ठगे गए मुंशी प्रेमचंद:वाराणसी में BHU के सेंटर में आज तक कोई रिसर्च नहीं, जन्मस्थान लमही की लाइब्रेरी किताबों के लिए मोहताज, वेबसाइट भी अधूरी

वाराणसी2 महीने पहले
मुंशी प्रेमचंद की आज 85वीं पुण्यतिथि है।

उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की आज 85वीं पुण्यतिथि है। हिंदी साहित्य के पुरोधा के नाम पर खानापूर्ति देखनी हो तो कभी उनके शहर वाराणसी आइए। यहां उनकी जन्मभूमि लमही से लेकर काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के प्रेमचंद शोध संस्थान तक आपको सिर्फ बदहाली ही नजर आएगी।

5 साल पहले बना था शोध संस्थान

मकड़ी के जाले लगे खाली-खाली कमरे, धूल फांक रहे खिड़की-दरवाजे, म्यूजियम के नाम पर मुंशीजी की टूटी चप्पल, कपड़े और सामान ही यहां पर दिखते हैं। लाइब्रेरी में रखी किताबों को उठाते ही पन्ना-पन्ना हाथ में आ जाता है। 5 साल पहले बने मुंशी प्रेमचंद शोध संस्थान की स्थापना से लोगों को यहां पर हेरिटेज और साहित्यिक विकास की उम्मीद जगी थी। मगर, शोध संस्थान के नाम आज तक एक भी शोध नहीं है। इस संस्थान की जिम्मेदारी आज काशी हिंदू विश्वविद्यालय के कई प्रोफेसरों के पास है।

2 करोड़ रुपए से बना था संस्थान

नाम न छापने की शर्त पर एक साहित्यकार ने बताया कि 2 करोड़ रुपए से बने इस शोध संस्थान और मुंशीजी के विरासत की हालत देश के किसानों की तरह हो गई है। इस शोध संस्थान ने एक आधी-अधूरी वेबसाइट भी हाल ही में लांच की है। यह वेबसाइट पर भी महज औपचारिकता ही निभाई गई है। इस पर 2018 के बाद किसी कार्यक्रम की जानकारी नहीं मिलेगी। हां, गैलरी सेक्शन में जिम्मेदारों के कुछ फोटाेग्राफ्स देखने को जरूर मिल जाएंगे।

तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने 2005 में रखी थी शोध संस्थान की बुनियाद।
तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने 2005 में रखी थी शोध संस्थान की बुनियाद।

मुलायम सिंह यादव ने रखी थी बुनियाद

प्रेमचंद स्मारक और शोध केंद्र संस्थान की बुनियाद 2005 में सपा के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने रखी थी। मगर, फंड की कमी के चलते यह संस्थान आकार नहीं ले सका। इसके 11 साल बाद 2016 में 2 करोड़ से अधिक पैसा खर्च कर यह शोध संस्थान तैयार हुआ और 31 जुलाई, 2016 को केंद्रीय मंत्री ने भवन का उद्घाटन कर दिया।

इसके कुछ दिन के बाद ही यहां से सबका ध्यान हट गया। इस शोध संस्थान के प्रमुख से लेकर सदस्य तक सभी बीएचयू के ही हिंदी और उर्दू के प्रोफेसर हैं। मगर, सच्चाई यही है कि इन साहित्यकारों के ही हाथों प्रेमचंद के विरासत की पतवार डूब रही है।

इस केंद्र का लक्ष्य

  • अकादमिक कार्य : संगोष्ठी, व्याख्यान, परिचर्चा आदि आयोजित करना।
  • शोध, समुदायिक विकास, लमही गांव के लोगों को प्रेमचंद के साहित्य से जोड़ना।
  • प्रेमचंद के साहित्य पर आधारित प्रकाशन को बढ़ाना, प्रेमचंद पर वृत्त चित्र का निर्माण, उनकी कहानियों पर आधारित रंग-कोलाज बनाना और प्रेमचंद संबंधित वाद-विवाद, निबंध, कहानी-लेखन, कहानी पाठ आदि प्रतियोगिताओं का आयोजन। इसमें से संगोष्ठी और प्रतियोगिताएं ही कराई गई हैं।
मुंशीजी की स्मृति में लमही में उनके नाम पर बना प्रवेश द्वार।
मुंशीजी की स्मृति में लमही में उनके नाम पर बना प्रवेश द्वार।

5 साल से नहीं मिला कोई नया साहित्य
लमही स्थित छोटी से लाइब्रेरी में जो चंद किताबें हैं, वह किसी न किसी की दान दी हुई हैं। प्रेम चंद स्मारक के अध्यक्ष सुरेश चंद्र दुबे ने बताया कि नई किताबों का कोई स्टॉक पिछले 5 साल में नहीं आया।

सुरेश चंद्र दुबे।
सुरेश चंद्र दुबे।

काफी लंबे चौड़े सब्जबाग सरकार द्वारा दिखाए गए थे, मगर कोई काम जमीन पर नहीं दिखता। हाल यह है कि जयंती और पुण्यतिथि को छोड़ दें, तो कोई भी जिम्मेदार व्यक्ति या साहित्यकार यहां जाते नहीं दिखता। नेता और अधिकारी हमारी पीठ थप-थपाकर निकल जाते हैं, मगर कुछ ठोस काम नहीं करते। किताबें बढ़ेंगी तो ही यहां पर वे रिसर्चर और पर्यटकों को कुछ देर रोक सकते हैं।

लमही स्थित मुंशीजी का पैतृक आवास।
लमही स्थित मुंशीजी का पैतृक आवास।
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