390 साल पहले ज्ञानवापी में था विश्वेश्वर शिवलिंग:ब्रिटिश यात्री पीटर मुंडी की किताब में है जिक्र, 2002 में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के शोध से हुआ खुलासा

वाराणसी3 महीने पहलेलेखक: हिमांशु अस्थाना
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390 साल पहले ज्ञानवापी में शिवलिंग मौजूद था। ऐसा दावा एक ब्रिटिश यात्री पीटर मुंडी ने किया था। वह एक यूरोपीय दार्शनिक तथा विदेशी यात्री था। मुगल बादशाह शाहजहां के समय में वह भारत आया था। उसने 1630-32 ई. में पड़े भीषण अकाल का भी उल्लेख किया है।

उसने लिखा है, 'बिना नक्काशी किए हुए पत्थर को महिलाएं पूज रही हैं। दूध, गंगाजल, फूल और चावल से अभिषेक कर रहीं हैं। घी के दीपक भी जलाए जा रहे हैं। यहां पर लोग इसे महादेव का शिवलिंग कहते हैं, जो कि चारों ओर एक दीवार से घिरा हुआ है। वहीं, पानी गिरने के लिए एक रास्ता भी बनाया गया है'।

पीटर मुंडी के किताब का वह पैरा, जहां पर शिवलिंग के पूजा की बातें लिखी गईं हैं। उसने अपनी किताब में तत्कालीन समाज की भी बातें लिखीं हैं।
पीटर मुंडी के किताब का वह पैरा, जहां पर शिवलिंग के पूजा की बातें लिखी गईं हैं। उसने अपनी किताब में तत्कालीन समाज की भी बातें लिखीं हैं।

यह कहानी वाराणसी के विश्वेवर मंदिर टूटने से 37 साल पहले की है। 1632 में शाहजहां का शासन था। उसके बेटे औरंगजेब के ज्ञानवापी मस्जिद बनवाने से पहले पीटर मुंडी बनारस आया था और उसने अपनी किताब में उस समय के समाज और वातावरण की बहुत सारी बातें भी लिखी हैं। उसने अपने लिखे के प्रमाण के तौर पर स्केच किया हुआ एक चित्र भी दिया है।

ज्ञानवापी परिसर के वजूखाने में यह संरचना मिली है, जिसे शिवलिंग बताया जा रहा है। मुस्लिम पक्ष का दावा है कि यह फव्वारा है।
ज्ञानवापी परिसर के वजूखाने में यह संरचना मिली है, जिसे शिवलिंग बताया जा रहा है। मुस्लिम पक्ष का दावा है कि यह फव्वारा है।

पीटर मुंडी ने अपनी किताब 'यूरोप और एशिया में पीटर मुंडी की यात्रा' में एक पूजनीय शिवलिंग की बात अपनी किताब में लिखी है। उसने बताया है कि ज्ञानवापी परिसर में किस तरह से पूजा होती थी और तब के समाज की संरचना कैसी थी? वह बताता है कि हिंदुओं के भीतर उस शिवलिंग को लेकर बहुत ही सम्मान और श्रद्धा का भाव है।

ज्ञानवापी मस्जिद में पिछले शुक्रवार यानी 20 मई को क्षमता से अधिक लोग नमाज पढ़ने चले गए थे, पुलिस का भारी बंदोबस्त करना पड़ा था। यह ज्ञानवापी की पुरानी फोटो है।
ज्ञानवापी मस्जिद में पिछले शुक्रवार यानी 20 मई को क्षमता से अधिक लोग नमाज पढ़ने चले गए थे, पुलिस का भारी बंदोबस्त करना पड़ा था। यह ज्ञानवापी की पुरानी फोटो है।

ज्ञानवापी के मस्जिद बनने से पहले की कहानी, पीटर की जुबानी

पीटर मुंडी लिखता है, 'क्षत्रिय, ब्राह्मण और बनियों की बस्ती बनारस में सबसे प्रसिद्ध मंदिर विश्वेश्वर महादेव है। मैं उसके अंदर गया। बीचों-बीच एक ऊंची जगह पर एक लंबोदरा सादा (बिना नक्काशी का) पत्थर है। उन पर लोग नदी का पानी, फूल, अक्षत और घी चढ़ाते हैं। पूजा के समय ब्राह्मण कुछ पढ़ते हैं, उसे लोग समझ नहीं पाते।

उस सादी मूर्ति को लोग महादेव का लिंग कहते हैं। इस लिंग के सामने लोग अपनी सुरक्षा और वंशवृद्धि की कामना करते हैं। महिलाएं अपने बच्चों को रोग मुक्त कराने के लिए यहां पर लाती हैं। यहां पर गणेश चतुर्भुज और देवी के भी मंदिर हैं। वहीं, नंदी भी विराजमान है। साथ ही मंदिर के मंडपम में काफी सुंदर मूर्तियां रखी गईं हैं'।

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर ने किया शोध

प्रोफेसर हेरंब चतुर्वेदी ने ज्ञानवापी को लेकर साल 2002 में एक शोध भी किया था, जिसमें डॉक्टर सचिंद्र पांडेय ने उनकी मदद की थी।
प्रोफेसर हेरंब चतुर्वेदी ने ज्ञानवापी को लेकर साल 2002 में एक शोध भी किया था, जिसमें डॉक्टर सचिंद्र पांडेय ने उनकी मदद की थी।

साल 2002 में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में वरिष्ठ इतिहासकार प्रोफेसर हेरंब चतुर्वेदी ने इस विषय पर एक शोध भी किया है। उनके नेतृत्व में डॉ. सचिंद्र पांडेय ने इसी विषय पर PhD की थी और आज वह देवरिया के एक कॉलेज में पढ़ाते हैं। प्रोफेसर हेरंब के कहने और उनके दिशा-निर्देश के आधार पर सचिंद्र पांडेय तब मस्जिद परिसर और काशी विश्वनाथ मंदिर में कई बार गए।

वहां जाकर उन्होंने कई प्राचीन अभिलेख जुटाए। इसमें मुगल सम्राट अकबर, जहांगीर, शाहजहां और औरंगजेब द्वारा बनारस के लिए जारी किए फरमान भी शामिल थे, जिनकी तस्वीरों को उन्होंने जमा किया।

ज्ञानवापी मस्जिद में मौजूद खंभों की बनावट और नक्काशी को लेकर भी हिंदू पक्ष लगातार सवाल उठाता रहा है। (फाइल फोटो)
ज्ञानवापी मस्जिद में मौजूद खंभों की बनावट और नक्काशी को लेकर भी हिंदू पक्ष लगातार सवाल उठाता रहा है। (फाइल फोटो)

बदलता रहा औरंगजेब का फरमान
विश्वविद्यालय द्वारा किए शोध से पता चलता है कि औरंगजेब जब अपने भाइयों का कत्ल करके गद्दी पर बैठा, तो सबसे पहले अबुल हसन के माध्यम से भाईचारे वाला फरमान जारी करता है। इसमें लिखता है कि बनारस में ब्राह्मणों के धार्मिक कामकाज में व्यवधान न डाला जाए। हमारे शरीयत कानून के अनुसार यह निश्चय हुआ है कि पुराने मंदिरों को न गिराया जाए और नए मंदिर न बनने दिए जाएं। यह हमारा शाही आदेश है।

हालांकि, जब उसके बड़े भाई दाराशिकोह और छत्रपति शिवाजी के बनारस में शरण लेने की बात उसने सुनी, तो गुस्सा गया। इसके बाद मेवाड़ के शासक के विश्वेश्वर मंदिर में पूजा करने की बात सुनने पर उसने दूसरा फरमान जारी किया। उसमें मंदिर और स्कूलों को तोड़ने सहित पूजा-पाठ पर प्रतिबंध लगाने की बात है। मस्जिदों को बनवाने की जिम्मेदारी शाहयासीन नाम के व्यक्ति को दी गई।

औरंगजेब के फरमान के ओरिजिनल कॉपी की यह प्रतिलिपि है। यह पहला फरमान था और इसमें औरंगजेब ने हिंदुओं के साथ सद्भाव का आदेश दिया है।
औरंगजेब के फरमान के ओरिजिनल कॉपी की यह प्रतिलिपि है। यह पहला फरमान था और इसमें औरंगजेब ने हिंदुओं के साथ सद्भाव का आदेश दिया है।
औरंगजेब के फरमान का हिंदी अनुवाद डॉ. सचिंद्र पांडेय ने कराया है। इसमें हिंदुओं को उनके मत के अनुसार पूजा-पाठ की अनुमति देने का आदेश है।
औरंगजेब के फरमान का हिंदी अनुवाद डॉ. सचिंद्र पांडेय ने कराया है। इसमें हिंदुओं को उनके मत के अनुसार पूजा-पाठ की अनुमति देने का आदेश है।

मंदिरों को तोड़ने का फरमान दिया औरंगजेब ने

बाद में मंदिरों को धार्मिक स्थानों को तोड़ने के लिए औरंगजेब ने दूसरा फरमान जारी किया था। वह शिवाजी और अपने भाई दाराशिकोह के बनारस जाने की खबर से भड़का था।
बाद में मंदिरों को धार्मिक स्थानों को तोड़ने के लिए औरंगजेब ने दूसरा फरमान जारी किया था। वह शिवाजी और अपने भाई दाराशिकोह के बनारस जाने की खबर से भड़का था।

मंदिर के तोड़े जाने के तीन संभावित कारण
हेरंब चतुर्वेदी और डॉ. सचिंद्र पांडेय ने मंदिर तोड़ने के तीन कारण भी बताए हैं। उन्होंने बताया कि बनारस में दाराशिकोह, छत्रपति शिवाजी और मेवाड़ शासक राज सिंह की बढ़ती सक्रियता को औरंगजेब अपने लिए खतरा मानता था। दाराशिकोह बनारस में संस्कृत की पढ़ाई करने आया था। उसने उपनिषदों का फारसी में अनुवाद कराना शुरू किया। उसने 1656 में विश्वनाथ मंदिर के एक पंडा भीमराम को पट्टा भी लिखकर दिया। कहा कि महादेव विश्वेश्वर वगैरह की पूजा बिना रोक-टोक करें।

10 साल बीतते-बीतते दारा की बढ़ती धार्मिक उदारता से औरंगजेब काफी नाराज हुआ था। लिहाजा, उसने बाद में मंदिरों को गिराने और धार्मिक कर लगाने का फरमान जारी किया। औरंगजेब ने विश्वेश्वर, कृति वासेश्वर और बिंदुमाधव मंदिर गिरवाकर मस्जिदें खड़ी कर दीं।

इसके बाद छत्रपति शिवाजी आगरा जेल से भागकर बनारस आए और विश्वेश्वर मंदिर में पूजा पाठ करते रहे। वहीं, बनारस के ही ब्राह्मण ने उनका राज्याभिषेक करवाया था। औरंगजेब का मेवाड़ के शासक राजसिंह ने पुस्तैनी बैर था। राज सिंह ने 1665 में बनारस आकर विश्वेश्वर मंदिर में बड़ी धूमधाम से पूजा पाठ किया था। यह संदेश औरंगजेब तक पहुंचा, तो उसे बहुत गुस्सा आया था।

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