आपदा में ऐसी मजबूरी:वाराणसी में कई मजदूर काम नहीं होने की वजह से शव को कंधा दे रहे हैं, एवज मिलते हैं 250 से 500 रुपए

वाराणसी7 महीने पहले
मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र श्मशान पर मजदूर सुबह ही पहुंच जाते हैं।
  • कोरोना के चलते मौत के बाद कई शवों को अपनों का कंधा तक नसीब नहीं हो रहा
  • कई मजदूर शराब के नशे के लिए भी शव को कंधा दे रहे हैं

कोरोना के चलते कई रिश्ते भी बिखर रहे हैं। शवों को कंधा देने से भी परिजन मुकर जा रहे हैं। कोरोना के चलते मजदूरों की रोजी-रोटी पर भी संकट है। कई मजदूरों ने मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र श्मशान घाट पर पैसे लेकर शवों को कंधा देने का काम भी शुरू कर दिया है। इन मजदूरों का मानना है कि परिवार कैसे चलेगा। इस लिए ऐसा काम करना पड़ रहा है, तो वहीं कुछ शराब के नशे के लिए भी ऐसा कर रहे हैं।

'परिजनों को शव को कंधा देने की जरूरत पड़ती तो हम लोग जाते हैं'

मजदूरी करने वाले त्रिवेणी का कहना है कि पहले मजदूरी करते थे लेकिन कोरोना के चलते काम नहीं मिल रहा है। अब मुर्दा घाट तक पहुंचा रहे हैं। किसी को आवश्यकता होती है तो हम चार लोग जाते हैं। 1000 से 1500 रुपए घाट तक पहुंचाने का मिल जाता है। कोरोना से हम लोगों को डर नही लगता। मेहनत मजदूरी करते हैं। हम लोग यहीं मैदागिन स्टैंड पर ही रहते हैं। शराब पीकर मस्त रहते हैं। मणिकर्णिका श्मशान घाट पर शव को छोड़कर चले आते हैं।

मजदूर त्रिवेणी, जो पैसे लेकर शवों को कंधा देता हैं।
मजदूर त्रिवेणी, जो पैसे लेकर शवों को कंधा देता हैं।

लकड़ी वाले हम लोगों के पास परिजनों को भेज देते हैं

मजदूर बाबू काम नहीं होने की वजह से हरिश्चंद्र घाट के बाहर ही खड़ा रहता है। उसने बताया कि काम कहीं मिल नहीं रहा है। हम लोग शवों को कंधा देना शुरू कर दिए हैं। एक आदमी को 250 से 500 रुपए तक मिल जाता है। प्रत्यक्षदर्शी विशाल चौधरी ने बताया कि मजदूर लोग शवों को घाट तक पहुंचाते हैं। शवों के साथ आए लोग अक्सर यहां गाड़ी से आते हैं। कोरोना की वजह से परिवार के लोग कंधा नहीं देते हैं। तब यही मजदूर मदद करते हैं। 500 से 1000 रुपए तक भी कभी कभी मिल जाता है। मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र श्मशान पर रोज 100 से 150 शव आते हैं। कोरोना संक्रमितों का शव हरिश्चंद्र घाट पर ही जलता है।

मजदूर बाबू।
मजदूर बाबू।

लाचार परिजन भी मजबूरी में मुंह मांगी कीमत दे देते हैं

नाम नहीं बताने के शर्त पर एक परिजन ने बताया कि मेरी चाची की मौत तीन दिन पहले हुई थी। नार्मल डेथ के बाद भी घर से ही कंधा देने वाले लोग कम थे। हम लोग गाड़ी से शव लेकर मैदागिन पहुंचे। वहां पता चला कि पैसा लेकर मजदूर कंधा दे रहे हैं। 800 रुपए में दो मजदूरों को लेकर शव को हम लोग मणिकर्णिका घाट पहुंचे। मजदूरों की क्या गलती, जब कोई रोजगार नहीं है। ये लोग पढ़े-लिखे भी नही है। जाने अंजाने में लोगों की मदद ही कर रहे हैं। जब अपने ही कदम पीछे खीच ले रहे हैं।

मैदागिन चौराहे के पास शव के साथ गाड़ी में बैठे परिजन।
मैदागिन चौराहे के पास शव के साथ गाड़ी में बैठे परिजन।