन बीपीईटी का खिताब यंग राइफलमैन अभिनाष राई को मिला। 2nd ऑल राउंड बेस्ट का जनरल एमके लाहिड़ी मेडल संग राइफलमैन प्रवेश छेत्री को मिला। ऑल राउंड बेस्ट की गौरव तलवार संग राइफलमैन रोशन बहादुर छेत्री को दी गई।
बेस्ट इन बेनेट एंड खुखरी फाइटिंग का खिताब यंग राइफलमैन पेमसांगाय तम्मांग को मिला। बेस्ट इन बीपीईटी का खिताब यंग राइफलमैन अभिनाष राई को मिला। 2nd ऑल राउंड बेस्ट का जनरल एमके लाहिड़ी मेडल संग राइफलमैन प्रवेश छेत्री को मिला। ऑल राउंड बेस्ट की गौरव तलवार संग राइफलमैन रोशन बहादुर छेत्री को दी गई।
39 GTC के अफसरों के अनुसार साल 1952 से पहले गोरखा के 2 राइफल्स प्रशिक्षण केंद्र थे। 1 अक्टूबर 1952 को दोनों केंद्र को मिलाकर एक कर दिया गया और इस तरह से 39 GTC की नींव पड़ी। उस दौरान 39 GTC का प्रशिक्षण केंद्र देहरादून के बीरपुर में था। 1 जनवरी 1976 को बीरपुर से 39 GTC को वाराणसी स्थानांतरित कर दिया गया।
39 GTC के अफसरों के अनुसार साल 1952 से पहले गोरखा के 2 राइफल्स प्रशिक्षण केंद्र थे। 1 अक्टूबर 1952 को दोनों केंद्र को मिलाकर एक कर दिया गया और इस तरह से 39 GTC की नींव पड़ी। उस दौरान 39 GTC का प्रशिक्षण केंद्र देहरादून के बीरपुर में था। 1 जनवरी 1976 को बीरपुर से 39 GTC को वाराणसी स्थानांतरित कर दिया गया।
गोरखा जवानों की पासिंग आउट परेड के बाद उनके माता-पिता को गौरव पदक देकर सम्मानित किया गया। इस दौरान कोरोना गाइडलाइंस का पूरी तरह से पालन किया गया। मास्क लगाए बगैर आए हुए लोगों को 39 GTC में प्रवेश ही नहीं करने दिया गया।
गोरखा जवानों की पासिंग आउट परेड के बाद उनके माता-पिता को गौरव पदक देकर सम्मानित किया गया। इस दौरान कोरोना गाइडलाइंस का पूरी तरह से पालन किया गया। मास्क लगाए बगैर आए हुए लोगों को 39 GTC में प्रवेश ही नहीं करने दिया गया।
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