ग्रंथ में भी ज्ञानवापी के शिवलिंग का जिक्र:इतिहासकारों का दावा- 16वीं शताब्दी में तीर्थयात्री ज्ञानवापी कूप में नहाकर करते थे आदिविश्वेश्वर की पूजा

वाराणसी4 महीने पहलेलेखक: देवांशु तिवारी

ज्ञानवापी परिसर में सर्वे के दौरान मिली गोलाकार शिला को लेकर हिंदू और मुस्लिम पक्ष आमने-सामने हैं। कोर्ट के आदेश पर संरक्षित किए गए इस पत्थर को हिंदू पक्ष शिवलिंग बता रहा है। प्रतिवादी पक्ष यानी अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी ने इसे वजूखाने में लगा फव्वारा बताया है। फिलहाल, ज्ञानवापी मामले में सभी एप्लिकेशन, सर्वे रिपोर्ट और आपत्तियों पर 23 मई को वाराणसी कोर्ट में सुनवाई होगी।

सर्वे के दौरान मिली शिला पर इतिहासकारों और काशी के पुराने महंतों की राय जानना जरूरी है। ऐसे में हमने इस मामले में इतिहासकार ललित मिश्रा, BHU के इतिहास विभाग के प्रोफेसर राजीव श्रीवास्तव, काशी विश्वनाथ मंदिर के पूर्व महंत रहे डॉ. कुलपति तिवारी और बनारस के कुछ पुराने हिंदू परिवारों के लोगों से बातचीत की है। चलिए एक-एक कर उनकी बातों पर चलते हैं...

गंगाधर सरस्वती के ग्रंथ में मिलता है ज्ञानवापी में मिले शिवलिंग का लेटेस्ट एविडेंस
इतिहासकार ललित मिश्रा कहते हैं, "शिव पुराण, लिंग पुराण और स्कंद पुराण के काशी खंड में काशी विश्वनाथ मंदिर का वर्णन किया गया है। ज्ञानवापी विश्वेश्वर मंदिर का ही हिस्सा है। ऐसे में पुराणों के आधार पर मंदिर का निर्माण आज से करीब 1500 से 1700 साल पहले हुआ होगा। सर्वे में मिली शिला भी इतनी ही पुरानी हो सकती है।"

मिश्रा कहते हैं कि पुराणों के अलावा ज्ञानवापी से जुड़ा सबसे बेस्ट एंड लेटेस्ट एविडेंस 16वीं शताब्दी का है। दत्तात्रेय संप्रदाय के सन्यासी गंगाधर सरस्वती के लिखे गए 'गुरुचरित्र' नामक ग्रंथ में ज्ञानवापी का जिक्र किया गया है। इस ग्रंथ में उन्होंने अपने गुरु नरसिंह सरस्वती की काशी यात्रा का वर्णन किया था। गुरुचरित्र के 42वें भाग की 57वीं चौपाई में लिखा गया है...

महेश्वराते पूजोनि। ज्ञानवापीं करी स्नान। नंदिकेश्वर अर्चोन।
तारकेश्वर पूजोन। पुढें जावें मग तुवां ॥५७॥

गंगाधर सरस्वती के मुताबिक, 16वीं शताब्दी में काशी आने वाले तीर्थयात्री पहले ज्ञानवापी में आकर स्थान-ध्यान किया करते थे। इसके बाद वे नंदी की पूजा करके भगवान विश्वेश्वर का दर्शन किया करते थे। यही वो क्रम है जो हमें लिखित रूप में मिलता है। इस आधार पर ये कहा जा सकता है कि मंदिर विध्वंस से पहले से ये प्रक्रिया चलती आ रही थी। गुरुचरित्र के वर्णन से यह माना जा सकता है कि जो ज्ञानवापी परिसर में मिला वह फव्वारा नहीं है।

गुरुचरित्र की इन चौपाईयों में ज्ञानवापी का जिक्र है। ये तस्वीर ग्रंथ की कॉपी से ली गई है।
गुरुचरित्र की इन चौपाईयों में ज्ञानवापी का जिक्र है। ये तस्वीर ग्रंथ की कॉपी से ली गई है।

कार्बन डेटिंग से पता लग सकती है सच्चाई
ललित मिश्रा कहते हैं, "जब औरंगजेब ने मंदिर पर हमला किया तो यहां के प्राचीन शिवलिंग को पुजारियों ने ज्ञानवापी कूप के आस-पास छिपा दिया था, लेकिन इसके बाद ये शिवलिंग वजू करने वाली जगह पर कैसे पहुंचा। इन कड़ियों को जोड़ना जरूरी है। ये आसानी से खोजा जा सकता है क्योंकि जो स्ट्रक्चर उस शिवलिंग के चारों तरफ बना है वो चूना पत्थर का है। ये कब बनाया गया इसे कार्बन डेटिंग से पता लगाया जा सकता है।"

"ज्ञानवापी में मिला बाबा विश्वेश्वर का शिवलिंग 100% असली, बनावट में की गई छेड़छाड़"

काशी हिंदू विश्वविद्यालय यानी BHU के इतिहास विभाग के सीनियर प्रोफेसर डॉ. राजीव श्रीवास्तव कहते हैं, "ज्ञानवापी में मिला बाबा विश्वेश्वर का शिवलिंग 100% असली है। क्योंकि ये परिसर 350 से ज्यादा साल तक मुसलमानों के अधीन था। इसलिए उसके स्ट्रक्चर को बदला गया और उसे फव्वारा की शक्ल दी गई। मुगल दस्तावेजों में ऐसे किसी भी फव्वारे का जिक्र नहीं है, जिसका बेस शिवलिंग जैसा दिखता हो।"

राजीव बताते हैं, "औरंगजेब के काल में भी हिंदुओं के मंदिरों को तोड़कर नई इमारतें बनाई गईं। उस समय के कारीगरों को फव्वारे बनाने का कोई ज्ञान नहीं था फिर परिसर में फव्वारा कैसे बन गया।"

"जो शिवलिंग मिला, वो ही आदि विश्वेश्वर महादेव हैं"

काशी विश्वनाथ मंदिर के पूर्व महंत डॉ. कुलपति तिवारी ने दावा किया है कि सर्वे के तीसरे दिन ज्ञानवापी परिसर में मिला शिवलिंग ही बाबा विश्वेश्वर हैं। डॉ. तिवारी कहते हैं, "ज्ञानवापी कूप का निर्माण आज से 5 हजार साल पहले भगवान शंकर ने अपने त्रिशूल से किया था। इसी कूप में मां पार्वती नहाकर भगवान विश्वेश्वर के शिवलिंग की पूजा करती थीं। इसका वर्णन स्कंद पुराण में भी किया गया है। ये शिवलिंग भी ज्ञानवापी कूप के ठीक सामने वाली जगह पर मिला है, जिसे नंदी निहार रहे हैं। इसका अर्थ है कि जो शिवलिंग मिला है, वह ही आदि विश्वेश्वर महादेव हैं।"

काशी के हिंदू मस्जिद के आगे सर झुका लेते हैं, कहते हैं इसमें हमारे बाबा हैं
काशी के पक्का महाल इलाके में रहने वाले परमेश्वर पाठक 73 साल से ज्यादा समय से बनारस में रह रहे हैं। ज्ञानवापी परिसर में शिवलिंग मिलने के मामले पर वो कहते हैं, "हम बचपन में वहां खेलने जाया करते थे। उस समय वहां खाली जगह थी और मंदिर-मस्जिद के बीच कोई बैरिकेडिंग नहीं थी। मुझे याद है मेरे बाबा मस्जिद से सामने से गुजरते हुए वहां लेट कर भोलेनाथ को प्रणाम करते थे। वो कहते थे कि मस्जिद में बने तालाब में हमारे बाबा हैं। आज वहीं शिवलिंग दुनिया के सामने आ गया है।" ये बात परमेश्वर ने हमें ऑफ कैमरा बताई।

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